मिर्च की खेती में लागत कम आय ज्यादा

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जलवायु
मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भांति उगती है। लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है। बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डिग्री सेंटीग्रेड तापामन पर होता है। यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियां, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं। मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डिग्री सेंटीग्रेड है। तेज मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है। फूलते समय ओस गिरना या तेज वर्षा होना फसल के लिए नुकसानदाई होता है, क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं।
भूमि एवं खेती की तैयारी
मिर्च की खेती प्राय: सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है, अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी, जिसमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक हो अच्छी मानी जाती है, किन्तु अम्लीय भूमि के लिए कतई उपयुक्त नहीं होती। वहीं बलुई दोमट मृदा मे भी अधिक खाद डालकर एवं सही समय व उचित सिंचाई प्रबंधन द्वारा खेती किया जा सकता है। गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए। खेत में पौध लगाने से पहले खेत की एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2 से 3 बार कल्टीवेटर से जुताई करके मिट्टी भुर-भुरी कर बंडफार्मर की सहायता से मेढ़ या उचित आकार की क्यारियां बना लेना चाहिए।

भारत में फसलों में मिर्च की खेती का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है, इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है। मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं, एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है। भारत वर्ष में इसकी खेती प्राय: सभी प्रांतों में थोड़ी या बहुत मात्रा में इसकी व्यावासयिक रूप से खेती की जाती है, यदि किसान इसकी खेती उन्नत व वैज्ञानिक तरीके से करें तो कम लागत पर अधिक उत्पादन एवं आय प्राप्त कर सकते है।
पौध की क्यारी तैयार करना
क्यारी बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि सूर्य का प्रकाश पूरे दिन उपलब्ध हो तथा वहां की मिट्टी रेतीली हो। पौधशाला में बीज डालने से पहले 1 मीटर चौड़ी और 3 मीटर लम्बी 20 से 25 से-मी- उठी क्यारी बना लेनी चाहिए। अप्रैल-मई के महीने में इस क्यारी की हल्की सिंचाई करके सफेद 200 गेज की पॉलीथिन से ढक देना चाहिए, इससे मिट्टी के अंदर के सभी जीवाणु नष्ट हो जाएं। 5 से 6 स ताह बाद पॉलीथिन को हटा दें और क्यारी को अच्छी तरह से गुड़ाई मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। जब माटी अच्छी भुरभुरी हो जाए तब उस क्यारी में कार्बोफ्यूरॉन 3 ग्राम नामक दवा एवं 2 ग्राम कैप्टन दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर क्यारियों को अच्छी तरह से तर कर लेना चाहिए।

बीज दर
एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए संकर बीज देशी किस्मों की अपेक्षा बीज की मात्रा भी कम लगती है, करीब 150 से 200 ग्राम बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त होता है। देशी किस्मों की मिर्ची के 300 से 400 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। यदि आपको अच्छी पैदावार लेना हो तो संकर जाति के बीज की बुवाई करें।
बीज की बुवाई
कैप्टॉन से उपचारित क्यारी को अगले दिन फावड़े से खोदकर मिट्टी को भुरभुरी एवं समतल बना लेना चाहिए, बीज उपचार करने के लिए इमीडाक्लोप्रिड (गाउचो) और स्ट्रोप्टोसाइक्लिन नामक दवा 2 प्रति कि.ग्रा. बीज दर से बीज में अच्छी तरह से मिला लें। अब समतल क्यारी के समानान्तर 4 से 6 से.मी. की दूरी पर 0.5 से 1.0 से.मी. गहरी लाइन बना लेनी चाहिए और इन्हीं लाइनों में 1 से.मी. की दूरी पर एक-एक बीज बोते हैं। बीज बोने के बाद सड़ी गोबर की खाद मिट्टी, रेत और लकड़ी का बुरादा आदि का मिश्रण ढकने के बाद पुआल या लंबे घास-फूस की पतली तह बना देते हैं और ऊपर से हजारे की सहायता से हल्की सिंचाई कर देते हंै।
पौध रोपण कार्य
पौध जब 25 से 28 दिन तक की हो जाये तो उसे समय पौधशाला से उखाड़ कर मुख्य खेत में लगाना चाहिए। पौध लगाने से पहले 2 प्रतिशत कार्बेण्डाजिम 50 ई.सी. के घोल 1प्रतिशत क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. को मिला कर अच्छी तरह से घोल बनाकर पौध की जड़ों को 10 मिनट तक डुबोकर पौध लगाते हैं।
खाद उर्वरक
मिर्च का अधिक उत्पादन लेने के लिए 25 से 30 टन अच्छे पकी हुई गोबर खाद तथा रसायनिक तत्व के रूप में 100 से 120 किलो नत्रजन, 40 से 60 किलो फॉस्फोरस 40 से 50 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा व फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पहले अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। शेष आधी नत्रजन की मात्रा देना चाहिए। शेष आधी नत्रजन की मात्रा को 2 भागों में बांटकर 25 से 30 दिन बाद और 45 से 50 दिन बाद खड़ी फसल में डालना चाहिए।
सिंचाई
पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरंत बाद हल्की सी सिंचाई करनी चाहिए, गर्मी के दिनों में 5 से 7 दिनों के अंतर से तथा सर्दी में में 10 से 15 दिन के अंतर से सिंचाई करें।
निराई-गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण
रोपण के बाद शुरू के 30-45 दिन तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना अच्छे फसल उत्पादन की दृष्टि से आवश्यक है। कम से कम दो निराई-गुड़ाई लाभप्रद रहती है। पहली निराई-गुड़ाई रोपण के 25 एवं दूसरी 45 दिन के बाद करना चाहिये। पौध रोपण के 30 दिन बाद पौधों में मिट्टी चढ़ाना चाहिये ताकि पौधे मजबूत हो जाये एवं गिरे नहीं।

बीज एवं पौधरोपण का समय
बीज बोने का समय बीज की बुवाई
जून-जुलाई जुलाई-अगस्त
अगस्त-सितंबर सितंबर-अक्टूबर
नवंबर-दिसंबर दिसंबर-जनवरी
  • बालकृष्ण पाटीदार
  • धर्मेन्द्र पाटीदार
    मो. : 9424888039
    email: balkrishnapatidar264@gmail.com
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