मध्यप्रदेश में पपीता की खेती

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जलवायु और मृदा

पपीता एक उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाली फसल है जिसको मध्यम उपोष्ण जलवायु जहां तापमान 10-26 डिग्री सेल्सियस तक रहता है तथा पाले की संभावना न हो, इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। पपीता के बीजों के अंकुरण हेतु 35 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम होता है। ठंड में रात्रि का तापमान 12 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर पौधों की वृद्धि तथा फलोत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी. एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है

पपीता, विश्व के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया। बड़वानी में भी लगभग 958 हे. क्षेत्रफल में पपीते की व्यावसायिक खेती की जा रही है। बड़वानी जिले की लाल तथा पीली किस्में प्रसिद्ध हैं पपीते के फलों से पपेन तैयार किया जाता है। जिसका प्रसंस्कृत उत्पाद हेतु उपयोग किया जाता है। पपीता प्यूरी का भी बड़ा निर्यातक है।

पपीते की महत्वपूर्ण किस्में

पपीते की किस्मों का चुनाव खेती के उद्देश्य के अनुसार किया जाना चाहिए जैसे कि औद्योगिक रूप से महत्व की किस्में जिनके कच्चे फलों से पपेन निकाला जाता है, पपेन किस्में कहलाती हैं इस वर्ग में महत्वपूर्ण किस्में सीओ- 2, सीओ-5 एवं सीओ-7 है। इसके साथ दूसरा महत्वपूर्ण वर्ग है टेबिल वैरायटी या जिनको पकी अवस्था में काटकर खाया जाता है। इस वर्ग को पुन: दो भागों में बांटा गया है । 

पारंपरिक पपीते की किस्में:- पारंपरिक पपीते की किस्मों के अंतर्गत बड़वानी लाल, पीला, वाशिंगटन, मधुबिन्दु, हनीड्यू, कुर्ग हनीड्यू , को 1 एवं 3 किस्में आती हैं। नई संकर किस्में उन्नत गाइनोडायोसियस/ उभयलिंगी किस्म इसके अंतर्गत निम्न महत्वपूर्ण किस्में आती है:- पूसा नन्हा, पूसा डेलिशियस, सीओ-7 पूसा मैजेस्टी, सूर्या।

पपीते में एकीकृत रोग प्रबंधन तकनीकी

तना गलन (तने तथा जड़ के गलने की बीमारी )

डम्पिंग ऑफ (आर्द्र गलन ) - 

प्रबंधन- रोग से बचने के लिए पपीते के बीजों का उपचार बुवाई पूर्व सेरेसान या एग्रोसान जीएन से उपचारित करें तथा नर्सरी को फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से ड्रेंचिंग करें या उपचारित करें।

रिंग स्पॉट वायरस - इस रोग का कारण विषाणु है जो कि माहू द्वारा फैलता है। इस रोग के गंभीर आक्रमण की स्थिति में 50-60 प्रतिशत तक हानि हो जाती है। जिस कारण पत्तियों पर क्लोरोसिस दिखाई देता है पत्तियां कटी - कटी दिखाई देती हंै तथा पौधे की वृद्धि रूक जाती है।

लीफकर्ल - यह भी विषाणु जनित रोग है जो कि सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है जिस कारण पत्तियां मुड़ जाती है इस रोग से 70-80 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण - स्वस्थ पौधों का रोपण करें। रोगी पौधों को उखाड़कर खेत से दूर गड्ढे में दबाकर नष्ट करें। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु अनुसंशित कीटनाशक का प्रयोग करें।

पपीते की पौध तैयार करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा    

पपीते के 1 हेक्टेयर के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 500 ग्राम बीज एवं उन्नत किस्मों का 300 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है। पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथिन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चैड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें। प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गेज मोटी 20 गुना 15 सेमी आकर की थैलियां (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो ) में वर्मीकंपोस्ट, रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 या 2 बीज बोएं। 

खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक 

पौध रोपण पूर्व खेत की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर 2-3 बार कल्टीवेटर या हैरो से जुताई करें तथा समतल कर लें। पूर्ण रूप से तैयार खेत में 45345345 सेमी आकार के गड्ढे 232 मीटर (पंक्ति - पंक्ति एवं पौध से पौध ) की दूरी पर तैयार करें।

पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक 

200 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा प्रतिवर्ष 3-4 बराबर भागों में बांटकर दें।

सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक

पपीता के पौधों की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिट्टी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्यत: शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीकी अपनाएं।

अंतरवर्तीय फसलें 

पपीते बाग में अंतरवर्तीय फसलों के रूप में दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि ली जा सकती। मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिण्डी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंतरवर्तीय फसलों के रूप में न उगायें।

फलों की तुड़ाई तथा पैकिंग  

पपीत के पूर्ण रूप से परिपक्व फलों को जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डंठल सहित तुड़ाई करें। तुड़ाई के पश्चात् स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लें तथा सड़े-गले फलों को अलग हटा दें।

