सब्जियों की नर्सरी

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खरीफ या वर्षाकालीन मौसम में सब्जियों की फसलें लेने हेतु सब्जियों की नर्सरी में ऊपर उथली क्यारियां बनाते हैं। सब्जी के पौधे योग्य आकार के ट्रे (2 मी.&1 मी.) या विभिन्न प्रकार के उथले गमलों में भी उगाये जा सकते हैं। जहां तक हो सके नर्सरी या पौध शाला पानी के स्त्रोत के पास हो। उस जगह से पानी के निकास हेतु उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। नर्सरी की मिट्टी ऐसी होनी चाहिए, जो भुरभुरी हो, जिसमें पोषक तत्व पर्याप्त हो, पानी अच्छी तरह सोख सके एवं ऊपरी सतह सूख सके।

नर्सरी में क्यारियां बनाते समय ध्यान रखें कि क्यारियों की चौड़ाई एक मीटर हो, कदापि एक मीटर से ज्यादा न हो ताकि नर्सरी में निंदाई-गुड़ाई पौधों को बिना नुकसान पहुंचाए की जा सके। क्यारी की लम्बाई खेत की समतलता के आधार पर सुविधानुसार रखी जा सकती है।

क्यारी बनाते समय मिट्टी अच्छी भुरभुरी कर दें। उथली क्यारी (रेज्ड बेड) बनाने के लिये भी सर्वप्रथम रेखांकन (ले आउट) इस तरह से कर दें, कि सिंचाई की मुख्य नाली के लम्बवत एक मीटर चौड़ी क्यारियां बने एवं दो क्यारियों के बीच 40 सेमी की उपनाली रहे। लेकिन क्यारी बनाते समय दो क्यारियों के बीच की एवं हर क्यारी के चारों तरफ की क्यारी के ऊपर इस तरह से डाल दें कि हर क्यारी की ऊंचाई 15 सेमी रहे एवं दो क्यारियों के बीच नाली रहे जिसका उपयोग मुख्यत: पानी के निकास हेतु किया जा सके। आवश्यकता पडऩे पर उन्हीं नालियों का उपयोग पानी देने के लिए भी करना चाहिए। क्यारी के चारों किनारे एवं कोने को फावड़े के उल्टी तरफ से अच्छी तरह से ठोंक दे ताकि वे मजबूत हो जाएं एवं वर्षा अथवा सिंचाई से क्यारी की मिट्टी बह न जाएं।

इस तरह से मौसमानुसार उथली क्यारियां बनाने के बाद उन पर अच्छी पकी हुई गोबर खाद पर्याप्त होती है। मिट्टी अगर कन्हार या डोरसा हो तो गोबर की खाद की मात्रा के बराबर रेज डालना आवश्यक होता है ताकि बोते समय बीज पर्याप्त दूरी पर बोया जा सके। सब्जियों में कुछ बीमारियां ऐसी है जिनका निदान करना अत्यंत कठिन है, जैसे- बैंगन का बैक्टेरियल विल्ट (मुरझान), जिस क्षेत्र में ऐसी बीमारियों का प्रकोप देखा गया है, उन्हें सलाह दी जाती है इस बीमारी के फैलाव को रोकने हेतु पौधाशाला की क्यारियों का निर्जमीकरण (स्टरलाईजेशन) निम्रलिखित तरीके से करें।


नर्सरी निर्जमीकरण (स्टरलाईजेशन) :

सर्वप्रथम उपरोक्तानुसार क्यारियां तैयार करने के बाद 10 मिली फार्मलीन एक लीटर पानी में मिलाकर घोल बना लें। इस घोल को नर्सरी की क्यारियों पर लगातार छिड़कते रहें, ताकि क्यारियों की ऊपरी 15 सेमी तह की मिट्टी दवा के घोल के संतृप्त हो जाए। छिड़काव के तुरंत बाद क्यारियों को पॉलीथिन शीट या अनुपयोगी बोरों से ढ़क दें ताकि फार्मलीन (फ्यूम) व्यर्थ न जाकर मृदा में समा जाए। छिड़काव के सात दिन बाद ढ़के हुए बोरोंं या पालीथिन शीट हटा लें। क्यारियों को फावड़े से एक बार फिर गुड़ाई कर सातों दिनों तक खुला छोड़ दें। तदुपरांत क्यारियों को समतल करने के बाद ही बीजों की बुआई करें।

