तेज चुनावी हवाओं में गुम हुई हकीकत सांड सामने खड़ा है और हम मक्खी मार रहे हैं 

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मैनेजमेंट की किताबों में एक पाठ पढ़ाया जाता है 'ऑर्गनाइजेशनल कॉन्फ्लिक्ट' किसी भी बड़े संस्थान को, अपने उद्देश्य तक पहुँचने और जरूरी कामों के लिए बहुत सारे अलग-अलग योग्यता और क्षमता वाले विशेषज्ञ लगते हैं। लेकिन सामान्यत: वहां हर व्यक्ति सिर्फ अपनी योग्यता, अपनी समझ और अपने काम को महत्वपूर्ण मानकर, शेष को गैर-जरूरी या अपने काम में बाधा मानने लगता है।

यह मानव स्वभाव है। इसी से शुरू होने वाला 'संघर्ष' ऑर्गनाइजेशनल कॉन्फ्लिक्ट है। इसी के रहते रेल पटरी से उतर जाती है। इसीलिए, शीर्ष पर बैठे आदमी को सबमे समन्वय बनाकर संस्थान को उसके मूल उद्देश्य की तरफ ले जाना होता है। यही बात देशों और दुनिया पर भी लागू होती है। सामान्य शब्दों में कहें तो देश के रूप में, अपनी आजादी के साथ ही हमने तय किया था कि सबको, सब कुछ, समान रूप से मिले, जिसमें भोजन भी शामिल है। अब थोड़ा सा नजर घुमा कर खेती, किसानी, किसान और गांवों की तरफ और अपनी खुद की भोजन की थाली की तरफ देखें, तो पाएंगे कि जिंदगी की सबसे पहली जरूरत भोजन की समानता में हम 'फेल' हो गए हैं।

शेष बातें तो होती रहेंगी, एक प्रश्न का उत्तर खुद ही ढूंढिए। क्या आपकी ठीक अगली पीढ़ी सिर्फ रोटी और चावल ही खायेगी? बात मानिये, दाल और सब्जी शायद पड़ौसी से भी न मिले, क्योंकि वह भी दलहन और तिलहन के बजाय गेहूं और धान ही उगा रहा है। परदेस से आई दाल और तेल कितने सुरक्षित होंगे, या समय पर मिल ही जाएंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं।  अभी पिछले एक-दो दिनों में ही, मुझे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के पड़ौसी जिले सीहोर के एक हिस्से का पूरा चक्कर लगाना पड़ा था। हर दस किलोमीटर या उससे कम दूरी पर सैकड़ों नहीं, हजारों ट्रैक्टर ट्रॉलियों में, भरी दुपहरी और चिलचिलाती धूप में, किसान अपना गेहूं बेचने के लिए, बिना किसी सुरक्षा, सुविधा के सड़कों पर खड़े होकर, अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। कुछ दिनों पहले आई बारिश, और ओला-वृष्टि से बर्बाद हुआ गेहूं भी वहीं दिखा था। हमारी अपनी, रोज की बातचीत या आनंदित जीवन और उन हालात को देखकर लगता है कि वाकई में हम दो दुनिया हैं, जिन्हें एक-दूसरे के बारे में कुछ भी नहीं मालूम।

इस असफलता की जिम्मेदार हमारी अलग-अलग सोच है। नेता, अफसर, व्यापारी, वैज्ञानिक और किसान सब अलग-अलग सोचते हैं, और अपनी ही जिद व सोच की हद को आखिरी मानकर काम करते हैं।

सवाल ये है कि ये दृश्य उन लोगों को क्यों नहीं दिखते, जिन्होंने सबको साथ लेकर, सबके विकास की जिम्मेदारी ली है, या जिनको इस बात का मेहनताना मिलता है या इस बहाने जो ऐश-अय्याशी कर रहे हैं, और ताकतवर बने फिर रहे हैं।

