खतरे की घंटी खेतों में जवानों की कमी

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कमलेश पारे

देश और प्रदेश में,जब बयान-बम हर क्षण फट या फूट रहे हों, देश की सीमा पर बम फूटने का हल्ला हर पल हो,तब रोटी की बात करने या सुनने में शायद ही किसी की रूचि होगी। लेकिन याद रखें, कि जीने के लिए मनुष्य जाति हजारों साल से रोटी, यानी खेत में ऊगने वाली चीज़ें ही खाती आई है,और शायद आगे भी खाती ही रहेगी। वही रोटी इन दिनों एक नए संकट में है। इसीलिए इस लेख में बम, बारूद, बयानों, बतौलों, बदनीयती, बदजुबानी और बेईमानी के कान-फोड़ू हल्ले के बीचों-बीच हिम्मत जुटाकर रोटी पर आ रहे उस संकट का दर्द, सबसे बांटने की कोशिश की गई है।

ग्रामीण युवकों को पलायन से रोकें

विश्व आर्थिक विकास व सहयोग संगठन (ओईसीडी) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया भर में खेती से युवा पीढ़ी निरंतर दूर होती जा रही है। खेतों में अब जवान लोग दिखना बंद से हो गए हैं।

अमेरिका में खेती में लगे लोगों की औसत आयु 58 वर्ष, जापान में 67 वर्ष और अन्य यूरोपीय देशों में 65 वर्ष है। भारत में खेती से सीधे-सीधे जुड़े लोगों की औसत आयु 40 वर्ष है, जो लगातार ऊपर की तरफ ही जा रही है। यानी पूरी दुनिया में नौजवान लोग खेतों में नहीं हैं, माने वे खेती करना ही नहीं चाहते।

किसान खेती से विमुख

भारत की एक प्रतिष्ठित अकादमिक संस्था सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) ने कुछ दिनों पहले ही,इस तथ्य से ऊपर जाकर कहा था कि अपने देश में 76 प्रतिशत किसान खेती ही छोडऩा चाहते हैं।

सीएसडीएस के सर्वेक्षण में भारत के 18 राज्यों के किसान शामिल थे। अपने ही देश की जनगणना से एक और आंकड़ा निकलकर आया था कि देश में प्रतिदिन लगभग दो हजार किसान खेती से बाहर हो रहे हैं। यह मामला विश्वव्यापी है। इसी विश्व आर्थिक सहयोग संगठन ने एक आंकड़ा जारी किया था कि जापान में अगले आठ-दस सालों में आधे किसान खेती छोड़ देंगे। इसके पीछे का,ऐसा कोई कारण नहीं है,जिसे हम सब न जानते हों। मेहनत और मेहनताने सहित मौसम की अनिश्चितता ने इसे सर्वाधिक अलोकप्रिय और असुरक्षित आजीविका बना दिया है। इसीलिए जवान हो या अधेड़ सब इससे दूर भाग रहे हैं। सारे मुल्कों की सरकारें कहती जरूर हैं कि वे कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाएंगी या किसानों की आमदनी दुगुनी कर देंगी, पर करता कोई नहीं।

आमदनी में विसंगति

अपने देश की ही बात ले लें, तो पाएंगे कि पूरे देश में सरकारी नौकरी में न्यूनतम औसत वेतन 25000 रुपये प्रतिमाह है, जबकि किसान की औसत आमदनी एक हेक्टेयर पीछे लगभग साढ़े छह हजार रुपये महीना है। इसमें उसकी गायों, भैसों और मुर्गे-मुर्गी से होने वाली आमदनी भी शामिल है। यह आंकड़ा इस काम के लिए सरकार द्वारा अधिकृत नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन (एनएसएसओ) का है। एनएसएसओं ने ही यह भी माना है कि अपने यहाँ किसान और गैर-किसान की आय में पांच गुना का अंतर है।

सीएसडीएस ने अपने अध्ययन के दौरान पाया था कि भारत में ग्रामीण पृष्ठभूमि के 61 प्रतिशत युवा शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार और मनोरंजन के साधनों की उपलब्धि के कारण शहरों में ही बसना चाहते हैं। इनमें से 18 प्रतिशत युवा फौज में जाना चाहते हैं, 12 प्रतिशत इंजीनियर बनना चाहते हैं,शेष युवक बाक़ी कुछ भी बनना चाहते हैं,पर किसानी नहीं करना चाहते। मात्र डेढ़ प्रतिशत युवा खेती करना चाहते हैं, पर उसके पीछे उनकी कोई न कोई मजबूरी है।

