अदरक की खेती

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अदरक-की-खेती

अदरक की खेती मसाला एवं औषधीय फसल के रूप में की जा रही है। अदरक की उत्पत्ति दक्षिण पूर्वीय एशिया में भारत या चीन में हुई माना जाता है। ताजा अदरक व्यंजनों को खुशबूदार तथा चिरपरा बनाने एवं मुरब्बा बनाने में उपयोग किया जाता है। छीले हुये अदरक को चूने के पानी में 6 घंटे तक डुबाकर फिर सुखाकर सौंठ बनाई जाती है जिसका उपयोग कई दवाओं में किया जाता है। भारतवर्ष में अदरक के प्रमुख उत्पादक प्रान्त केरल, मेघालय, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश एवं बंगाल है। इससे काफी विदेशी मुद्रा अर्जन होती है। म.प्र. एवं छत्तीसगढ़ में भी अदरक की कास्त की जा रही है जो गृह बाजार में उपयोग हो रही है।

प्रजातियां :

अदरक की प्रमुख जातियों को उनकी उत्पादकता एवं विद्यमान तत्वों के आधार पर निम्नानुसार वर्गीकृत किया गया है।

अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियां –मारन, काराक्कल रायोडिजनरो, सुप्रभा, सुरूचि एवं सुरभि प्रजातियों को मध्य प्रदेश में लगाने की अनुशंसा की गई है यह उड़ीसा के हाई अल्टीच्यूट, कोरापुर स्टेशन से विकसित की गई है। सुप्रभा पहाड़ी क्षेत्रों के लिये बहुत ही उपयुक्त है। मध्य प्रदेश में सुरूचि एवं सुरभि का परीक्षण ईंटखेड़ी पर कई वर्ष किया गया जो बहुत ही उत्साहवर्धक रहा है। यह प्रजातियां रेशेदार हैं।

कम रेशे वाली प्रजातियां – जमैका, बैंकाक, चाइना (इक्जोटि· टाइप, वेजीटेबिल जिंजर)

ओजियो रेजिन की अधिक प्रतिशत वाली प्रजतियां : टूर्नाड चर्नाड, चायना, कुरुप्पम काढ़ी, रायोडिजनरो।

अधिक शुष्क अदरक तत्व वाली प्रजातियां – करक्कल, नादिया, मारन

बोबनी का उचित समय :

सिंचित क्षेत्रों में अदरक की बोआई का उपयुक्त समय 15 अप्रैल से 15 जून तक है। यदि खेत खाली हो तो मार्च से भी बोनी की जा सकती है।

खेत की तैयारी :

मैदानी क्षेत्रों में (सूत्रकृमि) नेमैटोड की समस्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है फलस्वरूप इसका प्रकोप अदरक प्रकन्दों पर देखा गया है। 5-6 जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा कर लिया जाय तथा पाटा आदि चलाकर खेत को समतल कर लिया जाये। जिस खेत में अदरक लगाना है वहां पर सिंचाई कर अप्रैल माह में सफेद प्लास्टिक से खेत को भली भांति ढक दिया जाये। 15-20 दिन पश्चात प्लास्टिक को हटाकर खेत में गोबर खाद कम्पोस्ट 25-30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दिया जाय। साथ ही 2 टन नीम की खली को महीन कर मिट्टी में बोनी के समय खेत में डाल दें।

बीज की मात्रा एवं बोने की विधि :

प्रकन्द को 2.5 से 5 सेन्टीमीटर के टुकड़े काटें जिसमें एक या दो कलियां हो। टुकड़े का वजन 20 ग्राम हो। सामान्यत: 8 से 12 क्विंटल प्रकन्द की जरूरत प्रति हेक्टर पड़ती है। रोपने के पूर्व प्रकन्द के बीज टुकड़ों को 0.3 प्रतिशत डाइथेन एम.4.5.(3 ग्राम दवा एक लीटर पानी) 30 मिनट तक उपचारित करें। खेत में 22 सेंटीमीटर की दूरी पर कतार से कतार की नालियां बनाये जिसमें उचित गहराई पर 15 से 20 सेंटीमीर की दूरी पर उपचारित प्रकन्द के टुकड़ों की बोआई करें। उसे अच्छी सड़ी हुई गोबर की पतली उथली तह से ढ़क दें साथ ही खाद में भुरभुरी मिट्टी भी मिला लें।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा :

अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिये 20-25 टन गोबर खाद/कम्पोस्ट प्रति हेक्टर आवश्यक है। इसके अतिरिक्त रोपण के पूर्ण 2 टन नीम की खली प्रति हेक्टर की दर से मिट्टी में मिला दिया जाये।

सिंचाई :

मौसम व आवश्यकतानुसार समय-समय पर सिंचाई करना पड़ता है।

निंदाई-गुड़ाई :

पंजवार के कारण खरपतवार कम आते हैं। यदि खरपतवार हो तो उन्हें अलग कर मिट्टी चढ़ा दें।

अन्य सुरक्षा :

यदि खेत में काफी पानी एकत्र हो गया तो उसे खेत से निकाल दिया जाये।

फसल की खुदाई एवं क्योरिंग :

जब पत्तियां पीली पड़ जायें और मुरझाकर गिरने लगे तब फसल परिपक्व हो जाती है। खुदाई के लिये यह उचित समय है। खुदाई के समय उचित नमी न हो तो हल्की सिंचाई कर खुरपी या कुदाली से खुदाई की जाये। प्रकन्द को पौधे से पृथक करें उसमें लगी सूखी पत्ती, जड़ एवं चिपकी मिट्टी पृथक कर लें।

उपज :

जाति के आधार पर उत्पादन 275 से 400 टन के मध्य रहता है।

बी.एन.सिंह, खण्डवा
मो: 8818914989

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