किसानों के लिए कितना कल्याणकारी होगा नया साल ? 

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इंदौर। अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक साल 2018 अंतिम सांसे ले रहा है.31 दिसंबर सोमवार को वर्ष का अंतिम दिन है। मंगलवार का सूर्योदय 2019 का पहला दिन होगा जो लोगों के लिए नई उम्मीदें लेकर आएगा। जहाँ तक किसानों का सवाल है तो वे हर साल की तरह इस साल भी कुदरत के क़हर से बचने और कजऱ् से मुक्ति के साथ उपज की अच्छी कीमत मिलने की कामना करेंगे। देखना यह होगा कि किसानों के लिए यह नया साल कितना कल्याणकारी साबित होगा।

यदि अतीत पर नजर डालें तो देखेंगे कि देश का किसान कभी सुकून में नहीं रहा। प्राकृतिक आपदाओं को सहने के साथ ही खेती की बढ़ती लागत और घटती कीमतों के बीच कर्ज के बोझ तले दबे होने के बावजूद देशवासियों की उदरपूर्ति के लिए वह न केवल हिम्मत से डटा रहा, बल्कि अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को भी निभाता रहा। लेकिन उसके हालातों में कोई तब्दीली नहीं आई। इसके गुणदोष पर विचार न करते हुए इस बात पर चिंतन करना जरुरी है, कि किसानों के हित में केंद्र और राज्य सरकारें ऐसे कौन से कदम उठाएं जिससे इनका कल्याण हो सके और कजऱ् के भय से ख़ुदकुशी करने वाले किसानों का यह अप्रिय सिलसिला थम सके।

सच तो यह है कि किसान जोखिमों के साये में खेती करता है. पहले बुवाई का जोखिम, फिर समय पर उर्वरक और अन्य सही कीटनाशक मिलने की जोखिम। फसल ठीक हो तो प्राकृतिक आपदा की जोखिम। यदि फसल को नुकसान हो जाए तो बीमा मुआवजा मिलने की जोखिम। यदि उत्पादन अच्छा हो तो बाजार में कीमत अच्छी मिलने की जोखिम। यदि किसानों को इन सारी जोखिमों से बचाना है तो सरकार को किसान को बाजार उपलब्ध कराने के साथ ही उसे अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार देना होगा। उद्यानिकी फसलों का किसान को वाजिब दाम नहीं मिलता। सब्जी और फल -फूल जैसी फसलों की आयु कम ही होती है, इसलिए कम कीमत पर जल्द बेचनी पड़ती है। इन्हें सुरक्षित रखने और  इनके निर्यात का तंत्र विकसित करना होगा। भरपूर उत्पादन के कारण आवक बढऩे से फसल के दाम बहुत गिर जाते हैं। इन हालातों से निपटने के लिए सरकार को नए विकल्प तलाशने होंगे। किसानों को हर उस साधन और सुविधा से संपन्न बनाना होगा, जो उसकी हर जोखिम को कम करे, उसकी लागत को कम करे, तभी किसान की सरकार पर निर्भरता कम होगी और वह स्वावलम्बी हो सकेगा, क्योंकि कज़ऱ् माफ़ी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

अप्रैल - मई 2019 में लोक सभा के चुनाव होने हैं। उत्तर भारत के प्रमुख तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की पराजय से चिंतित केंद्र की मोदी सरकार क्या किसानों को संतुष्ट करने के लिए कोई नया प्रयोग करेगी अथवा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें पूर्णत: लागू करने का साहस दिखाएगी, जिसका किसान विगत 12  वर्षों से इन्तजार कर रहे हैं। इसे लागू करने के लिए किसानों ने कई आंदोलन भी किए हैं। केंद्र सरकार ने कुछ अनुशंसाओं पर निर्णय लेते हुए रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की दरों में पिछले की तुलना में वृद्धि जरूर की लेकिन 50 प्रतिशत के आंकड़े को नहीं छू पाई। किसानों की रबी की उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं बिक पाई। इसे सरकार की असफलता माना जा सकता है.चुनावी वर्ष में सत्ता विपक्ष दोनों दल किसानों को खुश करने के लिए अनेक लोक लुभावन घोषणाएं कर सकते हैं। ऐसे में किसानों को उम्मीद है कि उनके हित में जरूर कोई कदम उठाया जाएगा। यह सम्भव होगा कि नहीं यह सब भविष्य के गर्भ में है। इसलिए नया साल कितना कल्याणकारी साबित होगा इस पर सबकी नजऱ बनी हुई है।

यदि उत्पादन अच्छा हो तो बाजार में कीमत अच्छी मिलने की जोखिम। यदि किसानों को इन सारी जोखिमों से बचाना है तो सरकार को किसान को बाजार उपलब्ध कराने के साथ ही उसे अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार देना होगा। उद्यानिकी फसलों का किसान को वाजिब दाम नहीं मिलता। सब्जी और फल -फूल जैसी फसलों की आयु कम ही होती है, इसलिए कम कीमत पर जल्द बेचनी पड़ती है। इन्हें सुरक्षित रखने और  इनके निर्यात का तंत्र विकसित करना होगा। भरपूर उत्पादन के कारण आवक बढऩे से फसल के दाम बहुत गिर जाते हैं। इन हालातों से निपटने के लिए सरकार को नए विकल्प तलाशने होंगे। किसानों को हर उस साधन और सुविधा से संपन्न बनाना होगा, जो उसकी हर जोखिम को कम करे, उसकी लागत को कम करे, तभी किसान की सरकार पर निर्भरता कम होगी और वह स्वावलम्बी हो सकेगा, क्योंकि कज़ऱ् माफ़ी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

अप्रैल - मई 2019 में लोक सभा के चुनाव होने हैं। उत्तर भारत के प्रमुख तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की पराजय से चिंतित केंद्र की मोदी सरकार क्या किसानों को संतुष्ट करने के लिए कोई नया प्रयोग करेगी अथवा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें पूर्णत: लागू करने का साहस दिखाएगी, जिसका किसान विगत 12  वर्षों से इन्तजार कर रहे हैं। इसे लागू करने के लिए किसानों ने कई आंदोलन भी किए हैं। केंद्र सरकार ने कुछ अनुशंसाओं पर निर्णय लेते हुए रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की दरों में पिछले की तुलना में वृद्धि जरूर की लेकिन 50 प्रतिशत के आंकड़े को नहीं छू पाई। 

किसानों की रबी की उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं बिक पाई। इसे सरकार की असफलता माना जा सकता है। चुनावी वर्ष में सत्ता विपक्ष दोनों दल किसानों को खुश करने के लिए अनेक लोक लुभावन घोषणाएं कर सकते हैं। ऐसे में किसानों को उम्मीद है कि उनके हित में जरूर कोई कदम उठाया जाएगा। यह सम्भव होगा कि नहीं यह सब भविष्य के गर्भ में है। इसलिए नया साल कितना कल्याणकारी साबित होगा इस पर सबकी नजऱ बनी हुई है।

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