म.प्र. में खेती की वर्तमान स्थिति एवं नई दिशा

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वैसे कहावत है कि कृषक ऋण में पैदा होता है और ऋण में ही मरता है। अत: इस कहावत को हर हालत मेें बदलना होगा। तत्कालिक उपाय, ऋण माफी आवश्यक है, परन्तु इससे समस्या का हल नहीं हो सकता। कृषक को स्वावलम्बी एवं स्वाभीमानी बनना होगा। ऐसी नीति एवं योजनाओं की आवश्यकता है जो कृषकों के पास पहुॅचे, कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने में सहयोगी हो। योजना ऐसी हो जिसमें लागत कम, उत्पादन एवं मूल्य समुचित मिले तथा जो शासन पर भी निर्भर नहीं हो। इस सिद्धांत का मूल मंत्र 1998-2004 के बीच लेखक के द्वारा स्वावलम्बी गो आधारित प्राकृतिक जैविक पद्धति के रूप में दिया था। अत: इसे मूल रूप पुन: दिया जाना होगा। इस समय यह और आवश्यक हो गया है, क्योंकि रबी में कृषक की क्षमता आदान व्यवस्था करने लायक नहीं है।

योजना का प्रमुख अंग होगा 

बीज स्वावलम्बन:- आवश्यकता का बीज कृषक द्वारा ही उत्पादन करना। इसी के साथ रबी का बीज 90 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध करना होगा, जिससे नमी की उपलब्धता रहते कोई खेत खाली न रहे।

खाद स्वावलम्बन:- किसान द्वारा गो पालन अपनाकर खेत पर जैविक खाद एवं टॉनिक आदि उत्पादित करना, बाजार से खरीदने की आवश्यकता नहीं। इससे वर्तमान में उत्पन्न यूरिया की त्रासदी का सामना कृषक एवं शासन दोनों को ही नहीं करना पड़ेगा।

वर्तमान में कृषि, कृषक कल्याण एवं उद्यानिकी विभाग विषम परिस्थितियों से जूझ रहा है। दोनों ही विभाग तकनीकी प्रमुख की अनुपस्थिति में चल रहे हैं। तकनीकी विभागों में इस अवहेलना को कृषक एवं कृषि की दशा से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए।  प्रारंभ वर्षा की देरी, बाद में अति वर्षा के फलस्वरूप खरीफ की फसलों एवं सब्जियों को अत्यधिक नुकसान हो चुका है। अत: सरकार को रबी के लिए निर्णायक भूमिका के साथ दीर्घकालीन योजना बनाना आवश्यक है।

पौध संरक्षण में स्वावलम्बन:- परम्परागत तरीके गौमूत्र, वानस्पति एवं मित्रकीट अत्यंत प्रभावी हैं, इन्हें कृषक अपने खेत पर बिना लागत से तैयार कर सकते हैं।

कृषि उत्पाद का उचित मूल्य, बाजार की समस्या:- कृषक द्वारा विषम परिस्थितियों में कठिन  मेहनत कर उत्पादन  किया जाता है, परन्तु न तो उसे घोषित सभी फसलों को रूस्क्क ही मिल पाता है। उद्यानिकी  फसलों की तो यह व्यवस्था भी नहीं है। अत: आवश्यकता होगी कि सभी घोषित फसलों का मूल्य कृषकों को दिलाया जावेें। इसमें यदि आवश्यक हो तो मण्डी एक्ट में संशोधन कर व्यापारी के लिए अनिवार्य करना होगा कि स्न्रक्त का उत्पाद रूस्क्क से कम पर न खरीदें। उद्यानिकी फसलों से लिए विशेष योजनाएं तैयार करनी होगीं।

उत्पादक - उपभोक्ता के बीच सीधे सम्पर्क इसके लिए ''पारिवारिक डाक्टर-पारिवारिक किसान'' का सिद्धांत अपनाना होगा। शहरों में जगह-जगह विशेष रूप से जैविक उत्पादक का बाजार विकास जिसमें उत्पादक किसान बिना बिचौलियों के सीधे उत्पाद का विक्रय कर सकें।

उद्यानिकी फसलों की विशेष नीति बनाकर क्षेत्रवार स्वरूप का निर्धारण मूल्यों पर गाइड लाइन एवं भण्डारण विशेष रूप से कृषक के यहां एवं शासकीय, निजी क्षेत्रों में करना होगा। आलू, प्याज, लहसुन के विशेष भण्डार गृहों का निर्माण शासकीय/निजी क्षेत्र में बड़े स्तर पर करना हेागा।

ग्राम आधारित कृषि गृह उद्योगों विशेष रूप से प्रसंस्करण (Processing) की वृहद व्यवस्था ग्रामों में ही करना होगीं।

