'नरवाई' की आग - नीति से नहीं नीयत से बुझेगी

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अनिश्चितताओं की दुनिया में जितने भी खेल होते होंगे या विरोधाभासों के जितने भी मुहावरे सभी भाषाओं में होंगे, वे सब भारत की खेती पर लागू होते हैं। सांप, छछूंदर, नेवले, कुँओं-खाइयों आदि वाले सारे मुहावरों का सच या सांप-सीढ़ी के खेल की अनिश्चितता यहां मिल जाएंगे। मौसम की अनिश्चितता अपनी जगह है, लेकिन मंडी में फसल के दाम न मिलना भी सारी त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है। लागत नहीं मिलने से, किसान भी हर तरह से पैसे बचाने की कोशिश करता है और बचत की गली, जैसे भी हो निकालता है। अब मार्च का महीना खत्म हो रहा है। अप्रैल आते-आते खेती में एक नया मौसम आ जाएगा। वह उत्तर भारत में 'पराली' कहलाता है और मध्यप्रदेश में इसे 'नरवाई' कहते हैं।

गेहूं कटाई के बाद अन्न तो घर पहुंच जाएगा, लेकिन शेष बचे तने वाले भाग में किसान खेत में ही आग लगा देगा और अगली फसल के लिए अपना खेत साफ़ कर लेगा। यही काम खरीफ की फसलों धान या सोयाबीन में अक्टूबर नवम्बर के दौरान होता है।

'नासा' ने सारे भारत सहित, दक्षिण एशिया के अन्य देशों की छवियाँ सारी दुनिया से साझा की थीं। उन छवियों को देखकर लगता है कि उस समय दुनिया का यह हिस्सा, पूरा का पूरा एक 'आग का गोला' बना हुआ है।

आग लगाने वाले किसान की मजबूरी यह है कि गेहूं की फसल कटाई के बाद खेत की सफाई के लिए मजदूर नहीं मिलते,मिलते भी हैं, तो बहुत महंगे मिलते हैं और मशीनों से यह काम कराओ तो 3 से 4 हजार रुपये प्रति एकड़ का खर्चा आता है। इस बढ़ी लागत की पूर्ति फसल के दाम के साथ होना संभव ही नहीं है। इसीलिए मध्य प्रदेश के हरदा जिले के अबगांव के एक किसान अंकित जाट का कहना है कि किसान का काम यदि एक रुपये की माचिस से हो जाता है, तो कई हजार रुपये क्यों खर्च करें। पूरा हिन्दुस्तान घूम आइये, इस मामले में सारे के सारे किसान यही जवाब देंगे। लेकिन, हर किसान को यह भी मालूम है कि यह कानूनी रूप से गलत है। इससे दूसरे नुकसान भी बहुत ज्यादा हैं। 

धुएं भरी सेहत

'इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट' ने तो यहां तक कहा है कि इस दौरान, चारों ओर फैलने वाले धुएं से सांस की गंभीर बीमारियां होती हैं। इन बीमारियों से देश का कोई भी शहरी इलाका भी सुरक्षित नहीं है।

इसका सर्वाधिक प्रभाव पांच साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो यह भी बताया है कि मात्र इन्हीं बीमारियों के इलाज पर अपने समाज को दो लाख करोड़ रुपये का खर्च आता है। यह राशि देश की जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा है।

शहरी समाज को तो इस समस्या या इससे उनको खुद को होने वाली स्वास्थ्य-हानि के बारे में पता ही नहीं है। शहरों के अखबार जलती हुई 'नरवाई' या 'पराली' के फोटो उस दौरान वैसे ही छापते हैं, जैसे होली और रंगपंचमी की 'गेर' के छापते हैं। राजनीति में काम करने वालों की प्राथमिकता में यह विषय कैसे हो सकता है ?

