फसल परिवर्तन का जोखिम उठाएंगे किसान

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(विशेष प्रतिनिधि)

इंदौर। मालवा -निमाड़ में मानसून पूर्व की बारिश हो चुकी है। अब मानसून का प्रवेश भी होने ही वाला है। इसके साथ ही क्षेत्र में खरीफ में परंपरागत खेती का दौर शुरू हो जाएगा। जिसके तहत मालवा में सोयाबीन की बोनी बहुतायत से की जाएगी। जबकि दूसरी ओर कृषि विशेषज्ञ किसानों को अंतरवर्तीय फसलें लेने की सलाह देते हैं, ताकि भूमि की उर्वरता बनी रहे। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या क्षेत्र के किसान इस बार फसल परिवर्तन का जोखिम उठाएंगे? 

सोयाबीन से भंग होता मोह

मालवा क्षेत्र की मुख्य खरीफ फसल सोयाबीन ही है, जिसे अंचल के किसान प्रति वर्ष बोनी कर उत्पादन लेते हैं। हालांकि वर्तमान में सोयाबीन की फसल का लागत खर्च बढ़ता जा रहा है और दाम कम मिलने लगे हैं। जबकि दूसरी ओर कृषि विशेषज्ञ किसानों को अंतरवर्तीय फसलें लेने की सलाह देते हैं, ताकि भूमि की उर्वरता बनी रहे। लेकिन अफसोस की बात है कि इस नेक सलाह की उपेक्षा कर किसान हर साल उसी खेत में गत वर्ष ली गई फसल की पुनरावृत्ति करते हैं। विदित ही है कि किसी भी खेत में जब हर साल एक ही तरह की फसल ली जाती है तो उस खेत में पोषक तत्वों की कमी होने से भूमि की उर्वरता कम होने लगती है। इससे वांछित उत्पादन नहीं मिल पाता है। इसीलिए कृषि विशेषज्ञ फसल परिवर्तन की सलाह देते हैं। अलग तरह की फसलें लेने से उनकी गहरी-उथली जड़ों से भूमि का स्वत: कायापलट हो जाता है और भूमि की उर्वरता में सुधार होने लगता है। जिससे फसलोत्पादन में वृद्धि होती है।

मक्का की अच्छी कीमतें

यहां नागदा जिला धार के किसान श्री कृष्णा सांखला का उल्लेख प्रासंगिक है, जो पिछले कई वर्षों से अपने खेत में  सोयाबीन ही बोते थे। लेकिन इस बार उन्होंने फसल परिवर्तन करते हुए अपने 350 बीघे के खेत में बेड मेड विधि से मक्का की बोनी की है। फसल परिवर्तन की इस जोखिम के पीछे उनका तर्क यह है कि लगातार सोयाबीन बोने से उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई है, इसलिए लागत खर्च बढ़ रहा है। जबकि खर्च के मुकाबले दाम कम ही मिल रहे हैं। अब मक्का की कीमत भी अच्छी मिलने लगी है। जबकि सोयाबीन की तुलना में मक्का का लागत खर्च कम ही है। इसीलिए उन्होंने बड़ी जोखिम लेते हुए सोयाबीन की जगह मक्का लगाई है। फसल परिवर्तन का उनका यह प्रयास क्या रंग लाएगा यह तो वक्त बताएगा। लेकिन सवाल यह है कि श्री सांखला की तरह क्या अन्य किसान इस साल खरीफ में फसल परिवर्तन की जोखिम उठाएंगे? इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है, क्योंकि अभी खरीफ की बोनी के आंकड़े आने में देर है। 

यहां नागदा जिला धार के किसान श्री कृष्णा सांखला का उल्लेख प्रासंगिक है, जो पिछले कई वर्षों से अपने खेत में  सोयाबीन ही बोते थे। लेकिन इस बार उन्होंने फसल परिवर्तन करते हुए अपने 350 बीघे के खेत में बेड मेड विधि से मक्का की बोनी की है। फसल परिवर्तन की इस जोखिम के पीछे उनका तर्क यह है कि लगातार सोयाबीन बोने से उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई है, इसलिए लागत खर्च बढ़ रहा है। जबकि खर्च के मुकाबले दाम कम ही मिल रहे हैं। अब मक्का की कीमत भी अच्छी मिलने लगी है। जबकि सोयाबीन की तुलना में मक्का का लागत खर्च कम ही है। इसीलिए उन्होंने बड़ी जोखिम लेते हुए सोयाबीन की जगह मक्का लगाई है। फसल परिवर्तन का उनका यह प्रयास क्या रंग लाएगा यह तो वक्त बताएगा। लेकिन सवाल यह है कि श्री सांखला की तरह क्या अन्य किसान इस साल खरीफ में फसल परिवर्तन की जोखिम उठाएंगे? इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है , क्योंकि अभी खरीफ की बोनी के आंकड़े आने में देर है। 
 

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