किसान को बनाया कठपुतली

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ऐसे किसानों के शेष ऋण का वर्तमान ऋण माफी सूची में कोई जिक्र ही नहीं है। ऐसे किसानों का कर्ज अभी पूर्ववत ही बना हुआ है।  इस ऋण माफी प्रमाण पत्र वितरण में सरकार का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि शेष राशि जिसका कर्जा अभी किसान के सर खड़ा है, कैसे एवं कब माफ किया जायेगा?

विगत दो माह से राज्य का किसान बड़ी बेसब्री से राज्य सरकार के उस वचन के पूरा होने का इंतजार कर रहा है, जिसके द्वारा उसके 2 लाख तक के कृषि ऋण को प्रदेश सरकार के वायदे के मुताबिक माफ किया जाना है। राज्य सरकार ने भी 22 फरवरी से निरन्तर आयोजित कार्यक्रमों के जरिये लाभान्वित होने वाले किसानों को ऋण माफी के प्रमाण पत्रों का वितरण कर दिया है। लेकिन वितरित किये गये प्रमाण पत्रों में 2 लाख के बजाय अधिकतम रुपये 49,999/- तक ही राशि समाहित है। 
राज्य सरकार ने सम्पूर्ण प्रदेश की 383 तहसीलों में बड़े आयोजन के जरिये इन ऋण मुक्ति प्रमाण पत्रों का वितरण किया है। प्रत्येक आयोजन के लिए राज्य सरकार ने प्रत्येक तहसील के लिए 10 लाख रुपये के खर्च की स्वीकृति दी थी। लेकिन आश्चर्य, इतने तामझाम भरे आयोजन के बाद किसानों के हाथों में लाखों के बजाय मात्र हजारों रुपए ऋण माफी के प्रमाण पत्र हैं। अभी तक वितरित प्रमाण पत्र में मात्र कालातीत किसान जो वर्षों से अपना ऋण अदा नहीं कर रहे हैं, इस श्रेणी के किसानों के 2 लाख तक कर्ज माफ किये गये हैं। नियमित ऋणी किसान जो प्रत्येक वर्ष समय सीमा में ऋण अदा करता आ रहा है उसको सिर्फ अधिकतम रुपये 49999/- की राशि की राहत दी गई है। गत वर्ष$ सूखा घोषित वह तहसीलें जिन्हें तत्कालीन राज्य सरकार ने राहत देते हुए पीडि़त किसानों के नियमित अल्प समयावधि के कर्ज को मध्यकालीन कर्ज में तब्दील किया था। ऐसे किसानों के शेष ऋण का वर्तमान ऋण माफी सूची में कोई जिक्र ही नहीं है। 
ऐसे किसानों का कर्ज अभी पूर्ववत ही बना हुआ है। इस ऋण माफी प्रमाण पत्र वितरण में सरकार का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि शेष राशि जिसका कर्जा अभी किसान के सर खड़ा है, कैसे एवं कब माफ किया जायेगा? यदि राज्य सरकार इसे चरणबद्ध रूप में लागू करना चाहती है तो इसका जिक्र वितरित प्रमाण पत्रों में किया जाना था। या बार-बार राज्य सरकार इस तरह के महंगे आयोजनों के माध्यम से प्रमाण पत्रों का वितरण करती रहेगी? यह बड़ा सवाल राज्य के किसानों के जेहन में उभरता है।
बैंकों की नगद कृषि ऋण नीति अनुसार नियमित ऋणी किसानों को अपना ऋण अप्रैल माह की अंतिम तिथि तक अदा करना आवश्यक है। असफल रहने पर किसानों के ब्याज के साथ दंड राशि का भी प्रावधान है। लेकिन राज्य सरकार की इस अस्पष्टता से किसानों के सामने संशय की स्थिति बरकरार है। जबकि आगामी समय में लोकसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होते ही आचार संहिता में राज्य के किसानों के पास एक ऐसी असमंजस की स्थिति होगी कि वह बैंकों का कर्ज अदा करे या न अदा करे। बैंकों के लिए भी ऐसे हालात किसानों को नया नगद ऋण जारी करने से रोकेंगे। निश्चित यह स्थितियां किसानों को परेशानी एवं अवसाद में धकेलने वाली होगी।
राज्य में किसानों के सामने अभी दूसरा बड़ा संशय पिछली सरकार का वह आदेश है जिसमें खरीफ फसल सोयाबीन एवं मक्का के 20 अक्टूबर 2018 से 19 जनवरी 2019 की अवधि में विक्रय करने पर राज्य के किसानों को प्रति क्विंटल रुपए 500 तक फ्लैट भावांतर देने का प्रावधान किया गया था। लेकिन विक्रय के चार माह बाद भी किसानों को यह राशि प्राप्त नहीं हो सकी है। राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसे शिवराज काल की घोषणा बताकर कहा है कि केन्द्र सरकार इसकी स्वीकृति नहीं दे रही है। राज्य के मुख्यमंत्री ने किसानों को आश्वासन अवश्य दिया है कि वह राज्य के संसाधनों के माध्यम से किसानों को पैसा देगी। लेकिन यह कब देगी? यह स्पष्ट नहीं है। कुल मिलाकर राज्य का किसान दो सरकारों के बीच कठपुतली बनकर रह गया है। 
जबकि फ्लैट भाव पर बोनस राशि देखकर ही राज्य के किसानों ने नियत योजना अवधि में अपनी फसलों का विक्रय किया था। उक्त योजना अवधि के उपरांत मंडी भावों में जर्बदस्त उछाल से किसानों ने अपने को ठगा महसूस किया है। लेकिन अब राज्य सरकार को चाहिए कि शीघ्र वह किसानों के इन अनसुलझे मुद्दों पर अपनी नीति का से खुलासा करे।

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