रबी फसलों के लिए अपनाएं उन्नत उत्पादन तकनीक

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चना
चने की समय पर बुवाई 25 अक्टूबर से 5 नवंबर तक तथा पिछेती बिजाई 25 नवंबर तक उपयुक्त है।
उन्नत किस्में: जीएनजी 1958 (मरूधर), जीएनजी 1969 (त्रिवेणी), जीएनजी 1581 (गणगौर), जीएनजी 1488 (संगम), जीएनजी 1499 (गौरी), जीएनजी 663 (वरदान), जीएनजी 469 (सम्राट) (मोटे दाने वाली किस्म), सी 253, जीएनजी 1292 (काबुली चना) तथा आरएसजी 888 (बारानी खेती हेतु देसी किस्म) आदि का प्रमाणित बीज 15 किलो व मोटे दानों वाली किस्म का 18 किलो प्रति बीघा की दर से काम में लेंं।
बीजोपचार: जडग़लन व उखेड़ा की रोकथाम हेतु बीज को 10 ग्राम ट्राईकोडरमा हरजेनियम या 1.5 ग्राम कार्बेण्डाजिम (50 डब्ल्यू पी) प्रति किलो बीज के हिसाब से बीजोपचार करें। दीमक प्रभावित खेतों में बिजाई से पूर्व बीज को 2 मिली इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) को 50 मिली पानी में घोल बनाकर प्रति किलो बीज के हिसाब से प्रयोग करे। पी.एस.बी. एवं राईजोबियम कल्चर की स्ट्रेन एस.जी.एन. 94 से बीजोपचार से चने की उपज में बढ़ोतरी होती है। दीमक व कटवर्म के प्रकोप से बचाव के लिए क्विनालफॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण 6 किलो प्रति बीघा का आखरी जुताई के समय खेत में डाल देवें।
उर्वरक: चने की अच्छी पैदावार के लिए 5 किलोग्राम नत्रजन 11 किलो यूरिया, 10 किलो फास्फोरस (62.5 किलो एस.एस.पी.) प्रति बीघा की दर से बीज बोने से पहले ड्रिल करें। चने में डीएपी की तुलना में सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग करें। असिंचित फसल में उर्वरक की आधी मात्रा ही बुवाई से पूर्व डालें। खड़ी फसल में जिंक की कमी के लक्षण दिखने पर 1.5 किग्रा जिंक सल्फेट एवं 750 ग्राम बूझा चूना 100-125 लीटर पानी में डालकर प्रति बीघा के हिसाब से प्रयोग करें। बारानी क्षेत्रों में बिजाई के 5-6 सप्ताह बाद तक निराई-गुड़ाई अवश्य करें। कतार से कतार की दूरी 30 सेमी रखें व बीज की गहराई 7-8 सेमी रखें। सिंचित चने में सिंचाई के बाद बत्तर आने पर एक निराई-गुड़ाई करें तथा 600 मिलीग्राम पेंडामिथलीन (30 ईसी) का 150 लीटर पानी प्रति बीघा की दर से बुवाई के तुरन्त बाद छिड़काव करे। प्रथम सिंचाई बिजाई के 50-55 दिन व दूसरी सिंचाई 100 दिन बाद देवें। खड़ी फसल में दीमक लगने पर क्लोरोपाइरीफॉस (20 ईसी) एक लीटर प्रति बीघा सिंचाई के साथ प्रयोग करें। फल छेदक लट से बचाव हेतु चने में फेरोमेन ट्रेप का उपयोग अवश्य करें। जिन खेतों में विल्ट का प्रकोप अधिक होता हो वहां गहरी व देरी से बुवाई करें।
गेहूं
गेहूं की समय पर बुवाई हेतु उचित समय 10 नवम्बर से 20 नवम्बर तथा पिछेती बिजाई का समय 25 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक है। समय पर बिजाई हेतु उन्नत किस्में: डीपीडब्ल्यू 621-50, डब्ल्यूएच. 1105, एच.डी. 3086. पी.बी.डब्ल्यू-343, राज 3077, राज 1482, एच.डी. 2329, राज 4037, पीबीडब्ल्यू 502, डी.बी.डब्ल्यू 17, पी.बी.डब्ल्यू 550, एच.डी. 2967 तथा पिछेती बुवाई हेतु उन्नत किस्में: डी.बी.डब्ल्यू 90, राज 3777, राज 3765, पी.बी.डब्ल्यू 373 का प्रमाणित बीज काम में लेवें।
बीजदर: समय पर बिजाई के लिए 25 किलो बीज तथा पिछेती बुवाई के लिए 35 किलो बीज प्रति बीघा प्रयोग में लेंं।
भूमि व बीज उपचार: दीमक प्रभावित क्षेत्रों में 400 मिली क्लोरोपायरीफॉस (20 ईसी) या 250 मिली इमिडाक्लोप्रिड (600 एफ.एस.) की 5 लीटर पानी में घोलकर 100 किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें तथा जिन खेतों में दीमक का प्रकोप अधिक हो, उनमें बुवाई के समय क्विनालफॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण 6 किलो प्रति बीघा के हिसाब से भूमि में अंतिम जुताई के समय मिलावें। एजेटोबेक्टर व पी.एस.बी. कल्चर द्वारा बीज उपचार करने से नत्रजन व फॉस्फोरस उर्वरकों की बचत की जा सकती है। गेहूं में समय पर बुवाई 20 से 23 सेमी की दूरी पर कतारों में 5 सेमी से अधिक गहरी न करें तथा पिछेती बोई जाने वाली किस्में 18-20 सेमी की दूरी पर बोएं और बुवाई 3-4 सेमी से अधिक गहरी न करें।
उर्वरक: बुवाई के समय 22 किलो डीएपी, 24 किलो यूरिया, $ 10 किग्रा एम.ओ.पी. प्रति बीघा। प्रथम सिंचाई के समय (21-25 दिन पर) 30 किलो यूरिया प्रति बीघा प्रयोग करें। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में बुवाई से पूर्व 6 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति बीघा की दर से जमीन में मिला दें तथा खड़ी फसल में जिंक की कमी के लक्षण प्रकट होने पर डेढ़ किलो जिंक सल्फेट एवं 750 बूझा चूना 100-125 लीटर पानी में डालकर प्रति बीघा के हिसाब से छिड़काव करें। फसल को अधिक तापमान से बचाव के लिए कल्ले निकलने एवं बालियां निकलने की अवस्था पर 100 पी.पी.एम. सेलिसेलिक एसिड (1 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) $ 250 पी.पी.एम. थायोयूरिया (2.5 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) में घोलकर फसल पर पर्णीय छिड़काव करें।

