जल शक्ति अभियान में आईसीएआर की महती भागीदारी : डॉ. महापात्रा

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खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी वैज्ञानिक कृषि जल प्रबंधन

(नई दिल्ली से निमिष गंगराड़े)

नई दिल्ली। डॉ. त्रिलोचन महापात्रा, महानिदेशक (भाकृअनुप) एवं सचिव (कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग) ने नई दिल्ली में 'वैज्ञानिक कृषि जल प्रबंधन खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक' विषय पर स्पष्ट किया कि किसानों और कृषि-संबंधी क्षेत्रों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए प्रेस मुलाकात दरअसल मीडिया के साथ साझेदारी है। 1951 से 2014 तक प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता के घट रहे आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने चिंता जताई और कहा कि यदि जल संचयन और संरक्षण का यही हाल रहा तो भविष्य में हमें बहुत बड़े जल-संकट का सामना करना पड़ सकता है। 

डॉ. महापात्रा ने कहा कि भारत में उपलब्ध जल का 85 फीसदी कृषि क्षेत्र द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता है। उन्होंने कहा कि शुद्ध सिंचाई में 70 फीसदी भूगर्भीय जल का दोहन चिंताजनक है, नतीजतन जल का स्तर भी तेजी से घट रहा है। उन्होंने बताया कि भारत में सिंचाई क्षेत्र के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती निर्मित सिंचाई क्षमता (आईपीसी) और सिंचाई क्षमता उपयोग (आईपीयू) के बीच बढ़ती खाई तथा नहर प्रणाली में जल का असमान वितरण है। नहरों के कमान क्षेत्र में कम सिंचाई दक्षता, जल वितरण में असमानता, सिंचाई जल की आपूर्ति और फसल जल की मांग के बीच अंतर, सिंचाई प्रेरित भू लवणता और जलभराव आदि कुछ प्रमुख चुनौतियां हैं, जिनका सामना करना पड़ रहा है।

महानिदेशक ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से वर्षा आधारित पारिस्थितिकी तंत्र में बढ़ रहे चुनौतियों, मसलन सूखा और बाढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र को विकल्प के तौर पर जल के उचित संचयन और संरक्षण को अपनाना होगा। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जल-उपयोग दक्षता में सुधार या कृषि जल उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कई दृष्टिकोण हैं जैसे कि कम जल की खपत वाली फसलों का उच्च जल खपत वाली फसलों के स्थान पर प्रयोग, जल उपयोग दक्ष फसल किस्मों का बड़े पैमाने पर बहुगुणन, सूक्ष्म सिंचाई, फसल प्रबंधन एवं कृषि कार्यों के लिए स्मार्ट एवं सटीक प्रौद्योगिकियों को अपनाना।

भारत : कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े

  • भौगोलिक क्षेत्र- 328 मिलियन हेक्टेयर
  • विश्व की 18त्न से अधिक आबादी भारत में
  • देश में 4.2त्न मीठे पानी के स्त्रोत 
  • देश में 4 हजार बिलियन क्यूबिक मी. (बीसीएम) वार्षिक वर्ष (बर्फवारी सहित)

प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 

  • 1951-5177 घन मीटर,
  • 2014-1508 घन मीटर
  • 2025 में - प्रति व्यक्ति 1465 घनमीटर होगा
  • 2050 में - प्रति व्यक्ति 1235 घनमीटर जल उपलब्धता रह जाएगी।

डॉ. महापात्रा ने कहा कि सूक्ष्म सिंचाई से जल संरक्षण और 'प्रति बूँद अधिक फसल' की परिकल्पना संभव हो पाएगी। उन्होंने कहा कि भूजल पर कम-से-कम निर्भरता और अपशिष्ट जल का इस्तेमाल जल संरक्षण और संचयन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

1 जुलाई, 2019 से चल रहे भारत सरकार के 'जल शक्ति अभियान' को एक सराहनीय कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि हमने कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से इस अभियान के तहत लाखों किसानों को प्रशिक्षण, कार्यशाला, मेला और प्रदर्शन के द्वारा सही सिंचाई एवं फसल चयन के प्रति जागरूक किया है। उन्होंने कहा कि इस अभियान के तहत हमने 500 मेला करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने यह भी बताया कि ऐसे कार्यक्रमों की सफलता के लिए जन-आंदोलन की आवश्यकता है।

आईसीएआर द्वारा विकसित प्रासंगिक प्रौद्योगिकियां

  • दक्ष जल संरक्षण और उपयोग के लिए फ्लेक्सी चैक डैम (रबड़ बांध)
  • जलाशय एवं कुआं जल संभर क्षेत्रों में जल रिसाव रोकने के लिए जल का एकत्रण एवं संरक्षण
  • उभरी और धंसी हुई क्यारी प्रौद्योगिकी
  • टपक सिंचाई के तहत कृत्रिम भूजल रिचार्जिंग
  • एकीकृत जल सिंचाई, मौसमी जल भराव पारिस्थितिकी तंत्र के लिए
  • सिंघाड़ा-मत्स्य संवर्धन प्रौद्योगिकी, जैव जल निकासी प्रौद्योगिकी और अपशिष्ट जल उपचार प्रौद्योगिकी आदि।

अंत में, राष्ट्रीय जल मिशन के तहत जल संसाधनों की आपूर्ति एवं मांग और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता के लिए राज्य विशिष्ट कार्ययोजना (एसएसएपी) तैयार करने में भाकृअनुप के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के वार्षिक जल बजट को बनाने में मदद करेगा और उपलब्ध जल संसाधनों के आवंटन और कुशल उपयोग को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगा। साथ ही जल संचयन और संरक्षण के लिए भाकृअनुप द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों के बारे में जानकारी दी।
 

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