मटर की बीमारियों के लक्षण व नियंत्रण

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दैनिक आहार में सब्जियों का विशेष स्थान है। मटर भारत के कई मुख्य राज्यों में उगाया जाता है जैसे हरियाणा, पंजाब, यू.पी., कर्नाटका, बिहार, उड़ीसा। हरियाणा में यह फसल कर्नल, हिसार, सोनीपत, पानीपत, रोहतक आदि जिलों में उगाई जाती है। मटर की अच्छी पैदावार के लिए बिजाई से पहले बीज का राइजोबियम कल्चर से उपचार करें। मटर एक पौष्टिक सब्जी है, परंतु इस फसल में लगने वाले रोगों की वजह से इस सब्जी के उत्पादन में किसान भाईयों को कई बार नुकसान उठाना पड़ता है। यदि इसकी बीमारियों का सही ढंग से प्रबंध किया जाये तो इसकी गुणवत्ता व उत्पादन दोनों का लाभ उठाया जा सकता है। इस लेख में मटर की हानिकारक बीमारियाँ व उनकी रोकथाम की उचित जानकारी दी गई है।

विल्ट या जड़ गलन- इस रोग से प्रभावित पौधों की जड़ें गल जाती हैं अथवा पत्ते सूख जाते हैं। 

रोकथाम- 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचार करें। जिस क्षेत्र में इस रोग की समस्या ज्यादा हो वहां अगेती बिजाई न करें तथा रोग का नियंत्रण करने के लिए 3 वर्ष का चक्र अपनाएं।

पाऊडरी मिल्ड्यू- रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर दोनों ओर चकत्ते दिखाई देते हैं। यह सफ़ेद रंग के चकत्ते पत्तियों के अलावा फलियों व तने की सतह पर भी दिखायी देते हैं।

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिए 500 ग्राम घुलनशील सल्फर या 200 ग्राम बाविस्टिन प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। बीज हेतु फसल में 0.1 प्रतिशत केलेक्सिन भी लाभदायक है।

 

 

रतुआ रोग- यह रोग पिछेती फसल में ज्यादा हानिकारक है। रतुआ रोगग्रस्त पौधों की पत्तियों के निचले स्तर पर पीले व संतरी रंग के उबरे हुए धब्बे दिखाई देते हैं।

रोकथाम- इस रोग के नियंत्रण के लिए 400 ग्राम इन्डोफिल एम 45 को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें तथा दस दिन के अंतर पर 2 से 3 बार दोबारा छिड़काव करें।

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