ग्रामीण लड़कियों में भी एक बहुत बड़ा प्रतिशत शिक्षक या नर्स बनना चाहता है, पर गाँव में रहकर खेती में हाथ बंटाना वे भी नहीं चाहती।

वैसे तो अपने देश में, स्नातक पाठ्यक्रमों के एक का भी आधा प्रतिशत लोग कृषि,पशुपालन और पशु चिकित्सा के कोर्सों  में प्रवेश लेते हैं,लेकिन उनमें से भी अधिकांश लोग, अपने अध्ययन क्षेत्र को व्यवसाय या आजीविका नहीं बनाना चाहते। बैंक और खाद, बीज व कृषि रसायन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी ही उनका सपना होती हैं। इसी अध्ययन के महत्वपूर्ण भागीदार रहे प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव ने तो कहा है कि किसानी में लगे युवकों की शादी में भी दिक्कत आती है। वे बहुत ही कम लड़कियों की पसंद होते हैं।

आबादी पर नियंत्रण जरूरी

यह बात हम लोग तब कर रहे हैं जब निरंतर बढ़ रही आबादी के कारण, खाद्यान्न की जरूरतें भी रोज कई-कई गुना ज्यादा बढ़ रही हैं। ऐसी ही स्थिति रहने पर, वर्ष 2050 में विश्व की जनसंख्या करीब 900 करोड़ हो जायेगी। जिस रफ़्तार से हम खाद्यान्न उगा रहे हैं, तब उससे तो मात्र 59 प्रतिशत लोगों का ही पेट भर पायेगा। हमारे प्रधानमंत्री जी ने यूं ही नहीं लाल किले की प्राचीर से कह दिया है कि जनसंख्या वृद्धि बड़ी चिंता का विषय है। वे जानते हैं कि यदि जनसंख्या, उत्पादन और उत्पादकता का यही अनुपात रहा, तो हम 2030 से ही गंभीर संकट की चपेट में आने लगेंगे।

आज की तारीख में, हम अपने देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर कहते हैं। खाद्यान्न उत्पादन के बड़े-बड़े आंकड़े भी हमारे पास हैं, किन्तु हर साल बढ़ रही किसानों की आत्महत्याओं को लेकर हमारे पास कोई जवाब नहीं है। डेढ़ करोड़ किसान पिछले कुछ ही सालों में खेती छोड़ चुके हैं। 

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में हम 103 वें स्थान पर हैं, ऑक्सफेम के खाद्य उपलब्धता के आंकड़े में हम 97वें स्थान पर हैं। इन बातों को महज चौंकाने वाली खबर न मानें, ये सब वे बातें हैं,जो पुष्ट आधार पर खड़ी हैं ।

खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना जरूरी

और हाँ, प्रधानमंत्री जी को मालूम है कि अभी हमारा खाद्यान्न उत्पादन 250 मिलियन टन (दस लाख टन का एक मिलियन टन होता है) है। अगले तीस साल में सबका पेट भरने के लिए इसे 350 मिलियन टन तक इसे ले जाना बहुत जरूरी है। लेकिन यदि परिस्थितियां ये ही रहीं, तो खेती के लिए उपलब्ध श्रम शक्ति या मानव संसाधन, आज की तुलना में तब मात्र 25 प्रतिशत ही रहेगा। रोज छोटी होती जा रही जोतों में भारी मशीनें काम नहीं आएँगी। 

बहुत अच्छी बात है कि सरकार के प्रयासों से कृषि लाभ की आजीविका बने। पर वह आकर्षक और सुरक्षित भी तो हो। तभी प्रतिभाशाली और उद्यमी किस्म के ग्रामीण युवक गाँवों में रुकेंगे। अभी अपना व्यापार सहित विकास का हर हिस्सा शहरों में ही केंद्रित इसलिए जरूरी हैं कि गाँव भी बिजनेस हब बनें, जो रोजगार पैदा कर युवकों को गाँवों में रोक सकें।

और हाँ, आप कुछ दिनों तक बिना सौंदर्य साधनों के रह सकते हैं, बिना कार, बाइक, फ्रिज,टीवी जैसी चीजों के जिंदगी चल सकती है, पर खाने को रोटी तो लगना ही है। इसलिए यह आजीविका इंसान की ताजि़ंदगी रहेगी। जरूरत बस इतनी है कि इसे आकर्षक और सुरक्षित बना दें। बात मानिये, गाँवों में अधिकांश घरों में लगे ताले, ट्रेक्टर के स्टीयरिंग के बजाय, चौक-चौबारों पर बीड़ी, सिगरेट पीते, तम्बाखू खाकर थूकते और ताश खेलते हष्ट-पुष्ट युवक अच्छे नहीं लगते।
 

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