म.प्र. में ढोर चराने का - पंचायती रोजगार

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म.प्र.-में-ढोर-चराने-का---पंचायती-रोजगार

श्रीकान्त काबरा, मो. : 9406523699

कांग्रेस पार्टी के वचन को पूरा करने में मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ पंचायतों से एक हजार गौशालायें निर्मित करने के लिए प्रयासरत हैं। मूल प्रश्न यह है कि गौशाला संचालन क्या सहज कार्य है? वर्तमान में प्रदेश में लगभग 650 गौशालायें कार्यरत हैं जो सामाजिक सहयोग से येन-केन प्रकारेण संचालित हो रही हैं। इन गौशालाओं के संचालन में पूर्ववर्ती शासन लगभग 2 से 3 रु. प्रति पशु प्रतिदिन के मान से उनकी खुराक के रूप में आर्थिक सहायता देता था। वर्तमान शासन ने लगभग 5 रु. प्रति पशु प्रतिदिन के मान से पशुचारे के लिए आर्थिक सहायता दी है। क्या मात्र पांच रु. एक गाय के भोजन के लिए पर्याप्त है? एक पशु साधारणत: पांच किलो चारा/ भूसा भी प्रतिदिन अपना पेट भरने के लिए खाये तो उसे भूसे का औसत मूल्य 20 से 25 रु. होता है, ऐसे में प्रति पशु प्रतिदिन मात्र 5 रु. देना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है ?

 

  • गौचरों की जमीन पर अतिक्रमण  
  • गौशालाओं में कुप्रबंधन
  •  केवल सरकारी अनुदान के लिए खुली गौशालाएं

और यह राशि भी सरकारी लाल फीताशाही के चलते मार्च तक मिल पाती है। वर्तमान शासन ने भी पिछले वित्तीय वर्ष की पशुचारे की आधी राशि गौशालाओं को हाल ही में मार्च के महीने में दी है व शेष राशि की प्रतिपूर्ति भविष्य में करने का मौखिक आश्वासन दिया है। वर्तमान व्यवस्था में सामाजिक सहयोग से संचालित गौशालाओं में गौशाला प्रबंधन धनराशि की व्यवस्था अग्रिम रूप से कर पशु चारा जुटाता है परन्तु खाली खजाने वाली सरकारी रीति-नीति से पंचायत द्वारा संचालित गौशालाओं में तो गौ पशु भूख से तड़प-तड़प कर ही दम तोड़ देंगे। 

प्रदेश में चारे की उपलब्धता घटी

गौचर पर अतिक्रमण

प्रदेश में गौचर की अधिकांश भूमि अतिक्रमणकारियों के कब्जे में है जिस पर खेती हो रही है, उनके अतिक्रमण हटा पाना सत्ताधारण के लिए वोट प्रबंधन की राजनीति के चलते किसी भी राजनीतिज्ञ के बूते की बात नहीं है। प्रदेश में गौवंश के लिए उन्नत किस्म के घास चारे उगाने, चारागाह प्रबंधन, चारागाह विकास, चारा संरक्षण के प्रयास शून्य है। प्रदेश में कृषि प्रणाली में भी आमूलचूल परिवर्तन के कारण पशु चारे की उपलब्धता घट गई है। ज्वार जैसी परंपरागत फसलों का क्षेत्र घटने से पशुचारे की कमी हुई है और फसलों की यंत्रीकृत कटाई के कारण भी भूसे की उपलब्धता में भारी कमी आई है। इन सब मिले-जुले कारणों की वजह से आम ग्रामीण कम उत्पादक पशुओं को पालने से बेहतर उन्हें घर निकाला दे रहा है। चरोखरों को अतिक्रमण से मुक्त कराना व चारागाह विकास से पशु चारे की उपलब्धता बढ़ाकर ही गौवंश का पालन/ संरक्षण संभव है।

करोड़ों की राशि खर्च पर गायें भूख से मर रही हैं

शासन का पशुपालन विभाग गायों के लिए सुसनेर में एक बड़ी गौशाला, गौ अभ्यारण्य के रूप में संचालित कर रहा है। करोड़ों रुपये की राशि खर्च करने के बावजूद गायें भूख से मर रही हैं, पूरा अभ्यारण्य कुप्रबंधन का शिकार है। श्री दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल में प्रदेश में संचालित 9 गौ पशु अभ्यारण्य कुप्रबंध के कारण बंद कर दिये गये थे, तत्समय देलावाड़ी अभ्यारण्य में मृत गौ पशु के मांस से मुर्गीदाना बनाने का संयंत्र भी शासकीय संरक्षण में कार्यरत था, ऐसी सरकारी व्यवस्था थी।

