ठोस सुधारों से बदलेगी खेती की तस्वीर

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ठोस सुधारों से बदलेगी खेती की तस्वीर 

मध्य प्रदेश में इन दिनों किसानों के दो लाख तक के ऋण माफ करने का मुद्दा छाया हुआ है। कांग्रेस के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण से यह फैसला सही हो सकता है, लेकिन वस्तुत: यह किसानों के लिए घाटे का सौदा है, क्योंकि बाद में किसान अगले कर्ज को चुकाने की स्थिति में नहीं रहता और कर्ज का यह सिलसिला निरंतर जारी रहता है। यही हाल न्यूनतम समर्थन मूल्य वृद्धि का भी है, जो किसानों के लिए कारगर साबित नहीं हुआ है। इसलिए किसानों के हित में कोई ठोस सुधार करने होंगे, तभी खेती की वर्तमान तस्वीर बदलेगी।
यदि कर्जमाफी की योजना से ही किसानों की समस्या का समाधान होता तो पिछले एक दशक पहले कांग्रेस द्वारा शुरू की गई ऋण माफी के बाद तो अब तक किसानों की समस्याओं का अंत हो जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि यह योजना मूल कारण का समाधान नहीं करती, क्योंकि कृषि में लाभकारिता का अभाव है। जिसके कारण किसान तात्कालिक कर्ज से तो मुक्त हो जाता है, लेकिन अगले कर्ज को चुकाने के लिए सक्षम नहीं रह पाता। खेती का घाटे का सौदा बनने के पीछे सरकारी खराब नीतियां भी जिम्मेदार हैं। तत्कालीन नीति नियंताओं ने समय के अनुसार  न तो कृषि के आधुनिकीकरण के प्रयास किए और न ही जरूरत से ज्यादा बढ़ती आबादी की कृषि पर निर्भरता कम हुई। सोचने वाली बात यह है कि जब देश की अधिक आबादी कम उत्पादकता वाली कृषि पर निर्भर रहेगी तो किसान कैसे खुशहाल रहेंगे। हालांकि केंद्र की मोदी सरकार ने खेती और किसानों की दशा सुधारने की कोशिश जरूर की और 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने का संकल्प लिया है।
इसी तरह किसानों की उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि करना भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। अधिकांश किसान तो सरकारी खरीद केंद्र एजेंसी से भी अनजान हैं। कुछ राज्यों में ही सरकारी खरीदी हो रही है। जब तक सरकारी खरीद तंत्र को पुख्ता नहीं बनाया जाएगा तब तक एमएसपी में वृद्धि से भी कुछ नहीं होगा। इसके अलावा अधिकांश किसानों को अपनी उपज का लाभ नहीं मिलने के पीछे आढ़तियों या बिचौलियों को उपज बेचना भी है। यह उपज अनेक हाथों से गुजरते हुए महंगी होती जाती है। लेकिन किसान को कोई लाभ नहीं होता। इसलिए कृषि उपज की खरीदी -बिक्री और वितरण के लिए जीएसटी की तर्ज पर तकनीक आधारित कोई तंत्र विकसित करना होगा। इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण की श्रृंखला बनाने की भी जरूरत है, ताकि खाद्यान्न के अलावा फल और सब्जियों के नुकसान को नियंत्रित किया जा सके। इन हालातों में यही कहा जा सकता है कि कर्ज माफी और न्यूनतम समर्थन में वृद्धि से आगे बढ़ते हुए कुछ ठोस सुधार करना होंगे, तभी कृषि की वर्तमान तस्वीर बदलेगी।  

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