फसल बीमा से वंचित होंगे किसान

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केन्द्र में भाजपा सरकार, राज्य में कांग्रेस सरकार
दो पाटन के बीच में नहीं होगी योजना साकार

खरीफ - 2019
 

किसानों को दोतरफा नुकसान की संभावना

(अतुल सक्सेना)

मध्य प्रदेश में खरीफ सीजन अपने चरम पर है। अब तक लगभग दो-तिहाई क्षेत्र में बोनी भी कर ली गई है परन्तु फसल बीमा अधिसूचना का अता-पता नहीं है। ऐसा लगता है इस खरीफ में प्रदेश के किसान पीएम फसल बीमा योजना के लाभ से वंचित रह जाएंगे तथा उन्हें जबर्दस्त नुकसान उठाना पड़ेगा और सरकार मूकदर्शक बनी देखती रहेगी। क्योंकि सीजन शुरू होने से पूर्व ही अधिसूचना जारी करने का प्रावधान है परन्तु अब तक फसल बीमा की अधिसूचना जारी नहीं होने से किसानों की धड़कने बढ़ गई हैं। इसमें मौसम भी आग में घी डालने का काम कर रहा है। मानसूनी वर्षा के लम्बे अंतराल के कारण फसल मुरझाने लगी है तथा दुबारा बोनी की नौबत भी आ सकती है। अगर ऐसा हुआ तो किसानों को दो तरफा नुकसान होगा और इसकी जिम्मेदार प्रदेश सरकार होगी।

देश में प्राकृतिक आपदा के जोखिम से फसलों को बचाने के लिए तैयार रक्षा कवच प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना वर्ष 2016 में शुरू की गई थी लेकिन अब तक वो आधा रास्ता भी पार नहीं कर पायी है। कम प्रीमियम एवं सरल प्रावधानों के चलते ऋणी एवं अऋणी कृषकों ने इसे अपनाया, परन्तु राज्य सरकारों की धीमी गति के कारण इसका लक्ष्य बहुत पीछे हो गया। किसानों को राहत देने के उद्देश्य से लायी गई पीएम फसल बीमा योजना में बुनियादी ढांचे के अभाव में शुरुआत में जो दिक्कतें आयी वह आज भी कायम है इसी के चलते तीन वर्ष में 50 फीसदी किसानों को बीमा दायरे में लाने लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया। वर्ष 2016 में योजना जब शुरू हुई तो 8800 करोड़ रुपए इसके लिए रखे गए थे तथा तीन वर्ष में देश के 50 फीसदी किसानों को दायरे में लाने का लक्ष्य था परन्तु खरीफ 2018 तक मात्र 3.73 करोड़ किसान ही शामिल हो सके जबकि देश में 14.5 करोड़ किसान हैं। 

  • अब तक फसल बीमा की अधिसूचना जारी नहीं
  • का वर्षा जब कृषि सुखानी
  • बीमा कंपनियों के प्रस्ताव मिले
  • वित्त मंत्रालय का अड़ंगा
  • मंत्री, विधायक चुप क्यों?


 

बारिश की खेंच से किसानों की मुश्किलें बढ़ीं

विशेष प्रतिनिधि)

इंदौर। इन दिनों निमाड़ -मालवा के किसान बारिश की बाट जोह रहे हैं। करीब एक पखवाड़े से बारिश की खेंच ने किसानों को चिंता में डाल दिया है। तापमान बढऩे से फसलें मुरझाने लगी हैं। फसलों पर बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ गया है। किसानों की निगाहें आसमान पर ही टिकी हैं। 