गौशाला के क्षेत्र में अपने लम्बे अनुभव के आधार पर मुझे यह कहने में रंच मात्र भी झिझक नहीं है कि प्रदेश में वर्तमान में कार्यरत आधी से अधिक गौशालायें केवल शासकीय अनुदान के निहित उद्देश्य से संचालित है। गौ संवर्धन/ संरक्षण के लिए इन गौशाला प्रबंधकों में कोई ललक ही नहीं है। कुप्रबंधन और अवैज्ञानिक संचालन के कारण इनमें रह रहे पशुधन रुखा-सूखा खाकर धीरे-धीरे मरने के लिए विवश हैं।

 

पंचायत स्तर पर गौशालायें बनाने पर कुप्रबंधन, पेयजल की गहराती समस्या तथा पशुचारे के अभाव में गौवंश भूखों मरने के लिए विवश होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वरोजगार के लिए पकौड़े बेचने का उपाय बताया शायद उसी नक्शे कदम पर चल कर कमलनाथ बेरोजगार युवाओं को गौशाला के माध्यम से गोबर उठाने, ढोर चराने का रोजगार देने के लिए प्रयत्नशील हैं।

कुछ बड़ी गौशालायें जो ठीक-ठाक चल रही हैं वे भी शासकीय सहायता लेने के कारण शासकीय अधिकारियों की मनमानी सहने-सुनने को विवश है। हाल ही में राजधानी भोपाल की सड़कों पर आवारा घूमते पशुओं को राजधानी के ग्रामीण अंचलों में संचालित गौशालाओं में जबरन भेज दिया गया। उन गौशालाओं को 20 रु. प्रति दिन प्रति पशु के मान से आर्थिक सहायता देने का आश्वासन भी दिया लेकिन एक गौशाला को 300 गौ पशु सौंपने के पश्चात मात्र 18-20 क्विंटल सूखा-चारा उनकी उदरपूर्ति के लिए दिया गया वह भी खाने योग्य नहीं था जिसकी जांच चल रही है।

आदर्श गौशाला कैसी हो ?

आदर्श गौशाला स्थापना के लिए गोचर भूमि, पानी की व्यवस्था, भूसे चारे के पर्याप्त संग्रहण की व्यवस्था, गौ पशु बांधने के लिए वैज्ञानिक रूप से निर्मित आवास तथा आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था के साथ कुशल प्रबंधक तथा सेवाभावी कर्मचारियों का होना नितांत आवश्यक है। इस कसौटी पर अधिकांश गौशालायें खरी नहीं उतरती हैं। पंचायती राज में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाये गरीबों को भ्रष्टाचार के चलते अन्याय भुगतना पड़ता है ऐसे में वेजुबान गौमाता को कौन बचायेगा, यही यक्ष प्रश्न है। सच तो यह है कि पशु नस्ल के उन्नयन के नाम पर शासकीय रूप से जारी विदेशी नस्लों से गर्भाधान की संकरीकरण की रीति-नीति भी अंतत: अनुत्पादक पशुओं की संख्या बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है।

संक्षेप में पंचायत स्तर पर गौशालाओं का शासकीय पहल पर निर्माण गायों का संरक्षण तो निश्चय ही नहीं कर पायेगा, हां, इसकी आड़ में तथाकथित गौसेवकों को अपनी जेबें भरने की व्यवस्था अवश्य हो जायेंगी। यह शाश्वत सत्य है कि सामाजिक सहयोग से सफलतापूर्वक संचालित की जा रही लगभग 650 गौशालाओं में 5 प्रतिशत गौशालायें भी आदर्श गौशाला की श्रेणी में नहीं आती। वस्तुत: इनमें से अधिकांश गौशालायें पांजरापोल की श्रेणी में वर्गीकृत की जा सकती है जहां बेसहारा अपंग वृद्ध, अनुत्पादक गौ पशु अपनी प्राकृतिक मौत आने का इंतजार करते हैं, इनकी तुलना वृद्धाश्रम से की जा     सकती है।
       

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