कब रुकेगी किसानों से यह खुली लूट

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(कमलेश पारे)

यह बात एक हफ्ते से कम पुरानी है। सर्वाधिक धान की आवक के इन दिनों में राजधानी भोपाल की करोंद मंडी के बाहर धान से लदी सैकड़ों ट्रॉलियां खड़ी थीं, किसान कड़कड़ाती ठण्ड में अपनी धान की रखवाली कर रहे थे,और मंडी के गेट पर अध्यक्ष और सचिव के दस्तखत वाला एक बैनर लगा रहा कि 'धान की खरीदी बंद है'। इस सूचना के बाद भी किसान मंडी के बाहर इस उम्मीद में खड़े थे कि शायद जल्दी खरीदी शुरू हो। इनके अलावा अच्छे दामों की उम्मीद में विदिशा, सीहोर और रायसेन के किसान, जिन्हें खरीदी बंद की सूचना नहीं मिली थी, का आना निरंतर जारी रहा था।

इसी दौरान पड़ोसी जिले रायसेन की बड़ी मंडी मंडीदीप में भी किसानों ने एक दिन राष्ट्रीय राजमार्ग पर दस किलोमीटर का जाम लगा दिया, क्योंकि वहां व्यापारी सब्जी-भाजी की तरह बासमती का दाम लगा रहे थे। उस दिन उनका धान 1600 रुपये क्विंटल बिका, जबकि बासमती का कम से कम दाम दो हजार से बत्तीस सौ रुपये मिलने की उन्हें उम्मीद थी। राजधानी के आसपास हरेक मंडी में यही आलम है। भाव न मिलने से कहीं चक्का जाम, कहीं आगजनी तो कहीं मारपीट तक हो रही है।

चुनी हुई नई सरकार आने के बाद भी स्थितियां सुधर जाएंगी, इसकी उम्मीद थोड़ी कम ही है। हालांकि,चुनाव की घोषणा और परिणाम के बीच लगी आचार संहिता के कारण, निर्वाचित सरकार तो काम नहीं करती, पर कोई भी एक  'सरकार' तो रहती ही है न? बीच के ये सारे दिन, तो किसानों के लिए नरक बन गए थे।

नई सरकार आ गई है। इसके आते-आते मध्यप्रदेश की मंडियों में जो कुछ हुआ,वह वाक़ई परेशान करने वाला दृश्य था। कृषि उपज मंडियों की कल्पना या स्थापना का उद्देश्य यही तो रहा होगा, कि किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम मिले। सभ्य समाज ने भी इसे नियमों, कानूनों और विधि-विधान के दायरे में लाकर, सोचे गए उस उद्देश्य के प्रति निश्चिंतता महसूस कर ली होगी। किन्तु,बरसों-बरस से 'कृषि-कर्मण पुरस्कार' पा रहे मध्य प्रदेश में, यदि कहीं किसानों की खुली लूट की छूट है, तो वे हैं कृषि उपज मंडियां।

बीते महीने सवा-महीने के इस हल्ले में, जो भी हुआ हो, इसे देखकर,अपने ग्राम-समाज की एक कहावत याद आ गई। इस कहावत का भावार्थ यह है कि किसी की मृत्यु उपरान्त विधवाओं का प्रलाप अपनी जगह जारी रहता है, परन्तु मृत्युभोज के 'पावणे' (मेहमान) नि:संकोच जीमते रहते हैं।

आप ही बताएं, चुनावी भाषणों, घोषणाओं और घोषणापत्रों में किसानों को लेकर कितनी बातें हुई थीं। लगा था कि किसानों के लिए एक नया स्वर्ग ही रच दिया जाएगा। लेकिन हालात तो उलटे हैं।

इसी महीने में बड़वानी जिले के केला उत्पादक किसानों ने अपना केला,बजाय बाज़ार में बेचने के, घर के पशुओं को ही खिला दिया। क्योंकि, व्यापारियों ने केले का भाव 500 रुपये प्रति ट्राली (एक ट्राली में दस क्विंटल केला आता है) लगाया था।

पूरे समय यह जरूर याद रखें,कि सरकार किसी भी कृषि उपज का, कोई भी दाम तय कर दे, जिस भाव में व्यापारी खरीदेंगे। वही किसान को मिलेगा। इसके बीच में कोई कुछ नहीं कर सकता।

एक केला उत्पादक किसान ने बताया कि दस क्विंटल केले की उत्पादन लागत ही 8000 रुपये से ज्यादा आती है। इस माल को ट्राली पर चढ़ाने उतारने की मज़दूरी ही 500 रुपये लगती है। यदि किसान किसी से भाड़े पर ही ट्रैक्टर ले, तो उसका भाड़ा भी 500 रुपये ही लगता है। ऐसी हालत में किसान क्या करे ?