म.प्र.की विशेष फसलों एवं किस्मों का उत्पादन उदाहरण स्वरूप शरबती गेहूं डयूरम गेहूं, चिन्नोर, जीराशंकर, कालीमूछ चावल के साथ धनिया, जीरा एवं औषधि खेती की विशेशज्ञ योजनाएं जिनके लिए विक्रय की समस्या न हो।

कृषकों की आत्महत्याएं:- यह एक विषम परिस्थिति है। कोई जीव मरना नहीं चाहता परन्तु विशेष परिस्थितियों में ऐसी स्थिति निर्मित होती है। समस्या के निदान हेतु म.प्र. मानव अधिकार आयोग द्वारा विशेषज्ञों की कमेटी जिसमें डॉ. जी.एस.कौशल एवं डॉ. साधुराम शर्मा सदस्य थे एक गठन कर, अध्ययन वर्ष 2011-12 में कराया गया था। आयोग द्वारा 11 जनवरी 2012 को अपनी अनुशंसाए शासन को प्रेषित की थीं । इन पर परिपालन कर काफी हद तक निदान पाया जा सकता है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार में बायोगैस संयंत्र लगवाने के विशेष प्रयास इससे ईंधन, जैविक खाद, एवं ऊर्जा में कृषक स्वावलम्बी होगा योजना को स्वास्थ्य एवं स्वच्छता मिशन से भी संलग्न किया जाना उपयुक्त होगा।
  • गौशालाओं को सक्षम बनाना वर्ष 2002 में बड़े बायोगैस संयंत्र-90 प्रतिशत अनुदान पर 25 से 120 घनमीटर स्वीकृत कर लगाए गए थे। इनमें बिजली उत्पादन के लिए जनरेटर का भी प्रावधान था। ये काफी सफल रहे थे, अत: योजना को पुनर्जीवित समस्त गोशालाओं में लगाया जाना होगा। इससे ईधन, ऊर्जा, जैविक खाद का उत्पादन हो सकेगा तथा गौशालाएं सक्षम बनेंगी।
  • प्रदेश में प्रथम चरण के अंतर्गत विकासखण्ड पर एक-एक गौशाला को मॉडल के रूप में विकसित कर दूसरे चरण में ग्राम पंचायत स्तर पर स्थगित किया जाना सफल होगा।
  • कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन की योजनाओं का कृषकों को लाभ देने के साथ यह अनिवार्य किया जाना होगा कि वे एक या  क्षमता अनुसार देशी गायों को पालन करेंगे। 
  • निजी डेेयरी में भी बायोगैस संयंत्र  के साथ जैविक खाद बनाना अनिवार्य किए जाने से स्वच्छता बिजली एवं जैविक खाद की पूर्ति हो सकेगीं।
  • गौशालाओं में गोबर/गोमूत्र आधारित लघु उद्योग लगा कर भी इन्हें सक्षम बनाया जा सकता है।

कृषि मजदूरों की कमी:- मनरेगा को कृषि आधारित बनाने से खेतों में मजदूरों की कमी एवं ग्रामीण बेरोजगारी पर नियंत्रण किया जा सकता है। इस व्यवस्था में आधी मजदूरी मनरेगा से और आधी किसान द्वारा दी जाना होगी। इससे सक्षम व्यक्ति को वर्ष में 200 दिनों से ज्यादा का रोजगार मिल सकेगा।

सिंचाई उपलब्धता:- भूमि एवं जल संरक्षण विशेष रूप से खेत तालाब, राजीव गांधी जल ग्रहण क्षेत्र विकास योजनाओं को प्रभावी बनान होगा। लघु,मध्यम एवं वृहद सिंचाई परियोजनाओं का वास्तविक आकलन कर कृषकों को स्थिति स्पष्ट कर कार्ययोजना तैयार की जाना होगी।

कृषि उत्पादन की वास्तविकता:- प्रदेश को पिछलें 06 वर्षों से लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त हो रहे हैं। प्रत्येक वर्ष गत वर्ष की तुलना में 20-25 प्रतिशत वृद्धि दर्शाई जा रही है। ऐसा लगातार, हरित क्रांति के दशक में भारतवर्ष में नहीं हुआ, और ना ही ऐसे उदाहरण विश्व के किसी देश में मिलते हैं। ऐसी स्थिति  में उत्पादन का सही आकलन कृषकों के सम्मुख लाकर, उपयुक्त योजनाएं बनाना होगी। कृषि कल्याण तथा उद्यानिकी विभागों का तकनीकी एवं प्रशासनिक अमला पूर्णत: ध्वस्त है। अत: इसमें आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। तकनीकी अमले को प्राथमिकता देना होगी। वर्षों से अधिकतर स्तर के पद रिक्त है इन्हें भरकर, प्रशिक्षित करना होगा। प्रशिक्षण केन्द्रों को भी पूर्णत: सक्षम बनाना होगा।

 

  • डॉ. जी.एस. कौशल
  • पूर्व संचालक कृषि म.प्र.
  • मो. : 9826057424
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