नेताओं का मोहरा बने धान-गेहूं

हाँ, मैं अपने देश के बड़े हिस्से में हो रहे गेहूं के अति उत्पादन और उससे बनी हालत की ही बात कर रहा हूं। देश का दूसरा हिस्सा जो धान उगाता है, वहां यही स्थिति धान की फसल आने पर होती है।  अपने यहां कहा जाता है कि भले ही रखरखाव कैसा भी हो, पर 'गाय एक राजनीतिक प्राणी' है। उस पर चुनाव जीते या हारे जाते हैं। ठीक वैसे ही गेहूं और धान भी अब 'राजनीतिक फसलें' बन गई हैं। सारी सरकारें, इनकी खरीद और उस पर बोनस या कई तरह के वादों के साथ लोकप्रियता पाने में अपनी जान लगा देती हैं, क्योंकि इनसे भी चुनाव की हार-जीत तय होती है। साठ का दशक जिन्होंने भी ध्यान से देखा हो, उन्हें अमेरिका का लाल गेहूं, और उसके लिए भी लगती लम्बी-लम्बी लाइनें याद होंगी। हमारे तब के राष्ट्रीय नेतृत्व ने अपनी तत्कालीन बुद्धि से, देश के सम्मान के लिए, उत्साह के साथ और गुस्से में 'हरित क्रांति' का संकल्प लिया था, और देश को उस संकट से बाहर ले आये थे। लेकिन, बाद के पचास-साठ सालों में आये नेतृत्व को, समय के साथ बदली सब चीजों को मिलाकर और देखकर पुराने संकल्प की समीक्षा क्यों नहीं करनी थी ?

सत्ता ने बनाया धृतराष्ट्र

वोटों की जीत-हार ने हम सबको इतना अँधा और असंवेदनशील बना दिया है, कि हमारा देश, बाकी सारी चीजों को छोड़कर अब सिर्फ गेहूं और धान उगाता है और यह जानते हुए उगाता है कि इस उत्पादन और इस विधि से हम अंधी गहरी गुफा में जा रहे हैं।

संभव है, चुनाव में व्यस्त कई लोगों को, यह बात मालूम होना तो दूर, समझ में ही न आये या समाज के एक बड़े हिस्से के लिए यह बात सिवाय अखबारों की 'सुर्खी' के कुछ भी न हो। लेकिन, ये चीजें सबके ध्यान में आनी चाहिए व स्थितियां सुधारी भी जानी चाहिए।

माना कि अपने निर्णय के लिए, हम आजाद हैं, पर सरकार से उम्मीद की जा सकती है कि देशहित में, परिस्थितियों को देखते हुए वह अपने साधनों से सबको समझाए, मनायें या विधि प्राप्त अधिकार से मनवायें कि समाप्त हो रही जैव और अन्न विविधता के लिए कौन सी फसलें लेनी हैं, या ली जा सकती हैं। अभी तो सरकारी खरीद और राजनीतिक बोनस के कारण गेहूं और धान ही सब किसान उगाते हैं। यह जानते हुए कि दोनों को बहुत पानी लगता है, और उतना पानी अपने यहां नहीं है। रोटी हो या चावल, उसके लिए दाल भी तो लगती है,जो बहुत-बहुत कम है। खाने का तेल भी लगता है। हम खाने के तेल के मामले में दुनिया के सबसे बड़े आयातक देश हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम अपनी जरूरत का 60 प्रतिशत खाने का तेल आयात करते हैं। प्रति वर्ष इस पर 73,048 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च हो जाती है। दालों और तेल की इस भयंकर कमी के बावजूद, खेती में हम सबकी पहली पसंद दलहन और तिलहन का उत्पादन नहीं है।         

