किसानों के बड़े शत्रु खरपतवार

खरपतवारों की श्रेणी में कौन सा पौधा आता है निर्धारित करना सरल कार्य नहीं है, क्योंकि यह भूमि के उपयोग से संबंधित है। एक ही पौधा एक क्षेत्र या स्थान पर फसल हो सकता है और दूसरी परिस्थितियों में खरपतवार बन सकता है। खरपतवार की सरल परिभाषा है वे सभी पौधे जिनकी भूमि का उपयोग करने वाले को आवश्यकता नही है।

खरपतवारों को पानी की कम आवश्यकता होती है, जिससे ये सूखा इत्यादि को सहन करके आसानी से जमते और बढ़ते हैं। इनकी जड़ें अधिक विकसित होती हैं और अधिक गहराई तक जाती हैं, जिससे ये भूमि की निचली सतह से भोजन और पानी ले लेती हंै। जहां से फसल ग्रहण करने में असमर्थ हैं। खरपतवार की पत्तियों पर पर्णरन्ध्र (स्टोमेटा) अधिक पाये जाते हैं और वे अधिकतर अधिक क्रियाशील होते हैं, जिससे पत्तियां अधिक कार्य कर पाती हैं। कुछ खरपतवार फसलों के साथ पकते हैं, जिससे उनके बीज वहीं भूमि में गिर जाते है या फसल के साथ काट लिए जाते हैं। खरपतवार बीजों के अलावा अपने वानस्पतिक भागों से भी सुगमता पूर्वक स्वयं ही पैदा हो जाते हैं जैसे हिरनखुरी और मोथा।

खरपतवारों से फसलों और भूमि पर हानिकारक प्रभाव- खरपतवार फसल के लिए उपलब्ध पोषक तत्व , जल, सूर्य का प्रकाश एवं वायु का प्रयोग करते हैं, जिससे खरपतवार व फसल के बीच प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो जाती है। क्योंकि इन चीजों को फसल के पौधे एक मुख्य अनुपात में होने पर ही लेते हैं और जब उनमें से किसी एक की मात्रा सीमित हो जाती है तो वे दूसरे का प्रयोग सफलतापूर्वक नहीं कर पाते हैं, चाहे दूसरा पर्याप्त मात्रा में ही क्यों न हो। इन सब चीजों को प्राप्त करने के लिए फसल एवं खरपतवारों के बीच संघर्ष होता है। कभी-कभी इस संघर्ष में फसलों को काफी हानि होती है।

खेत का बहुत सा क्षेत्र जिसमें फसल उगाई जा सकती है, उनमें खरपतवार उग आते हैं और इस तरह से फसलों के जमने और बढऩे के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता है, जिसके फलस्वरूप फसल की उपज कम हो जाती है। इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि खरपतवारों की जड़ों क ा विकास अधिक होता है और उनकी जड़े भूमि में अधिक गहराई तक जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि खरपतवारों के पौधे भूमि से अधिक मात्रा में भोजन ले लेते हैं। इससे भी फसलों द्वारा भूमि से भोजन लेने में रूकावट होती है, जिसके परिणाम स्वरूप उपज में काफी कमी हो जाती है। यह बात किसान भाईयों को समझना चाहिये कि पौधों को अपना भोजन भूमि से तभी मिल सकता है जबकि भूमि में पर्याप्त मात्रा में पानी हो, क्योंकि पौधे अपना भोजन घोल के रूप में लेते है। इस पानी में से काफी मात्रा खरपतवार अपने प्रयोग में ले लेते हैं तथा विशेष क्रिया द्वारा उसे हवा में उड़ा देते हैं,इस प्रकार भूमि में विद्यमान नमी की कमी हो जाती है अर्थात् जो पानी फसलों को मिलना चाहिए था उसे खरपतवार प्राप्त कर लेते हैं। इससे फसल की बढ़वार कम हो जाती है व फसल छोटी रह जाती है और उपज कम हो जाती है और उपज कम हो जाती है। कभी-कभी फसल के उत्पादन में खरपतवार के कारण 50 प्रतिशत की कमी हो जाती है। अनेक खरपतवारों की किस्मों की जल ग्रहण एवं उपयोग की क्षमता कुछ फसलों से अधिक है। शोध परिणामों से यह भी स्पष्ट हो गया है कि भूमि में जल को संचित रखने और उसे फसल के लिए उपलब्ध कराने हेतु खरपतवारों को पनपने से रोकना जरूरी है। यह कार्य शुष्क एवं अर्ध-शुष्क प्रदेशों में अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि उन क्षेत्रों में जल की कमी पहले से होती है। किसी भी क्षेत्र में खरपतवारों की संख्या फसलों से जल के लिए स्पर्धा करती है और उसी अनुपात में फसल उत्पादन घट जाता है।पोषक तत्वों के लिए खरपतवार काफी जद्दो जहद करते हैं। कृषि भूमि एवं चरागाहों में फसलों एवं चारों के निकट वृद्धि करने वाले खरपतवारों का यदि नियंत्रण न किया जाये तो उस क्षेत्र में तैयार शुष्क पदार्थ के 30 से 40 प्रतिशत भाग या इससे भी अधिक के लिए हकदार बन जाते हैं। यह इस बात का घोतक है कि फसलों एवं खरपतवारों के मध्य जल एवं पोषक पदार्थो के लिए कितनी अधिक स्पर्धा हो सकती है। शायद ही ऐसा कोई खेत हो जो पूर्णत: खरपतवार विहीन हो।