घिर जाती दिल्ली

चूँकि दिल्ली शहर, चार अत्यधिक उपजाऊ प्रदेशों से घिरा हुआ है, और उन प्रदेशों के 80 प्रतिशत किसान 'पराली' या 'नरवाई' जलाते हैं, इसलिए दिल्ली की हवा में उस दौरान मानक स्तर से बीस से तीस गुना अधिक प्रदूषण होता है। ध्यान रखें, यहाँ मामला सिर्फ धुएं का ही नहीं है। उस अपशिष्ट के साथ फसल पर उपयोग हुए कीटनाशक या अन्य जहरीले रसायनों के जलने से होने वाले प्रदूषण का भी है।

दिल्ली तो अपनी जगह है ही मध्य प्रदेश में प्रदूषण निवारण के क्षेत्र में जीवन भर से काम कर रहे वैज्ञानिक डॉ. गुणवंत जोशी का कहना है कि सामान्यत: इंदौर और भोपाल शहरों के बीचों-बीच बने भवनों की छतों पर भी इससे उडऩे वाले कार्बन कण दिखाई देते हैं। उस दौरान इन कणों का, उड़कर दस से बारह किलोमीटर जाना सामान्य बात है। उसी दौरान सड़कों पर ज्यादा दूर का दिखना (विजिबिलिटी) कम हो जाता है, इसलिए वाहन दुर्घटनाएं भी बढ़ जाती हैं।
'पराली' या 'नरवाई' के कारण स्वास्थ्य का बड़ा नुकसान तो होता ही है, कई बार अपने ही पड़ौसी किसान की बिना कटे, खड़ी फसल जल जाती है। गलती से बंधे रह गए पशु जल मरते हैं, चिंगारियां उड़कर गाँव के झोपड़े और घर भी जला देती हैं।

कम समय, कम खर्च में खेत साफ

सीहोर जिले के किसान श्री गणेश चौहान कहते हैं कि हम सब इन नुकसानों के बारे में बहुत अच्छे से जानते हैं.हम यह भी जानते हैं कि इस आग का बुरा प्रभाव हमारी अपनी जमीन पर पड़ता है। आग से कड़क हुई जमीन में बीज की अंकुरण क्षमता भी कम हो जाती है और भूमि के मित्र जीव भी जलकर मर जाते हैं।

हमको यह भी पता है कि इसे रोकने के लिए जिले के कलेक्टर भारतीय दंड संहिता की धारा 144 लगाकर अर्थदंड भी देते हैं, पर हम भी करें तो क्या करें।

सारी जाब्ता-फौजदारी के बाद भी देश के अस्सी प्रतिशत से ज्यादा किसान 'नरवाई' जलाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है अगली फसल के लिए खेत की सफाई में लगने वाला खर्च और समय की कमी। ऐसा नहीं है कि इस सफाई के लिए यंत्र नहीं है। इसमें काम आने वाला 'रोटोवेटर' भी उतना ही महंगा पड़ता है। ऊपर से रोटोवेटर्स की संख्या भी कम है।

फाइलों के बीहड़ में गुम, सब्सिडी की मांग

पंजाब के किसानों ने इसके लिए सरकार से सब्सिडी मांगी थी, पर वह मांग बहुत सारे हो-हल्ले और फाइलों के जंगल में कहाँ खो गई, ईश्वर ही जानें। सरकार का जहां तक सवाल है केंद्र सरकार ने 'नेशनल पालिसी फॉर मैनेजमेंट ऑफ क्रॉप रेसिड्यू' बना दी है। लेकिन चूँकि कृषि 'राज्य' का विषय है इसलिए अभी तो प्रदेश सरकारें धारा 144 या हजार पांच सौ के अर्थ दंड से ही काम चला रही हैं।
राज्यों के प्रदूषण निवारण मंडलों या हरित न्यायालयों की अपनी सीमाएं हैं। वे सिर्फ मार्गदर्शन दे सकते हैं या स्थानीय सरकारों को डांट ही सकते हैं।

हाँ, 'पराली' या 'नरवाई' जलाने से हो रहे प्रदूषण से चिंतित वैज्ञानिकों ने जलाये जाने वाले कृषि अपशिष्ट के औद्योगिक उपयोग ढूँढ लिए हैं। आईआईटी दिल्ली में खूब काम हो रहा है। भारतीय रेल भी कुछ सार्थक काम कर रहा है। गांवों में पदस्थ सरकारी कृषि विस्तार टीम भी किसानों को समझा रही है। लेकिन यहाँ मासूम सा एक ही सवाल है कि उस अपशिष्ट को खेत से निकालने की जो लागत आती है क्या वह फसल के मूल्य में मिल जायेगी? या ऋणमुक्ति और सब्सिडी की किसी भी नीति से इसे जोड़ा गया है? शायद नहीं,क्योंकि इसके लिए समुचित 'नीयत' नहीं है।

 

  • कमलेश पारे 
  • मो. : 9425609231
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