राज्य सरकारें दिल्ली में मिलने कृषि कर्मण ईनामों के लिए कुछ भी आंकड़े दे दे, पर पूरे देश में दलहनों और तिलहनों का रकबा निरंतर घटता जा रहा है। इनके समर्थन मूल्य होने के बावजूद, जिस भाव से इन फसलों के उत्पादन मंडियों में बिक रहे हैं, उन्हें देखकर या तेल के निरंतर आयात निर्णय देखकर तो लगता है कि 'दाल में काला नहीं है, पूरी दाल ही काली है'।

सरकार है अपराधी

नब्बे के दशक में इस मामले में मिली थोड़ी सी सफलता को पूरे अदूरदर्शितापूर्ण रवैये, बेईमानी और चालबाजी से पीछे धकेला गया है। सरकार नाम की संस्था इसके लिए सोलह आना जिम्मेदार ही नहीं अपराधी भी है।

सारी दुनिया में 'खाद्य-सुरक्षा' को लेकर बड़ी चिंता है। दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत ने 'खाद्य-सुरक्षा' की परिभाषा में जिन्दा रहने के लिए, सिर्फ पेट भरने को 'खाद्य सुरक्षा' नहीं माना है। भोजन के शुद्ध, पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होने की बात भी कही है। लेकिन, किसे चिंता है कि अकेले गेहूं और चावल के उत्पादन से यह संभव नहीं है।

ऊपर से बीमार धरती में कई रोग लेकर पैदा हो रहे गेहूं और चावल की पौष्टिकता और स्वास्थ्यवर्धकता पर तो कोई बात ही करना नहीं चाहता। चलिए, बात आपके हाथ में नहीं रही। लेकिन जिस बम्पर तरीके से गेहूं और धान का उत्पादन हो रहा है, उसके सही भंडारण और खरीद की व्यवस्था पर तो 'प्लीज' चिंता कर लें। सूचना के अधिकार के तहत, किसी ने भंडारण के अभाव में खराब होने वाले अनाज की जानकारी मांगी थी। उसे बताया गया था कि पिछले दस सालों में ही, अपने देश में दस हजार करोड़ रुपये मूल्य का अन्न खराब हुआ है।

ढांचों के खड़े होने और उससे तथाकथित रूप से बढ़ी भण्डारण क्षमता दिखाई जरूर जाती है,पर नुकसान में कोई कमी नहीं हुई है,बल्कि अब तो, नुकसान के बाकायदा 'नॉर्म्स' तय हो चुके हैं।

मुझे मालूम है कि मेरी इन बातों से, आप में से कई लोगों की जिंदगी पर कोई असर नहीं होगा, माना कि आप सब अपनी जगह मजे में हैं,लेकिन जिस देश में अपन रहते हैं, उस पर असर जरूर होता है। इसी कारण वह संकट में आता जा रहा है।बड़ी बात तो यह है कि थोड़े ही दिनों में, देश की किस्मत का फैसला होना है, और सबके देखते-समझते ये बातें हमारे चुनावों में बहस के मुद्दे नहीं हैं।

चिलचिलाती धूप में खड़ी हजारों ट्रॉलियां, सड़ता-गलता-बहता अनाज, आश्चर्यजनक रूप से झंडे लगी जीप-कारों और महंगी-महंगी एसयूवी में बैठे लोगों को क्यों नहीं दिखते ? 

चूँकि ये सब लोग, बहुत तेज रफ़्तार में हैं, इसलिए गेहूं खरीदी की उन पर्चियों को तो वे देख ही नहीं सकते,जिन पर उन्हीं का कहा बोनस नहीं लिखा जा रहा है। कहीं-कहीं तो पर्ची भी नहीं दी जा रही है। इससे किसान का भरोसा टूटता जा रहा है।इन्हीं दिनों गेहूं की खरीद पर हमारे मुख्यमंत्रीजी का एक रस्मी बयान आया था। उसे देखकर मुझे प्रो.योगेंद्र यादव का लिखा एक वाक्य याद आया कि सांड सामने खड़ा है,और हम मक्खी मार रहे हैं।

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