पपीते में पौध संरक्षण

एफिड - प्रबंधन तकनीक  - मिथाइल डेमेटान या डायमिथिएट की 2 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर पौध रोपण पश्चात् आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतर से पत्तियों पर छिड़काव करें।

लाल मकड़ी - प्रबंधन - पौधे पर आक्रमण दिखते ही प्रभावित पत्तियों को तोड़कर दूर गड्ढे में दबाएं। वेटेबल सल्फर 2.5 ग्राम/ ली. या डाइकोफॉल 18.5 ईसी की 2.5 मिली या ओमाइट 1.5 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

पपीते की उत्पादकता बढ़ाने के उपाय

1 पपीते की व्यावसायिक खेती में उभयलिंगी किस्मों जैसे सूर्या ( भारतीय बागवानी अनु. सं. बैंगलोर ) सनराइज सोलो, रेडी लेडी -786 के साथ किचिन गार्डन के लिए पूसा नन्हा, कुर्ग हनीड्यू, पूसा ड्वार्फ, पंत पपीता 1, 2 एवं 3 के चयन को प्राथमिकता दें।

  • रसचूसक कीटों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पपीते को अक्टूबर में रोपण करें तथा पौधों की नर्सरी कीट अवरोधी नेट हाउस के भीतर तैयार करें।
  • खाद व उर्वरक की संतुलित मात्रा 250 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम स्फुर तथा 250 -500 ग्राम पोटाश प्रति पौधा/वर्ष प्रयोग करें।
  • सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाएं।
  • फसल में रसचूसक कीटों के नियंत्रण हेतु फेरोमेन ट्रेप, प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें तथा नीम सत्व 4 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  • पपीते के पौधों को 30 सेमी उठी मेड़ पर 2 गुणा 2 मीटर की दूरी पर रोपाई करें। तथा अंतरवर्तीय फसल के रूप में मिर्च, टमाटर, बैंगन न लगाएं।

पपीते के फल एवं उपज

अच्छी तरह वैज्ञानिक प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 40-50 किलो उपज प्राप्त हो जाती है। पपीते की प्रति हेक्टेयर राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता 317 क्विं/हे. है।

पपीते के बगीचे में फर्टीगेशन 

पपीते के पौधों जिनको फरवरी में उठी हुई क्यारी पर लगाया गया हो ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का उपयोग करें तथा जल विलेय उर्वरकों जैसे 19:19:19 को सिंचाई जल के साथ ड्रिप में देने से उर्वरक की बचत के साथ-साथ उसकी उपयोग क्षमता में भी वृद्धि होती है तथा पौधों को आवश्यकतानुसार एवं शीघ्र पोषक तत्व उपलब्ध होने से उपज तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है।

पपीते की मार्केटिंग

पपीते के पूर्ण विकसित फलों को न्यूज़ पेपर के टुकड़ों में लपेटकर उचित तरीके से सामान आकार के फलों को कैरेट में पैक कर स्थानीय एवं सुदूर बाजार में भेजा जाता है।

पपीते के फलों से पपेन निकालने की विधि

सामान्यत: पपेन को पपीते के कच्चे फलों से निकला जाता है। पपेन के लिए 90-100 दिन विकसित कच्चे फलों का चुनाव करें। कच्चे चुने हुए फलों से सुबह 3 मि.मी. गहराई के 3-4 चीरे गोलाई आकार में लगाएं। इसके पूर्व पौधों पर फलों से निकलने वाले दूध को एकत्रित करने के लिए प्लास्टिक के बर्तन को तैयार रखें। फलों पर प्रथम बार के (चीरा लगाने के बाद) 3-4 दिनों पश्चात पुन: चीरा लगाकर पपेन एकत्रित करें। पपेन (दूध) प्राप्त होने के बाद उसमे 0.5 प्रतिशत पोटेशियम मेन्टाबाई सल्फेट परिरक्षक के रूप में मिलाये ताकि पपेन को 3-4 दिन तक सुरक्षित रखा जा सके। पपेन को अच्छी तरह सुखाकर पपेन को प्रसंस्करण केंद्र भेजें।

पपेन का उत्पादन

इस प्रकार पपीते की पपेन के लिए उपयुक्त किस्मों सी ओ - 2 एवं सी ओ - 5 के पौधों से 100 - 150 ग्राम पपेन प्रति पौधा प्रति वर्ष प्राप्त हो जाता है। कच्चे पपेन को अच्छी तरह सुखाकर प्राप्त पाएं को प्रसंस्करण के लिए सयंत्र महाराष्ट्र के जलगांव तथा येवला (नासिक ) में भेज दिया जाता है। कच्चे फलों से पपेन निकालने के बाद उनसे अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे टूटी फ्रूटी, मुरब्बा बनाया जा सकता है तथा चीरा लगे पके फलों का जैम जेली मुरब्बा रस या गूदा जिसे प्यूरी कहते हैं बनाकर डिब्बाबंद किया जाता है। 

 

  • विकास मंडलोई
  • देवेंद्र विश्वकर्मा 

vikasmandloi77@gmail.com

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