खरपतवारों की अनेक किस्में फसलों से अधिक मात्रा में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है। खेतों में नाइट्रोजन एवं पोटेशियम के लिए सबसे अधिक स्पर्धा होती है। उदाहरण के तौर पर यदि पोषक तत्वों के लिए फसल व खरपतवार के बीच प्रतिस्पर्धा को देखा जाये तो पता चलता है कि संकर मक्का में खरपतवारों ने 30 दिनों के अन्दर 59, 10, तथा 59 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर क्रमश: नाईट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटेशियम को हड़प लिया। अलसी के खेतों में चौड़ी पत्तियों वाले खरपतवार उपलब्ध पोषक तत्वों को फसल से दो से तीन गुना अधिक मात्रा ग्रहण करते हैं।

खरपतवार स्थान के लिए स्पर्धा अधिक करते हैं। स्पर्धा की यह शक्ति परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। पौधे जितने निकट होंगे उनमें उतनी ही अधिक स्पर्धा होगी। स्पर्धा का संकटपूर्ण काल बुआई के बाद 3 से 13 सप्ताह के मध्य तक रहता है। खरपतवारों की प्रति इकाई क्षेत्रफल में संख्या के अलावा, वे किस अवस्था में अथवा कितने समय तक खेत में रहे , यह भी फसलों को होने वाली क्षति को निर्धारित करता है। खरपतवारों से गहन क्षति फसलों में प्रारंभिक अवस्था में होती है, क्योंकि प्रारंभिक अवस्था में हुई क्षति की भरपाई बाद में नहीं हो सकती। यदि धान की दौजियों के अंकुरण के पूर्व खेत को खरपतवार रहित रखा जाये तो सबसे अधिक लाभ होता है। मूंगफली की प्रस्फुटन के चार सप्ताह पश्चात् तक खरपतवारों से रहित रखा जाये तो फसल को कोई क्षति नहीं होगी। सोयाबीन खरीफ मौसम की फसल होने से इसमें खरपतवार की मुख्य रूप से एक गंभीर समस्या बनी रहती है। इस प्रमुख तिलहनी फसल में खरपतवार प्रबंधन के अभाव में 35 से 70 प्रतिशत तक उपज में कमी आती है। सोयाबीन में बुआई के बाद प्रारंभिक 45 दिनों तक खरपतवारों द्वारा अधिक नुकसान होता है। खरीफ फसलों में पानी मुख्य रूप से मानसून की वर्षा से ही मिल पाता है तथा लगातार वर्षा से खरपतवारों के बीज बराबर निकल आते हैं जिससे खरीफ की फसलों में रबी फसलों की अपेक्षा खरपतवारों से अधिक नुकसान होता है। खरीफ में उगायी जाने वाली फसलों में अधिकतर क्षेत्र असिंचित है, जिसकी वजह से स्थिति और गंभीर हो जाती है। औसत रूप से खरपतवार 30-40 किलोग्राम नाइट्र्रोजन 10-15 किलोग्राम फास्फोरस व 25 से 35 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर अवशोषित कर लेते हैं।

