खरीफ फसलों में उत्पादन बढ़ाने की अभी भी सम्भावनाएं हैं

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पिछले दस वर्षों में खरीफ फसलों की खेती में किसानों की प्राथमिकता में कुछ बदलाव दिखाई दे रहे हैं। देश के किसानों का चावल, मक्का, अरहर, उर्द, मूंग, मूंगफली, तिल, सोयाबीन कपास के प्रति रुझान बढ़ा है, वहीं ज्वार, रागी छोटे अनाजों सूरजमुखी के प्रति घटा है। अरण्डी तथा बाजरा के प्रति इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। धान का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में 849.1 लाख टन था। वर्ष 2018-19 में बढ़कर 1017.5 लाख टन तक पहुंच गया। इसमें पिछले 10 वर्षों में 19.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले कुछ वर्षों से मक्का की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ता चला जा रहा है। खरीफ में लिए जाने वाले मक्के का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में पहुंच 141.2 लाख टन था। वर्ष 2018-19 में बढ़कर 212.0 लाख टन तक पहुंच गया। मक्का तथा मक्के से बनने वाले उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण पिछले 10 वर्षों में इसके उत्पादन में 50.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आने वाले वर्षों में भी मक्के का रकबा तथा उत्पादन बढऩे की और सम्भावना है। खरीफ की तीन दलहनी फसलों अरहर, उर्द तथा मूंग के प्रति भी किसानों की रुचि बढ़ी है तथा इनके उत्पादन में भी पिछले 10 वर्षों में वृद्धि देखने को मिली है। अरहर का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में मात्र 22.7 लाख टन था। वर्ष 2018-19 में बढ़कर 35.0 लाख टन तक पहुंच गया। इसी प्रकार इन 10 वर्षों में उर्द का उत्पादन 3.4 से बढ़कर 25.5 लाख टन तथा मूंग का 7.8 से बढ़कर 18.4 लाख टन तक पहुंच गया। 2008-09 से 2018-19 तक 10 वर्षों में अरहर, उर्द तथा मूंग के उत्पादन में क्रमश: 54.2, 203.8 तथा 135.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो अत्यंत उल्लेखनीय है और देश दलहनों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है।

खरीफ की तीन तिलहनी फसलें मूंगफली, तिल तथा सोयाबीन के उत्पादन में भी पिछले 10 वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जबकि खरीफ में सूर्यमुखी व रामतिल का उत्पादन घटा है तथा अरण्डी का उत्पादन स्थिर रहा है। मूंगफली का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में 561.7 लाख टन था। वर्ष 2017-18 में बढ़कर 759.5 लाख टन तक पहुंच गया, परन्तु वर्ष 2018-19 में विभिन्न कारणों के कारण इसके उत्पादन में कमी आई और यह 515.3 लाख टन ही हो पाया। तिल का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में 64.0 लाख टन था। वर्ष 2018-19 में 74.6 पर पहुंच गया। सोयाबीन के उत्पादन में इन 10 वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। वर्ष 2008-09 में सोयाबीन का उत्पादन 990.5 लाख टन ही हुआ था जो वर्ष 2018-19 में बढ़कर 1374.3 लाख टन तक पहुंच गया। इन 10 वर्षों में सोयाबीन के उत्पादन में 38.8 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। खरीफ की दो अन्य तिलहनी फसलों सूर्यमुखी तथा रामतिल के उत्पादन में कमी एक चिन्ता का विषय है। खरीफ सूर्यमुखी का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में 35.7 लाख टन था वर्ष 2018-19 आते-आते घटकर मात्र 9.0 लाख टन ही रह गया। सूर्यमुखी की फसल खरीफ तथा रबी दोनों मौसमों में ली जाती है। दोनों मौसमों में इसके उत्पादन में कमी देखी गई है, जहां इसका कुल उत्पादन वर्ष 2008-09 में 115.8 लाख टन था वह घटकर वर्ष 2018-19 में 20 लाख टन ही रह गया। इसका मुख्य कारण इसके रकबे में कमी है। जिसके कारणों का पता लगाना आवश्यक है। परंपरागत फसल रामतिल का उत्पादन जो वर्ष 2008-09 में 11.7 लाख टन था वर्ष 2018-19 तक आते-आते घटकर 6.3 लाख टन ही रह गया। अरंडी के उत्पादन में कोई सार्थक वृद्धि या कमी इन 10 वर्षों में नहीं आई।

ज्वार, रागी, मोटे अनाजों की खेती के प्रति किसानों का रुझान कम हुआ है और इन दस वर्षों में इनके उत्पादन में कमी आई है जबकि इनके पोषक तत्वों के प्रति जागरुकता बढ़ी है। आशा है कि आने वाले वर्षों में किसानों का इन फसलों के उगाने के लिए रुझान बढ़ेगा। खरीफ की नगदी फसल कपास के उत्पादन में भी पिछले दस वर्षों में वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2008-09 में कपास का उत्पादन 2227.6 लाख गांठें था जो वर्ष 2018-19 में 2759.3 लाख गांठें हुआ। इन दस वर्षों में कपास का सबसे अधिक उत्पादन वर्ष 2013-14 में हुआ जो 2590.2 लाख  गांठें था।  पिछले वर्षों में खरीफ फसलों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। खरीफ फसलों की उत्पादकता बढ़ाने की अभी भी अपार संभावनायें हैं। किसानों को इस दिशा में आने वाले समस्याओं का निराकरण कर इसका समाधान निकाला जा सकता है।

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