कुशल प्रबंधन से मन माफिक उत्पादन

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अच्छी उपज के लिये सिंचाई का बड़ा महत्व है गेहूं की फसल को 4-6 सिंचाई आवश्यक होती है जैसे किरीट जड़ अवस्था। बुआई के 21वें दिन की सिंचाई पर उत्पादन का भविष्य लटका रहता है  क्योंकि इस समय जड़ों से कंसे फूटने का समय रहता है और यदि इस वक्त भूमि में नमी की कमी हुई तो कल्ले कम फूटेंगे और इसका परिणाम सीधा-सीधा औसत उत्पादन पर पड़ेगा इसके बाद गांठ, फूल एवं दूध अवस्था भी सिंचाई उत्पादन पर सकारात्मक असर करती है। सिंचाई का सर्वाधिक लाभ तब मिलेगा जब बुआई के समय सिफारिश के अनुरूप भरपूर उर्वरक दिया गया हो। गेहूं की बोनी विकसित किस्मों को भूख सामान्य जातियों से अधिक होती है इसलिए भरपूर उर्वरक गौण तत्व साथ में सूक्ष्म तत्वों जैसे जस्ता/गंधक के उपयोग की आवश्यकता वर्तमान में बढ़ गई है क्योंकि सतत दो-तीन फसल चक्रों के चलते भूमि से पोषक तत्वों का अवशोषण तो बराबर होता रहता है। गेहूं की फसल के लिये खरपतवार सबसे बड़ा दुश्मन होता है। बथुआ, कणकी, जंगली जई, पटरी-मटरी तथा हिरनखुरी जैसे सभी मिलकर पोषक तत्वों के बंटवारे में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराने में सफल हो जाते हैं प्रतिस्पर्र्धा इतनी तेज होती है कि बथुआ जैसा खरपतवार कई बार गेहूं की फसल को चुनौती देने में सक्षम हो जाता है उसकी प्रति इकाई संख्या कई जगह गेहूं से भी बढ़कर देखी जा सकती है। बथुआ की कमजोर अवस्था में बुआई के 30 दिनों के अंदर यदि एक छिड़काव खरपतवारनाशी का किया गया हो तो अच्छे परिणाम सामने आ जाते हंै बथुआ दब जाता है, मुरझा जाता है। इस बीच गेहूं की बढ़वार तेजी से हो जाती है। इसके साथ ही दूसरी सिंचाई के पहले हाथ से एक निंदाई विशेषकर दो पौधों के बीच में पनपते खरपतवार को यदि निकाल दिया जाए तो क्या बात है फसल देखने योग्य हो जायेगी। टाप ड्रेसिंग का समय निंदाई तथा सिंचाई के बाद बतर आने पर ही निश्चित किया जाये ताकि उर्वरक का पूरा-पूरा लाभ केवल फसल को मिले तथा बढ़वार हो सके। उर्वरक डालकर सिंचाई कदापि नहीं की जाये इससे 'लीचिंगÓ होकर उर्वरक बह जायेगा। गेहूं की बुआई के बाद तुरंत बंडफार्मर के द्वारा बाडर बनाई जाये ताकि सिंचाई में सुविधा हो सके साथ ही सिंचाई जल की बचत भी हो सके। चना, मटर, मसूर, अलसी, सरसों सभी फसलों की बुआई के पहले अच्छा खेत बने फिर सिफारिश के अनुरूप उर्वरक डाला जाये ध्यान रहे तिलहनी, दलहनी फसलों को स्फुर खाद की अधिक आवश्यकता पड़ती है दलहनों को नत्रजन कम परंतु तिलहनों में समुचित नत्रजन डालना जरूरी है। सरसों की फसल को माहो से बचाना जरूरी है तो चने में इल्ली के प्रकोप को रोकना जरूरी है। फसल उत्पादन के लिये दी गई तकनीकी का पालन कुशल प्रबंधन की प्राथमिकता है। कृषकों से उम्मीद है वे इसका अंगीकरण करके रबी का लक्षित उत्पादन प्राप्त करें।

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