पॉवर कंपनियां मालामाल, किसान हैं बेहाल

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इंदौर। म.प्र. में पॉवर ग्रिड कार्पोरेशन और म.प्र. पॉवर ट्रांसमिशन कंपनियों के 300 से ज्यादा कार्य चल रहे हैं, जिनमें उच्च दाब वाली बिजली लाइनों को करीब दस हजार गांवों से निकाला जा रहा है। जिससे किसानों को अपनी जमीन का नुकसान हो रहा है। हालांकि किसानों को उनकी भूमि का मुआवजा देने का प्रावधान है, लेकिन किसानों की शिकायत है कि कंपनियां मुआवजे का मनमाना वितरण करती है। मुआवजा भी विरोध करने वाले अथवा जागरूक किसानों को ही किया जाता है।

जनहित की आड़ में

भुगतान से बचतीं बिजली कम्पनियां

क्या है क्षतिपूर्ति के प्रावधान ? : उच्च दाब विद्युत लाइन और टॉवर  निर्माण के लिए भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाता है, लेकिन किसान को हुए नुकसान के लिए इंडियन टेलीग्रॉफ एक्ट 1885 की धारा 10 और धारा 16  तथा भारतीय विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 67 और 68  के तहत किसानों को क्षतिपूर्ति दिए जाने का प्रावधान हैं। भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा 15 अक्टूबर 2015 को जारी दिशा निर्देशों के अनुसार टॉवर निर्माण के लिए भूमि के बाजार मूल्य की 85 प्रतिशत क्षतिपूर्ति राशि संबंधित कम्पनी द्वारा किसानों को भुगतान करनी होगी। मुआवजे का निर्धारण टॉवर के चारों स्तम्भों के बीच के मूल क्षेत्र से किया जाएगा। इसी तरह खेत के ऊपर निकले तारों, तार की चौड़ाई और और दो टॉवरों के बीच की लम्बाई के आधार पर क्षेत्रफल की गणना की जाएगी और इस भूमि पर बाजार मूल्य के 15 प्रतिशत की दर से क्षतिपूर्ति का भुगतान किया जाएगा। फसलों के नुकसान का मुआवजा पृथक से दिया जाएगा। नगरीय क्षेत्र में नगरीय निकाय द्वारा क्षतिपूर्ति की राशि निर्धारित की जाएगी।

लेकिन कई प्रभावित किसानों का कहना है कि इसके पहले हुए सर्वे में भी अधिकारियों को भी किसानों को मुआवजा नहीं देने की जानकारी दी थी, लेकिन ध्यान नहीं दिया गया। जबकि किसानों के खेतों का मनमाना उपयोग किया जा रहा है। जनहित का मामला बताकर भुगतान से बचने की कोशिश भी की जाती है। तगड़ा विरोध करने वाले किसानों को ही मुआवजा दिया जाता है, जो निर्धारित प्रावधान के अनुसार नहीं रहता। इस बारे में ग्राम पलासिया जिला इंदौर के जागरूक किसान श्री दिनेश चौधरी ने कृषक जगत को बताया कि दो साल पहले खरगोन से हथुनिया के लिए डाली गई पॉवर लाइन के लिए उनके खेत में भी दो टॉवर लगाए थे। जिनको स्थापित करते समय ही विरोध किया और मुआवजा प्रावधानों के बारे में बताया तो संबंधित एजेंसी के लोगों ने लम्बी जद्दोजहद के बाद 13 लाख रुपए मुआवजा देने पर सहमति जाहिर की थी, लेकिन आखिर में बमुश्किल कुल 9 लाख रु. का ही भुगतान किया, जिसमें दो टॉवर, खेत में ऊपर से गुजरे तार और उस दौरान खेत में 4 बीघा में लगाई गई गोभी की फसल का मुआवजा भी शामिल कर लिया। जबकि यह राशि 15 लाख रु. बनती थी।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 'पॉवर' की आड़ में मैनेजमेंट और ट्रांसमिशन कंपनियों द्वारा किसानों की जमीनें हथियाने का कोई खेल तो नहीं चल रहा है? अधिकारियों पर मुआवजे की राशि कथित रूप से हड़पने के आरोप भी लगते रहे हैं। यहां भारतीय किसान संघों के महासंघ (सीफा) के सलाहकार श्री पी. चेंगल रेड्डी ने बताया कि ट्रांसमिशन कंपनियों द्वारा किसानों की भूमि पर टॉवरों  का निर्माण और लाइने  डालने (6 एकड़-2 टावर्स/400 केवी की लाइनों के बीच) से वे पूरे भूमि मूल्य को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। कंपनियां इस बात पर मुआवजे का भुगतान नहीं करती हैं कि भूमि का स्वामित्व किसान के नाम पर रहता है। वे सरकारी कंपनी होने का दावा करते हैं, जिससे मुआवजे का भुगतान करने की जरूरत नहीं है। 2003 के बाद से पावर ग्रिड और अन्य कंपनियों ने ढाई लाख किमी लाइनें खींची हैं। इसने 7.5 मिलियन किसानों के स्वामित्व वाली 5 मिलियन एकड़ भूमि को नुकसान पहुंचाया है। जिसमें लगभग 99 प्रतिशत मुआवजे का भुगतान नहीं किया जाता है। बिजली ग्रिड द्वारा  5 वर्षों (2013-14 से 2017-18) के दौरान पावर ग्रिड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया ने 31,184 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ घोषित किया है। जबकि 48,390 किमी. लाइनों को खींचा गया था। जिसमें 6,15,792 एकड़ भूमि क्षतिग्रस्त हुई। लेकिन पावर ग्रिड ने एक फार्मा भी नहीं बनाया। जबकि पावर सिस्टम प्रबंधन का कहना है कि पावर ग्राइड निर्धारित मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के साथ-साथ सिस्टम की उच्च उपलब्धता प्राप्त करने के लिए संचालन और रखरखाव के संबंध में निरंतर कार्रवाई करता है। 

किसान मांगे अपना हक

ऐसी असमंजस की दशा में पॉवर लाइन से प्रभावित होने वाले किसानों को ही जागरूक होने की जरूरत है। मुआवजा नहीं मिलने पर ऐसे किसान जन प्रतिनिधि और प्रशासन पर दबाव डालकर अपना हक मांगें, फिर भी मुआवजा न मिले तो निर्माण कार्य रोककर न्यायालय में मामला दायर करें। जन प्रतिनिधियों से भी अपेक्षा है कि वे किसानों के हित में क्षतिपूर्ति की राशि के भुगतान में मदद करें।
 

फोटो : ट्रांसमिशन लाइन का।

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