रबी फसलों के लिए बिजाई के समय ध्यान देने योग्य बातें:-

  • बिजाई पूर्व खेत की मिट्टी की जांच करावें।
  • फसल चक्र अपनाये, लगातार एक ही फसल की बिजाई न करें।
  • बिजाई के लिए उन्नत किस्मों के प्रमाणित बीज प्रयोग में लें।
  • बिजाई हेतु बीज की सिफारिश की गई मात्रा का प्रयोग करें।
  • बिजाई से पूर्व भूमि व बीज उपचार अवश्य करें।
  • जैव उर्वरकों (कल्चर) का प्रयोग करें।
  • उर्वरकों की सिफारिश की गई मात्रा उचित समय पर प्रयोग करें। बेसल प्रयोग अवश्य करें।
  • फसल की प्रारम्भिक अवस्था में खेत को खरपतवार विहीन रखें।
  • समय पर प्रथम सिंचाई लगावें।
  • तिलहनी व दलहनी फसलों में डी.ए.पी. के स्थान पर सिंगल सुपरफॉस्फेट का प्रयोग करें।
  • डी.ए.पी. उर्वरक का प्रयोग केवन बेसल के रूप में करें।
  • कीटनाशक दवाईयों को मिलाकर छिड़काव न करें।
  • बीज/खाद को खरीदते समय बिल अवश्य लें।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत रबी फसलों का बीमा अवश्य करवायें।
  • ई- नाम कृषि बाजार से जुड़कर अपने उत्पाद का अधिक लाभ पायें।

 

  • डॉ. बी.एस. मीना
  • अनुपमा
  • सुमन मीणा
  • रमेश कुमार
  • करण सिंह
  • email : bsmeena1969@rediffmail.com
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