नर्सरी में बीज बोने से पहले बीज का उपचार थायरम नामक फफंूदनाशक दवा से करें। बीजोपचार के लिए 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से करना अतिआवश्यक है।

सामान्यत: किसान भाई बीज छिड़का पद्धति से बोते हैं। परंतु पौधशाला में बीज को हमेशा कतार में ही बोना चाहिए। क्यारी के चौड़ाई की तरफ से नोकदार छोटी लकड़ी की सहायता से कतारें इस तरह बनाये कि दो कतारों के बीच करीब 3-4 सेंमी अंतर रहे, ताकि पौधों को सूर्य प्रकाश पर्याप्त मिल सके एवं हवा का आवागमन अच्छी तरह से हो सके। कतार की गहराई बीज के आकार पर आधारित होना चाहिए। यह ध्यान रखें कि बीज इतनी गहराई पर पड़े ताकि उनके आकार से चार गुना मिट्टी ढकते समय रहे। अगर बीज छोटा है तो बीज में पर्याप्त मात्रा में रेत मिला दें, ताकि बीज घना न हो जाये। बोआई के बाद हाथ से या लकड़ी की छोटी पटिया से क्यारी को समतल करें ताकि बोया हुआ बीज अच्छी तरह से ढ़क जाये। इसके पश्चात क्यारी पर सूखी घास फैला दें ताकि क्यारी को सींचते समय बीज और मिट्टी बह न जाय। बोने के तुरंत बाद हजारे से फब्बारे के रुप में सींच दें। सींचते समय फब्बारे से पहले क्यारी के बाहर ही पानी गिरा दें और फब्बारा शुरू होते ही धीरे से क्यारी पर बढ़े और अच्छी तरह सींच दें। वर्षा ऋतु में अक्सर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी दो वर्षा से पौधों को बचाने हेतु क्यारी पर छोटा सा मचान बनाये तथा मचान बनाने पर सिंचाई पर खास ध्यान दें। पौधों के जमाव होने पर हर हफ्ते 2.5 ग्राम डायथेन एम-45 प्रति लीटर पानी अथवा एक ग्राम बाविस्टीन प्रति लीटर पानी में मिलाकर फवारणी या ड्रेचिंग करें ताकि पौधों को आद्र्र गलन (डेम्पिंग ऑफ) नामक फफूंद से बचाया जा सके। 10 दिन के अंतर से एक मिली मेलाथियान प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें ताकि पौधों का कीट के प्रकोप से बचाव किया जा सके। अगर कुछ पौधे नीचे गिरते दिखाई दें या जमीन के सतह पर लगा पौधे का भाग सड़ा हुआ पाये, तो यह जान लें कि आर्द्रगलन (डेम्पिंग ऑफ) बीमारी का प्रकोप शुरू हुआ है। तुरंत ऐसे पौधों केा निकाल दें, पानी देना कम करें एवं ऐसी व्यवस्था करें कि पौधों को पर्याप्त सूर्य का प्रकाश एवं हवा मिले।

ज्यादातर सब्जियों के पौधे बोआई के 25-30 दिन बाद लगाने लायक हो जाते हैं। सिर्फ प्याज के पौधे लगाने के लिए तैयार होने मेें 45 से 50 दिन का समय लगता है।

सब्जियों में कुछ फसलें ऐसी है, जिनके बीज को सीधे खेतों में बोया जाता है, क्योंकि इन फसलों को रोपा तैयार करके रोपाई के समय जो आघात लगता है, उसको सहने की क्षमता नहीं होती, जैसे- भिण्डी, बरबटी, सेम आदि, दूसरी तरफ कुछ फसलें ऐसी हैं, जिनके पौधे तैयार कर खेत में रोपाई की जा सकती है, जैसे- टमाटर, बैंगन, मिर्च, प्याज, फूलगोभी आदि। इन सब्जियों के पौधा (रोपा) में रोपाई के समय लगने वाले आघात को सहने की क्षमता पायी गई है। अत: इन पौधों के बीजों को शुरू में पौधशाला (नर्सरी) में बोया जाता है लेकिन नर्सरी में पौधों को तैयार करना एक कला है, इस कला को अवगत करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर जानकारी नीचे दी गई है।

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