चुनावी मुद्दे - खेती किसानी की अनदेखी

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मुद्दे अनछुए
  • फसल के गिरते दाम
  • बीमा कंपनियों की चांदी, किसान ठनठन गोपाल
  • पीएम 'आशा' किसानों की निराशा
  • मंडियों में गदर, समर्थन मूल्य किधर?
राजनीतिज्ञों का धोखा, अफसरों की अनदेखी, बिचौलियों की लूट 

अपने देश-प्रदेश ने पिछले दो-ढाई साल में,चार पांच तो बड़े-बड़े और कई छोटे-मोटे स्थानीय किसान आंदोलन देखे हैं। ये आंदोलन इतने प्रभावी तो थे ही,कि पूरे देश का ध्यान उन पर गया था। मध्यप्रदेश के मंदसौर में गोली चली,जानें गईं और उसकी आंच से पड़ौसी राज्य व जिलों में सार्वजनिक संपत्ति बड़ी मात्रा में तबाह भी हुई।

लगभग पच्चीस हजार से ज्यादा किसान, दो सौ संगठनों के झंडे लिए, महाराष्ट्र की सड़कों पर मीलों नंगे पाँव चले थे, और कुछ घंटों के लिए ही सही, उन्होंने मुंबई को फिरौती पर ले ही लिया था। दिल्ली के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर भी ऐसे ही आंदोलन हमने देखे हैं। जंतर-मंतर के आंदोलन में हमने देखा था कि संसार के ध्यानाकर्षण के लिए, कोई भी व्यक्ति, अपने आप के प्रति कितना वीभत्स हो सकता है।

कहीं हजारों लीटर दूध ढोलने, सड़कों पर प्याज, टमाटर या लहसुन फेंकने या मंडी प्रांगणों में अपनी ही उपज का उचित भाव न मिलने से उस में आग लगाने की कई घटनाएं भी हमने देखी हैं।  किसी भी मासूम को, जो इस देश की राजनीति को आधी-अधूरी ही जानता हो, यही लगेगा कि आने वाले चुनावों में स्वाभाविक रूप से बहस के प्रमुख मुद्दे तो ये ही होंगे,या शायद इन पर ही, चुनाव का निर्णय निकले।

भारत की 61 प्रतिशत जनता खेती या उससे सम्बंधित आजीविका में है, जो अभी गंभीर संकट में है, करीब 16 करोड़ परिवार इससे पलते हैं। इनकी हालत सुधारने के लिए बनी स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट पिछले बारह साल से अनदेखी पड़ी है। पिछली संसद को, इस पर बात करने के लिए दस मिनट भी नहीं मिले। लेकिन,ये चुनाव के मुद्दे नहीं हैं। क्योंकि, किसानों का नेतृत्व पूर्णकालिक किसानों के हाथ में नहीं है। जो भी आज किसानों के नेता हैं, वे कहीं न कहीं,किसी राजनीतिक दल में भी भरती हैं व उस दल के विचार व अनुशासन से बंधे हैं। आन्दोलनों के समय,जिसे किसान नेतृत्व कहा जाता है, उसकी खुद की विश्वसनीयता बहुत जल्दी खत्म हो जाती है,और सरकारी लाभ लेने वाले बड़े और मझौले किसान, सचमुच के मुद्दों को चर्चा में आने ही नहीं देते।

भारत में लोकसभा का चुनाव चल रहा है, पर किसी भी गाँव-देहात में, रास्ते चलते,  बहस के ठीये-ठिकानों पर या आम विमर्श में ये मुद्दे तो नहीं दिख रहे हैं। हाँ, 'केक' पर 'क्रीम' लगाकर, जैसे उसे सुन्दर बनाया जाता है, वैसे ही इन बातों का जिक्र भाषणों और घोषणा पत्र में जरूर है। लेकिन, संघर्ष के मूल मुद्दे ये नहीं हैं।

गाँवों में भी एक पक्ष राष्ट्र के सम्मान, सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मिली पहचान सहित अपनी गहरी जड़ों वाले संगठन पर ही उम्मीद लगाए बैठा है,तो दूसरा पक्ष गरीबी को अपनी तुरुप बनाकर, निश्चित आय गारंटी योजना को इस तुरुप के इक्के की तरह उपयोग करते बैठा है।

क्षेत्रीय दलों की बंदर-बांट

क्षेत्रीय दल भी बजाय क्षेत्रीय समस्याओं के,व्यक्ति,जाति और सम्प्रदाय के कार्ड खेलकर त्रिशंकु लोकसभा की कामना संजोये बैठे हैं, ताकि उन्हें भी सत्ता में भागीदारी मिल सके।

एक चुनाव विश्लेषक कहते हैं कि बीजेपी का भरोसा चार 'एम' (मोदी, मीडिया, मनी और मंदिर) पर है, तो प्रतिपक्ष सत्ता की तथाकथित नाकामियों और उसके प्रति पैदा हुई जनता की स्वाभाविक नाराजी को भुनाने की जुगत में है। खेती, बाड़ी, खाद, बीज मजदूर और उपज के वाजिब दाम की बातें तो भूल ही जाइये।