खरगोन जिले के किसानों ने जुलाई के पहले सप्ताह में सोयाबीन, मक्का, तुअर, मूंग आदि की बोनी कर दी थी। लेकिन पिछले 10-12 दिन से बारिश बिल्कुल भी नहीं हुई है। इस कारण तापमान भी बढ़ गया है, जिससे फसलें मुरझाने लगी हैं। फसलों को बचाने के लिए अब किसान खेतों में डोरे (कोलपे) चला रहे हैं। बोधगांव के पूर्ण सिंह चौधरी ने कृषक जगत को बताया कि पानी नहीं गिरने से फसलें मुरझा रही हंै। कपास में सिंचाई और हरे मच्छर के लिए स्प्रे शुरू कर दिया है। उधर खंडवा जिले के पुनासा ब्लॉक में मक्का में फॉल आर्मी वर्म होने की खबर है। तो वहीं धार जिले के सरदारपुर तहसील के रिंगनोद क्षेत्र में सोयाबीन की फसल पर कामलिया कीट का प्रकोप होने से फसल नष्ट होने कई कगार पर पहुंच गई है। अमझेरा के रमेश गंगाराम कुशवाह ने बताया कि पानी नहीं गिरा है। हल्की जमीन में कामलिया कीट का असर देखा गया है। जबकि झाबुआ जिले के जामली, बरवेट आदि गांवों में बारिश नहीं होने से टमाटर आदि फसलों पर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। जामली के अनोखीलाल पाटीदार ने कहा कि सोयाबीन, टमाटर, मिर्च लगाईं है। खरपतवार नष्ट करने के लिए डोरे चला रहे हैं। करीबी गांव मनास्या और चंपेलिया में कामलिया कीट का प्रभाव है। मक्का में फॉल आर्मी वर्म का खतरा मंडरा रहा है। बड़वानी जिले के सेंधवा ब्लॉक में मक्का और कपास के रकबे में 10 प्रतिशत वृद्धि हुई है,वहीं सोयाबीन में 10 प्रतिशत घटा है। यहां भी बारिश का इन्तजार है। पिपलूद के रमेश यादव ने कहा कि पानी नहीं गिरने से केला और कपास में सिंचाई करना शुरू कर दिया है। मालवा क्षेत्र के रतलाम, उज्जैन और इंदौर जिले में भी बारिश नहीं होने से फसलें प्रभावित हो रही हैं। इंदौर जिले के  सांवेर, राऊ और महू क्षेत्र में भी सोयाबीन की फसल को बारिश की दरकार है, अन्यथा फसल बिगडऩे के अंदेशे से किसान चिंतित है। सांवेर तहसील के मेल कलमा के राकेश पाराशर की सोयाबीन की फसल भी सूखने लगी है। एक-दो दिन के इंतजार के बाद सिंचाई शुरू करना पड़ेगी। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जिन खेतों की मिट्टी काली है, वहां बोई सोयाबीन की फसल 2-4  दिन बच सकती है, क्योंकि काली मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता ज्यादा रहती है। जबकि  भूरी और दरदरी मिट्टी वर्षा के जल को शोषित नहीं कर पाती है। इसलिए फसलें सूखने लगती हैं। यदि दो- चार दिन में बारिश नहीं हुई तो फसलों को नुकसान होना तय है।

 

योजना इस धीमी गति से चल रही है कि अब तक 30 फीसदी के आंकड़े को भी नहीं छू सकी है। इसकी बानगी म.प्र. में ही देखिए। म.प्र. सरकार भी अब तक खरीफ 2019 के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की अधिसूचना जारी नहीं कर सकी है। जानकारी के मुताबिक लगभग 8 कंपनियों के टेण्डर भी बुला लिए गए हैं परन्तु वित्त विभाग में फाईल उलझ गई है। सरकार इस पर गंभीरता से विचार नहीं कर पा रही है और न ही सरकार को योजना के समय का ध्यान है। विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है इसमें भी अब तक किसी जिम्मेदार विधायक एवं मंत्री ने इस ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट नहीं किया है। एक ओर किसान कम वर्षा के कारण परेशान है शुरुआत में ही बोनी करने वाले किसानों की फसल अब मुरझाने लगी है उन्हें शीघ्र पानी की दरकार है अन्यथा दुबारा बोनी करने की नौबत आ सकती है। दूसरी तरफ यदि बीमा भी नहीं होगा तो किसान का क्या होगा? फरवरी 2016 में जब केन्द्र सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना लागू की तो प्रदेश में अल्प वर्षा के कारण खरीफ फसलें प्रभावित हुई थी उस वक्त फसल बीमा काम आया था। लगभग 1800 करोड़ रुपये की दावा राशि 8 लाख से अधिक किसानों को बांटी गई थी तथा ऋणी एवं अऋणी किसानों को मिलाकर लगभग 38 लाख किसानों का बीमा हुआ था।