खरपतवारनाशी दवाओं से खरपतवार नियंत्रण – आज की आधुनिक कृषि में खरपतवार नियंत्रण मुख्य रूप से खरपतवार नाशक दवाओं के प्रयोग किया जाता है। खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी दवाओं के प्रयोग में कम समय लगता है और उनका प्रयोग भी आसान है। विभिन्न प्रकार के शाकनाशी पदार्थो की खरपतवारों को विनिष्ट करने की अलग-अलग प्रक्रिया होती है।
जब खरपतवार-नाशक रसायनों से उपचार फसल और खरपतवारों को मिली- जुली आबादी में भूमि की सतह से ऊपर के अंगों पर सीधे किया जाता है तो उपचारित पौधे की पत्तियों और तने शाकनाशी का धारण और अवशोषण करने वाले मुख्य अवयव होते हैं। इसके विपरीत जब शाकनाशी को मिट्टी भूमि पर डाला जाता है तो उसका अवशोषण करने वाले अवयव जडें और अंकुरित तने होते हैं। जलीय खरपतवारों में शाकनाशियों का अवशोषण पत्तों एवं अन्य भागों/ अंगों तथा जड़ों से होता है। इस प्रकार प्रयोग किये जाने के पश्चात् शाकनाशी पदार्थ के प्रभाव से पौधों में अनेक प्रकार के जीव रसायनिक (बायोकेमिकल) और जीव क्रियात्मक (फिजियोलाजिकल) परिवर्तन होने लगते हैं। इन्हीं परिवर्तनों के कारण पौधों में कार्बोंहाईड्रेट की संचित मात्रा कम हो जाती है और अंत में कोशिकाओं की मृत्यु हो जाती है। कभी-कभी खरपतवार नियंत्रण हेतु प्रयुक्त शाकनाशी का विशाक्त प्रभाव भूमि में बना रहता है, जो बाद में उगायी गई फसलों की वृद्धि प्रभावित करता है। यद्यपि इस प्रकार का प्रभाव बहुत कम होता है, परन्तु कुछ संवेदनशील फसलों पर इसका प्रभाव देखने को मिलता है। शाकनाशी या नींदानाशक रसायन के प्रभाव की सीमा और अवधि, भूमि की किस्म, वातावरण की अवस्था भूमि में सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता, भूमि में जीवांश पदार्थ की मात्रा प्रयोग की गई शाकनाशी की किस्म एवं मात्रा के ऊपर निर्भर करती है। शाकनाशी के इस कुप्रभाव को निम्र प्रकार से कम कि या जा सकता है:-

1. भूमि में लगातार सिंचाई करने से शाकनाशी पदार्थ का अवशेष निच्छालन की क्रिया से घुलकर नीचे चला जाता है, जिससे फसलों पर विषाक्तता का प्रभाव नहीं पड़ता है।

2. खेतों में क्रियाशील भूमि सुधारक पदार्थ के प्रयोग से अवशेष कम हो जाता है। इस क्रिया में भूमि सुधारक पदार्थ शाकनाशी के अवशेष को कम कर देता है और भूमि सुधारक पदार्थ शाकनाशी के अवशेष को शोषित कर लेता है।

3. ऐसे फसल चक्र जिनमें शाकनाशी के प्रति सहिष्णु फसलें ली गई हैं। अपनाकर इस प्रकार के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है।

4. फॉस्फोरस प्रदान करने वाले उर्वरकों के संतुलित मात्रा में प्रयोग से भी शाकनाशी के अवशेष प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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