मध्यप्रदेश में अब आगे क्या

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मध्यप्रदेश में अब आगे क्या..! 

लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की इतनी करारी पराजय के बाद मध्यप्रदेश में स्वाभाविक तौर पर लोगों की नजरें इन सवालों के उत्तर पर टिक गई हैं कि क्या चंद्रबाबू नायडू की भाँति कमलनाथ भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की पहल करेंगे..?

क्या प्रदेश के मंत्रीगण पद छोड़कर नैतिकता दिखाएंगे ? मुख्यमंत्री बदला तो नया कौन होगा? मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार की उम्र अब कितने दिन और? कांग्रेस और सरकार को समर्थन दे रहे विधायकों में भगदड़ मचने में अभी और कितना वक्त लगेगा ? 

नतीजों पर नजर डालें तो आजादी के बाद हुए किसी भी चुनाव में मध्यप्रदेश में कांग्रेस को इतनी विकट और शर्मनाक पराजय नहीं झेलनी पड़ी। छिंदवाड़ा से नकुलनाथ ने पिता कमलनाथ की नाक न रखी होती तो प्रदेश से कांग्रेस के प्रतिनिधि जनाधार पर पूरी तरह झाडू लग चुका होता। 

प्रदेश में कांग्रेस के सभी क्षत्रप हार गए लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने देश को चौंकाया। साठ के दशक से प्रदेश और केंद्र की राजनीति में सक्रिय ग्वालियर का सिंधिया परिवार इससे पहले तक अजेय रहा। माधवराव सिंधिया के विजयरथ को अटलबिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज भी नहीं रोक पाए। नरसिंह राव ने जब कांग्रेस की टिकट से वंचित कर दिया था ऐसे गाढ़े वक्त में भी वे अपनी क्षेत्रीय पार्टी विकास कांग्रेस के पताके के नीचे जीत गए। 

लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर समुद्र के भीतर पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली विध्वंसक टारपीडो की तरह चली।

मध्यप्रदेश क्या देश के बड़े-बड़े क्षत्रपों की नौकाएं डूब गई और वे अब भौचक से खड़े हैं। भोपाल में दिग्विजय सिंह बनाम साध्वी प्रज्ञा के मुकाबले में दिग्विजय सिंह का हारना उसी दिन से शुरू हो गया था जब उनके समर्थक में साधुओं ने लाल मिर्च के हवन का टोटका किया। फिर अमित शाह के समानांतर जब दिग्विजय सिंह साधुओं की भगवा मंडली के साथ भोपाल की गलियों में निकले तो उनका यह कृत्य मुझ जैसे सतही समझ वाले पत्रकार को भी डूबते को तिनके का सहारा सा लगा। 

मुख्यमंत्री रहने के बाद जिन मुश्किलों में उनके बेटे नकुलनाथ छिंदवाड़ा से लगभग 34 हजार मतों और वे खुद विधानसभा उपचुनाव 22 हजार मतों से जीते तो यह किसी हार से कम दर्दनाक नहीं।  मध्यप्रदेश के वोटरों ने क्षत्रपों की वंशवादी राजनीति पर पूर्णविराम लगा दिया। अर्जुन सिंह जो कभी राष्ट्रीय नेतृत्व के विकल्प माने जाते थे उनके पुत्र अजय सिंह राहुल सीधी से एक गृहणी रीति पाठक से इतने करारे मतों से हारे कि अब उन्हें यह कहने का हौंसला ही नहीं बचा कि ईवीएम के जरिए उन्हें फिर हरा दिया गया। 

मध्यप्रदेश के वोटरों ने जिस तरह विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कई क्षत्रपों को निमोनिया से कंपा दिया था उसी तरह लोकसभा चुनाव में भी प्राय: सभी की लू उतार दी।

चौकीदार चोर है..जुमले के साथ राहुल गांधी जनता के बीच रामलीला के मसखरे से बनकर रह गए। शुरूआती दिनों में जरूर राफेल विवाद जनता को चौकाने वाला था। लेकिन पार्लियामेंट और सुप्रीम कोर्ट से भ्रम का जाला साफ कर दिए जाने के बाद जनता समझने लगी कि चौकीदार चोर है का नारा सिफऱ् मसखरी के सिवाय और कुछ नहीं।  लगभग सभी मोदी के विकास के फार्मूले से ज्यादा इस बात से अभिभूत लगे कि भारत का यह पहला महान नेता है जिसने स्वाभिमान से जीना सिखाया। सबकी जुबान पर कश्मीर के आतंक और पाकिस्तान को सबक सिखाने की बातें गौरवपूर्ण तरीके से निकलीं। शहरी मतदाताओं को राष्ट्रवाद भा गया। 

ग्रामीण मतदाताओं तक पैठ बनाने का फार्मूला भाजपा ने कांग्रेस से ही चुराया था। जिस मनरेगा ने यूपीए टू को लौटाया था उसी में भाजपा ने अपनी सफलता के सूत्र खोज लिए।

गरीब वर्ग के लिए प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, और आयुष्मान जैसी योजनाओं ने मोदी को हातमिताई सा बना दिया। अपने मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने धैर्य से काम नहीं लिया। सत्ता मिलने के बाद उसके मंत्री नेताओं का आचरण ऐसा था जैसे कि भुखमरों को मिठाई की थाल मिल गई हो। 

बदलापुर की पालटिक्स ने नजरों से गिराया। पोस्टल बैलेट से निकले वोटों ने यह बताया कि अधिकारी, कर्मचारी गाजरघास नहीं है कि जब भी मन पड़े फावड़े लेकर पिल पडि़ए। 

तबादलों की झड़ी और पोस्टिंग की लेनदेन ने कमलनाथ सरकार पर गहरा दाग लगाया। ये पूरे चुनाव में भी अधिकारी कर्मचारी वर्ग को धमकाते से दिखे। छह महीने की सरकार में धैर्य कम अनाड़ी पन ज्यादा दिखा। और अब आखिरी में शुरुआती सवालों के मेरे अनुमानित उत्तर। कमलनाथ जी साख वाले मुख्यमंत्री हैं। उनमें कारपोरेटी ठसक है, लिहाजा वे अपनी छवि बचाने के लिए नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं। लेकिन यह इस्तीफा राजभवन नहीं बल्कि 10 जनपथ को देंगे। सब मंत्री एक जैसे फेल्योर लिहाजा अब इस्तीफा का कोई अर्थ नहीं, जो आलाकमान कहेगा वही शिरोधार्य। 

मंत्रीपद से वंचित कांग्रेस और उसके समर्थक विधायकों में भगदड़ मचेगी लेकिन कम से कम पखवाड़े भर का वक्त लगेगा। गोट फिट होने और सौदेबाजी तय होने के बाद यह शुरू होगा। कमलनाथ सरकार उमर पूरी नहीं कर पाएगी यह तो सुनिश्चित है। अब रही भाजपा की बात तो शिवराजसिंह चौहान संभवत: केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।मध्यप्रदेश में कैलाश विजयवर्गीय उसी तरह स्थापित होंगे जैसे की पिछले चुनाव में यूपी फतह के बाद केंद्र में अमित शाह और अंत में इस चुनाव में भाजपा से ज्यादा गालियां आरएसएस को मिलीं सो आप चाहें तो देशव्यापी इस समूची जीत का तीन चौथाई क्रेडिट उसे दे सकते हैं..।

  • जयराम शुक्ल
  • मो. : 8225812813
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