आम किसान या ग्रामीण-समाज को यदि कुरेदकर पूछा जाए, तो यही निकलकर आएगा कि -कोई भी जीते, सब भ्रष्ट हैं,और अब, कुछ भी बदलने की उम्मीद करना बेकार है। सीहोर जिले में बरसों से सार्वजनिक जीवन में काम कर चुके एक सज्जन ने कहा कि ग्राम-समाज में भीतर तक यह बात बैठ गई है कि राजनीतिक लोगों ने उनके साथ विश्वासघात किया है, अफसरों ने उनकी अनदेखी की है,बिचौलियों ने उन्हें लूटा है,प्रकृति ने उनके साथ धोखा किया है व नगरीय सभ्य-समाज ने उनसे घृणा की है।

वे कहते हैं कि मनरेगा सहित अन्य सभी सरकारी योजनाओं में ग्राम-समाज के एक ख़ास तबके, और सरकारी अमले ने जो लूट मचाई है, वह तबाही की श्रेणी में आता है। अब इसी वर्ग में,राहुल गांधी की 'न्याय' योजना में भी सेंध लगाने की जुगत भी शुरू हो चुकी है, खातों-खसरों में 'खेल' शुरू हो चुके हैं।

भारतीय चुनाव की सबसे बड़ी खासियत है कि उसके परिणामों को लेकर शत-प्रतिशत  ठीक भविष्यवाणी की ही नहीं जा सकती। कहते हैं कि मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के हाल ही में हुए चुनावों में किसानों की ऋणमुक्ति और धान के आकर्षक खरीदी मूल्य के वादों ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया है, किन्तु, कुछ लोग वहां व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही को भी बड़ा कारण मानते हैं। इनमें सभी तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं में आँखों देखे 'खेल' शामिल हैं।   

मेहनत पूरी, मजदूरी अधूरी

 सच तो यह है कि पूरी ईमानदारी से,किसान और किसानी किसी की भी प्राथमिकता पर कभी रहे ही नहीं हैं, जबकि भारत इन दिनों भीषण कृषि-संकट के दौर से गुजर रहा है। खेती के लिए जरूरी हर चीज के दाम बढ़ गए हैं, और रोज बढ़ रहे हैं, लेकिन उनके अनुपात में फसल के दाम बिल्कुल नहीं बढ़े हैं।

इस भीषण कृषि संकट की जड़ ही यहीं है। सारी मेहनत के बाद भी किसान को अपनी खुद की मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है। इसीलिए अस्सी प्रतिशत किसान आजीविका के रूप में खेती को छोडऩा चाहते हैं, लगभग सभी जानकार यह मानते हैं कि ऋणमुक्ति तो समस्या का 'क्विकफिक्सÓ इलाज़ मात्र है, स्थाई समाधान नहीं है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को मोहित करने के लिए फसल बीमा लागू की थी। इस योजना में जो कुछ भी हुआ हो, लेकिन बीमा  कंपनियों को 15,795 करोड़ रुपयों का लाभ हो गया। उनके इस लाभ की खबर मात्र ने ग्राम समाज में अविश्वास का भाव ला दिया है।

गौ सेवकों की गुंडई

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में तथाकथित 'गौ-रक्षकों' की संगठित गुंडई का आलम यह है कि किसान अपना पशुधन बेच भी नहीं सकते और पाल भी नहीं सकते, क्योंकि उन्हें खिलाने का संकट है। इसलिए पूरी-पूरी रात दूसरे किसान पूरे के पूरे परिवार के साथ खेतों की चौकीदारी करते हैं, क्योंकि भूखा पशुधन, उनकी खड़ी फसल खा जाता है। किन्तु, ये बातें चुनावी मुद्दा या सरकारी हस्तक्षेप के विषय नहीं बन पाए हैं।

असलियत में सरकारों के अंदर भी सरकारें होती हैं, जिन्हें किसी के भी भले-बुरे से कोई लेना-देना नहीं होता। इसी सरकार ने अपनी ही बनाई कमेटियों की रिपोर्टों पर दलहन-तिलहन की फसलों को बढ़ावा देने के कार्यक्रम चलाये थे। 

बाकायदा पीएम 'आशा' (अन्नदाता आय संरक्षण अभियान) योजना 2018 बनी थी। इस पर सब कुछ हुआ और देश भर में दो करोड़ टन दलहन तिलहन का उत्पादन इसी रबी में हो गया, लेकिन अब फैसला हो गया कि रबी 2018 -19 में सिर्फ नौ राज्यों (मप्र., राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र और तेलंगाना) में उनके कुल उत्पादन की पच्चीस प्रतिशत ही सरकारी खरीद होगी। यानी, किसान एक बार फिर दलालों, बिचौलियों और व्यापारियों के हाथों का खिलौना बन गया।

मंडियों में गदर

इस निर्णय की भनक लगते ही उत्पादक मंडियों में अपने समर्थन मूल्य से चना 200 से 300, सरसों 400 से 500, मसूर 600 से 700 रुपये क्विंटल कम पर बिकने लगे हैं। अब आप ही बताइये,चुनाव माथे पर है, और मंडियों में गदर मचा हुआ है,फिर भी चुनाव का निर्णय मोदी, मीडिया, मनी या मंदिर के साथ बालाकोट और बहत्तर हजार पर होना है।
 

  • कमलेश पारे, मो. 9425609231 
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