कालूखेड़ा (रतलाम) गाँव के इन्दरमल 15 क्विंटल प्याज लेकर मंडी आये थे। उसका भाव व्यापारियों ने पचास पैसे प्रति किलो लगाया। उन्होंने भी अपना प्याज बजाय व्यापारियों को बेचने के, जानवरों को खिलाकर पुण्य अर्जित करना ज्यादा उचित समझा। भाव नहीं मिलने से मंदसौर नीमच के और भी कई किसान अपना उत्पादन सड़कों पर ही छोड़ गए। क्योंकि वापस घर ले जाने का भाड़ा ही बच जाए तो गनीमत है।

हालांकि नीमच मंडी के अफसर कहते हैं कि सिर्फ खराब माल ही कम दामों पर बिका है, लेकिन सड़कों पर पड़े प्याज को देखकर लगता तो नहीं है कि वह खराब था।

धान, केले और प्याज के अलावा लहसुन उत्पादक किसानों की हालत भी 'नर्क' हुई पड़ी है। अच्छे, भरे-पूरे लहसुन का दाम भी जब 2 रुपये लगा तो गुस्से और निराशा में किसान ने उसे नाली में बहा दिया। हर घटना-दुर्घटना के बाद जांच की बात कर चुप बैठ जाने वाले अफसर जान लें कि नीमच जिले के नयागांव से आये घनश्याम पुरोहित और सुरेश धनगर अपनी लहसुन से भरी ट्राली सड़क पर उलटी कर घर चले गए थे।

सब्जी उत्पादक किसानों का रोना अपनी जगह है ही। सीहोर जिले के शाहगंज और डोबी (संयोग से ये दोनों बुदनी विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र में ही आते हैं) में किसानों को अपना टमाटर 2 रुपये किलो के भाव से बेचना पड़ा। इनकी उत्पादन लागत ही इससे दस गुना से भी ज्यादा आती है।

टमाटर की इस बात पर मंडी के अफसर कहते हैं कि एक साथ,एक ही दिन में ज्यादा माल आ जाने से ऐसा हुआ होगा। हाँ, उस दिन बीस हज़ार क्रेट टमाटर आया था,और बीस किलो के क्रेट का दाम औसतन 30 से 50 रुपये लगा था।

सरकारें इतनी आसानी से और इतनी मासूमियत से आवक और दामों के बारे में अपना पक्ष रख देती हैं,कि लगता ही नहीं कि ये किसी की आजीविका पर बात कर रहे हैं या इन घटनाओं से कुछ जिंदगियां भी जुड़ी हैं। टमाटर बेचने आये उन किसानों ने बताया कि उस दिन मात्र 15 व्यापारी खरीदी के लिए खड़े थे, और उन्होंने दस हज़ार क्रेट ही खरीदे।

महाराष्ट्र से लगे मध्यप्रदेश के उस बैंगन उत्पादक किसान की हालत समझिये, जिसने पांच एकड़ में बैंगन की खेती की और उसे बीस पैसे किलो का भाव मिला या मुलताई के उन किसानों, जो देश की श्रेष्ठ पत्ता गोभी पैदा करते हैं, ने भाव न मिलने के कारण चारे और पानी के लिए राजस्थान से अपने यहाँ चरने आई गाडर (भेड़) अपने गोभी लगे खेतों में छुड़वा दीं।

ऐसे में कोई भी कैसे और क्यों खेती करे? और करे भी,तो खुद कैसे जिन्दा रहे, या बाल बच्चों को कैसे पाले ?

यहाँ सवाल यह भी उठता है कि यह सब, सरकारी अफसरों की जानकारी में या आंखों के सामने कैसे होता है? वे कहते हैं कि माल की क्वालिटी खराब थी। लेकिन वहां से आये फोटो में यह खराबी अपने को क्यों नहीं दिखती ?

व्यापार और व्यापारी के साथ सरकारों की किसानों के प्रति इतनी भी निर्दयता अच्छी बात नहीं है।

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