अन्नदाताओं के लिए - सरकार का दोहरा चरित्र

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500 रुपये बोनस की घोषणा को 250 रुपये में निपटाने की कोशिश, राज्य का किसान भी मान रहा है कि भागते भूत की ही लंगोट भली है! न मिलने से अच्छा है जो मिले वही ठीक है। लेकिन यह तो तय हो गया है कि भारत के लोकतंत्र में राजनैतिक घोषणाओं की कोई भी मर्यादा तय नहीं है। राजनैतिक दलों के लिये घोषणाएं सिर्फ गादी हासिल करने का सस्ता सुलभ एवं शीघ्र फल प्राप्त करने का एक मात्र तरीका  है। जबकि नौकरशाही सिर्फ मालिक की भाषा बोलती है। मालिक बदलते योजनाओं की शब्दावली को नये सिरे से परिभाषित किया जाने लगता है।

सोयाबीन किसान असमंजस में

अंतत: किसानों का मक्का का भावान्तर फ्लैट भाव अदा करने की अनुमति चुनाव आयोग ने मप्र सरकार को दे दी है। लेकिन राज्य का सोयाबीन किसान अभी भी अनिश्चय की स्थिति में है। मप्र की नई सरकार ने मक्का का भावांतर देने की अनुमति चुनाव आयोग से मांगी थी। कितनी बड़ी विडंबना है कि लगभग छ: माह पूर्व तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री ने खरीफ फसल सोयाबीन एवं मक्का का सरकारी मंडियों में सर्मथन मूल्य से कम भाव पर विक्रय होने पर इन उपजों पर 500 रुपये का भावांतर फ्लैट रेट राज्य शासन की ओर से देने की घोषणा की थी। लेकिन राज्य में नव नियुक्त सरकार ने इस घोषणा की पूर्ति को गंभीरता से लेने के बजाय इसे पूर्व सरकार के मुख्यमंत्री की घोषणा मानकर इसे टालने की कोशिश की थी। 

मक्का पर 250 रु. फ्लैट भावांतर

गत वर्ष राज्य में खरीफ बिक्री के लिये 17 लाख 75 हजार किसानों ने पंजीयन कराये थे। जिसमें 42 लाख मैट्रिक टन उपज का विक्रय किसानों ने भावांतर योजना के तहत किया है। लेकिन छ: माह के समय अंतराल के बाद अब राज्य सरकार ने मात्र मक्का की उपज पर 250 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से फ्लैट भावांतर देने की अनुमति चुनाव आयोग से ले ली है। लेकिन सोयबीन की फसल पर घोषित भावांतर पर राज्य शासन की चुप्पी संदेह पैदा करती है। जबकि पूर्व सरकार के मुख्यमंत्री की घोषणा को मीडिया एवं  तत्कालीन राज्य जनप्रतिनिधियों द्वारा इसे प्रति क्विंटल 500 रुपये के फ्लैट भाव के रुप में प्रचारित एवं प्रसारित किया गया था। लेकिन 500 रुपये के बजाय अब 250 रुपये देने की वर्तमान सरकार की नीति पर राज्य की नौकरशाही का यह कहना कि पूर्व सरकार के नोटिफिकेशन में फ्लैट भाव 500 रुपये तक देने का जिक्र है। जिसे वर्तमान सरकार ने मक्का के लिये 250 रुपये माना है। 

कूटनीति का शिकार किसान

राजनैतिक दलों की आपसी वैमनस्यता एवं शब्दों से भिन्न अर्थ निकालने की कूटनीति का शिकार यदि राज्य के सीधे-सच्चे किसान को होना पड़े तो शायद यह उस लोकतंत्र के लिये ज्यादा दुखदायी होगा जहां किसान अन्नदाता के रुप में प्रतिष्ठित है। नियत तारीख 20 अक्टूबर 2018 से 19 जनवरी 2019 की बीच की अवधि फ्लैट भावांतर योजना के लिये निर्धारित होने से राज्य के किसानों ने निर्धारित अवधि में सभी आवश्यक कार्यों को छोड़कर सक्रियता से योजना में विक्रय किया था। जबकि योजना की समाप्ति के तुरंत बाद उपरोक्त जिंसों के मंडी भावों में अत्याधिक तेजी आयी थी। लेकिन 500 रुपये के फ्लैट भावांतर के कारण किसानों ने अपने निर्धारित कोटे की सम्पूर्ण फसल का विक्रय कर चुके थे। नोटिफिकेशन में राशि के आगे लिखे शब्द 'तकÓ को वर्तमान सरकार ने भावांतर मूल्य की अंतिम सीमा मानकर किसानों को यह दिखाने की कोशिश की है कि उसने पूर्व सरकार की घोषणा को पूरा कर दिया है। चूंकि बिक्री समय दौरान राज्य की मंडियों में सोयाबीन एवं मक्का का भाव सर्मथन मूल्य से रुपये 800 से 1000 के न्यूनतम स्तर पर था। ऐसे में वर्तमान सरकार ने मक्का किसानों को 250 रुपये के बोनस को देकर शासन की उस घोषणा की मात्र औपचारिकता को पूरा करने का प्रयास किया है। इसमें किसानों को न्यायोचित भाव नहीं मिल सका है। जबकि सोयाबीन किसान को अभी भी भ्रम की इस अनिश्चितता में डालकर रखा है कि उसे तत्कालीन सरकार द्वारा घोषित भावांतर राशि का लाभ मिल भी सकेगा या नहीं! या वर्तमान सरकार इसे 500 रुपये 'तकÓ के शब्दजाल से कटौता के रुप में नये आकलन में पेश करेगी।

  • विनोद के. शाह, मो. : 9425640778 
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