इसी प्रकार प्रदेश में खरीफ 2017 में 5300 करोड़ की दावा राशि का लाभ लगभग 17 लाख से अधिक किसानों को मिला था जबकि कुल 34 लाख से अधिक किसानों का बीमा किया गया था। हालांकि किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए तत्कालीन सरकार ने आरबीसी 6-4 के तहत राहत मुहैया कराई थी, परन्तु असल राहत किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से मिली थी। क्योंकि उसमें उन्होंने मात्र 480 करोड़ का प्रीमियम जमा किया था। अर्थात हर सीजन में किसानों को फसल नुकसान से मिले जख्मों पर बीमा योजना ने मलहम लगाया है। वैसे प्रदेश के ऋणी, अऋणी मिलाकर लगभग 34 लाख से अधिक किसानों को खरीफ 2018 के दावा भुगतान का इंतजार है और खरीफ 2019 के लिए तो अभी अधिसूचना पर ही टकटकी लगी है।

प्रदेश में कार्यरत बीमा कंपनियां कृषकों के खरीफ 2018 के जमा करोड़ों रुपये के प्रीमियम पर चांदी काट रही है, परन्तु केन्द्रांश एवं राज्यांश के इंतजार में दावा भुगतान नहीं हो पा रहा है। ज्ञातव्य है कि पीएम फसल बीमा योजना में 50-50 फीसदी की हिस्सेदारी राज्य एवं केन्द्र सरकार की है। जबकि कृषकों को खरीफ फसलों के लिए 2 प्रतिशत, रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत एवं बागवानी व नगदी फसलों के लिए 5 प्रतिशत प्रीमियम देना पड़ता है।

इधर केन्द्र सरकार पीएम फसल बीमा योजना को और अधिक कारगर बनाने तथा द्रुत गति से चलाने के लिए बदलाव की तैयारी कर रही है। सरकार का इरादा सभी किसानों के लिए फसल बीमा को वैकल्पिक बनाने, ऊंचे प्रीमियम वाली फसलों को हटाने और राज्यों को विशिष्ट ग्राहक की जरूरत के हिसाब से प्रोडक्ट उपलब्ध कराने के लिए लचीलापन देने का है। इसके साथ ही योजना के तहत किसी फसल के लिए सिंचाई क्षेत्र 50 फीसदी से अधिक होने पर कवरेज के लिए प्रीमियम की अधिकतम सीमा 25 फीसदी और फसल में सिंचाई क्षेत्र 50 फीसदी से कम है तो प्रीमियम की सीमा 30 फीसदी रखने का सुझाव दिया गया है। इसमें हर साल संशोधन की सिफारिश भी की गई है।

हाल ही में लोकसभा में केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा है कि योजना के क्रियान्वयन में कसावट लाने के लिए बदलाव के साथ जवाबदारी तय की गई है। विशेष कर दावों के निपटान पर विलंब एवं न करने की स्थिति में बीमा कंपनियों पर 12 फीसदी का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है जो रबी 2018-19 से लागू हो गया है। कृषि मंत्री ने बताया कि यदि कोई किसान बैंक की त्रुटि, भूल-चूक की वजह से पीएम फसल बीमा योजना के लाभ से वंचित हो जाता है तो बैंकों को मान्य दावों का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी बनाया गया है। यह सारी उठापटक किसानों को योजना के माध्यम से लाभ पहुंचाने के लिए की जा रही है परन्तु राज्य सरकारें गहरी नींद में है। 

केन्द्र सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को अधिक आसान, अधिक उपयोगी बनाने पर काम कर रही है।

- नरेन्द्र सिंह तोमर
केन्द्रीय कृषि मंत्री

 

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