जाल में फंसा किसान

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(कृषक जगत विशेष)

इंदौर। देश के किसानों को अन्नदाता कहा जाता है, क्योंकि वह देशवासियों की उदरपूर्ति करते हैं।लेकिन अफ़सोस की बात है, कि दूसरों का पेट भरने वाले किसान न तो कभी कर्जमुक्त हो पाए और न कभी उनका कठिनाइयों से पीछा छूटा। कभी प्राकृतिक आपदा तो कभी कुछ। अब तो उनके साथ कपट भी किया जाने लगा है। कुशासन  के चलते 'क' के जाल में फंसा किसान इससे कब बाहर आएगा यह कहना कठिन है।

कर्ज :

पुरानी कहावत है कि भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है और कर्ज में ही मर जाता है। यह बात अब भी उचित लगती है। सरकारें किसानों को वोट बैंक समझ कर कर्जमाफी की घोषणा तो करती है , लेकिन शत -प्रतिशत कर्जमाफी कभी नहीं होती। कांग्रेस ने मप्र में सत्ता में आने पर किसानों का दो लाख तक का कज़ऱ् दस दिन में माफ़ करने की घोषणा की थी, लेकिन सत्ता में आने के 6 माह बाद भी यह अभी तक पूरी नहीं हो सकी है।हालांकि कई किसानों का कुछ जरूर माफ़ हुआ है , लेकिन बहुत से ऐसे किसान भी हैं जिनकी कर्जमाफी नहीं होने से उन्हें नया कज़ऱ् लेने में परेशानी हो रही है, जबकि खरीफ का सीजन सामने है। ऐसे में किसान किसी साहूकार से कर्ज लेकर फिर कज़ऱ् में डूबेगा। 

कपट :

 ग्रामीण क्षेत्र का किसान आमतौर पर भोला होता है, जो सरकारी अधिकारी , व्यापारी और अन्य पर सहज विश्वास कर लेता है , लेकिन वह इसी भोलेपन  के कारण कपट का शिकार हो जाता है। पिछले कुछ दिनों से किसानों के साथ धोखाधड़ी की घटनाएं बढ़ती जा रही है। हाल ही में इंदौर के एक व्यापारी ने देपालपुर तहसील के विभिन्न गांवों के 200  से अधिक किसानों से उनके घर जाकर बाजार भाव से 150 -200  रुपए प्रति क्विंटल ज्यादा कीमत देने की बात कहकर करीब ढाई करोड़ रुपए का हजारों क्विंटल गेहूं खरीद लिया और अलग -अलग तारीख के चेक दे दिए , जो किसानों द्वारा निर्धारित तारीख को जमा करने पर अनादरित हो गए। अपनी खून पसीने की कमाई पाने के लिए किसानों को प्रदर्शन करना पड़ा। प्रशासनिक हस्तक्षेप से अब तक मात्र 9  लाख रु., का भुगतान हुआ है और किसानों का व्यापारी के घर पर धरना जारी है। किसानों के साथ धोखाधड़ी की ऐसी ही घटनाएं  दसाई जिला धार ,खंडवा और हरदा जिले की भी सामने आई है। इसके अलावा  नकली खाद बनाने  के मामले भी सामने आए हैं। उज्जैन जिले के बाद अब इंदौर जिले में भी प्रसिद्ध ब्रांड के नाम से नकली खाद की पैकिंग करने का मामला पकड़ाया है। ऐसी घटनाओं से किसान का नुकसान तो होता ही है , वह खेती के प्रति भी हतोत्साहित होता है।

कुशासन :

सरकार लाख कितने भी दावे करे लेकिन किसानों को समय पर और सही गुणवत्ता वाली कृषि सामग्री प्राय: नहीं मिल पाती है।यह एक कटु सत्य है। कतिपय अधिकारियों /कर्मचारियों के कारण किसानों को सरकारी अनुदान वाली घटिया सामग्री लेने को मजबूर होना पड़ता है। देरी से मिली इस घटिया सामग्री से उत्पादन भी प्रभावित होता है। इसके अलावा किसानों को गांवों से आकर खेती से जुड़े छोटे -छोटे  कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। मंडियों में भी समुचित सुविधाओं का अभाव रहता है।किसानों के जरिए अच्छा कर संग्रहण करने के बाद भी मंडियों में किसानों को पानी और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना पड़ता है। किसानों की उपज रखने के स्थानों पर मंडी के कथित संरक्षण में व्यापारियों द्वारा अतिक्रमण किए जाने के अलावा फसल की कीमत , उसकी तुलाई से लेकर भुगतान में  कई दिनों के होने वाले विलम्ब से  परेशान होते देखा जा सकता है।शिकायतों की यह फेहरिस्त लम्बी हो सकती है ,जो अंतत: कुशासन की ही परिचायक है। 

कठिनाइयां :

किसान के जीवन में कठिनाइयां कभी कम नहीं होती । निर्धनता के बीच निजी सामाजिक जिम्मेदारियों  का भार उठाने के लिए कर्ज लेने वाले किसान कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि जैसी होने वाली प्राकृतिक आपदाओं से रूबरू होते हैं।फसल पकने पर गिरने वाला मावठा उनकी उम्मीदों पर भी पड़ता है। फसल नुकसानी की भरपाई के लिए किए गए फसल बीमे में भी उनको नियमों और शर्तों में ऐसे उलझाया जाता है, कि अग्रिम रूप से प्रीमियम जमा करने के बाद भी उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता। यदि किसी को मिलता भी है तो वह ऊंट के मुंह में जीरा साबित होता है।ऐसे में फसल का लागत मूल्य भी नहीं निकल पाना किसानों को फिर कर्ज के कुँए में धकेल देता है।जहां से उनकी आवाज़ किसीको सुनाई नहीं देती है।इन हालातों में किसानों को 'क' के जाल से मुक्त कराने के लिए कोई ठोस कदम जल्द उठाने की जरूरत है, अन्यथा देश का किसान यूँ ही कज़ऱ् के बोझ से कराहता रहेगा। 
 

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