किसान आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कौन ?

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आगे कुछ विशेष बिन्दुओं पर चर्चा करना सार्थक है, शायद यह बिन्दु कृषकों की सोच में बदलाव ला सकें और आत्महत्याओं पर रोक लग सके।

प्रत्येक मौसम में पूरे क्षेत्र पर एक तरह की फसल न लगाएँ- भारतीय कृषि जलवायु पर आधारित है, अधिक वर्षा जल आधारित फसलों के साथ कम वर्षा में अच्छी ऊपज देने वाली फसलें लगाएँ, खाद्यान्नों में धान के व गेहूँ के अलावा मक्का, ज्वार, सोयाबीन, तुअर, चना, मटर, सरसों, अलसी, तिली आदि भी लगाएँ। आज इनकी बाजार में अच्छी माँग है और भाव भी सरकार ने अच्छे घोषित कर रखे है। मिश्रित फसल या अन्तर फसल अरहर के साथ सोयाबीन, मूंग, उड़द (क्रष्ठ) लगाने से मिट्टी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। 

खेती आजीविका न होकर व्यापार मानें- कृषक अपना साधन, कृषि आदान, रूपयों की व्यवस्था, नजदीकी बाजार, मजदूरों की उपलब्धियों पर होने वाले खर्चो को ध्यान में रखकर ऐसी योजना बनाएँ कि उसे घाटा न हो; यहाँ पर व्यापारिक बुद्धि अपनाना श्रेयकर है।

किसान देश में आत्म हत्याएँ क्यों कर रहे हैं? इस विषय पर पूर्व में कई स्तरों पर चर्चाएँ होती रही हैं। यह कृत्य परिवार को कई प्रकार के कष्टों में डालता है और देश में एक कृषि उत्पादक कम हो गया इसे चिन्तनीय बनाता है। केन्द्र एवं राज्य सरकारें अपने स्तर पर कम ब्याज पर ''कृषि ऋण'' कृषि जिन्स पर समर्थन मूल्य/बोनस प्रदान करती है। कृषि सामग्रियों में अपनी ओर से आर्थिक सहायता परोक्ष एवं उपरोक्त रूप से प्रदान करती है। कृषि विश्व विद्यालय के कृषि वैज्ञानिक नई-नई खोज कर विभिन्न कृषि जलवायु एवं मिट्टी के प्रकार अनुसार विपुल उत्पादन देने वाली फसलों की जातियाँ विकसित कर रहे हैं- साथ ही उनके प्रचार- प्रसार हेतु ''कृषि विज्ञान'' केन्द्र कृषकों के खेतों पर जाकर उनका प्रशिक्षण और अपने केन्द्र पर बुलाकर उनसे संबंधित सटीक जानकारियाँ दे रहे हैं। कृषि विश्व विद्यालय समय-समय पर कृषि विभाग के अधिकारियों को भी सामयिक जानकारी उपलब्ध कराता है: और कृषि विभाग लगातार कृषि की उन्नत तकनीकों को कृषकों के खेतों पर पहुंचा रहा है-इन सब तथ्यों को सोचकर यह आत्महत्याएँ सीधे कृषि से जुड़े वैज्ञानिकों को कहीं अधिक अवसाद में लाती हैं।

अधिक उत्पादन व लाभ के वर्ष में बचत करना- इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इस समय की हुई बचत यदि अगले वर्ष में नुकसान होगा तो भी कृषक घबराएगा नहीं। अच्छे उत्पादन वर्ष व लाभ पर अनुत्पादक खर्च जैैसे जीप, मोटर साईकिल, अधिक कीमत के फोन, टी.वी. आदि लेना और खर्चो को बढ़ाएँगे। इन पर खूब सोच समझकर ही रूपया खर्च करें।

कृषि उन्नत तकनीकों को अपनाना- मिट्टी परीक्षण जरूर करवाएँ-आज विपुल उत्पादन देने वाले बीज, संतुलित खाद, मिट्टी जाँच, ड्रिप सिचांई, नाडेप कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट के अलावा, कम खाद पानी में अच्छा उत्पादन देने वाली जातियँा हैं। बीजों का अंकुरण प्रतिशत किसान को खुद जाँचना आना चाहिए, समय पर बुआई व कटाई तथा उचित भंडारण ऐसे विषय हैं जिन पर खेत में बीज बोने के पूर्व पूरी योजना कागज पर बनाना चाहिये। अच्छा हो प्रत्येक खेत की योजना बनाएं, उसका तजुर्बा ही बतायेगा कि उसका कौन सा खेत किस फसल के लिए उपयुक्त है। मिट्टी परीक्षण जरूर करवाएं-तदनानुसार उर्वरकों का उपयोग करना पैसे की बचत है।

कुछ क्षेत्र में खाद्यान्न के अलावा अन्य फसल/वृक्ष लगाना- प्रतिदिन कुछ रूपया या प्रति सप्ताह कुछ रूपया आता रहे उसके लिए कुछ क्षेत्र में फूलों की खेती, मधुमक्खी पालन, मुनगा, पपीता जो एक वर्ष में पैसा देने लगते है लगाना चाहिए। अधिक क्षेत्रफल है तो आंवला, जाम, नीबू, आम, अनार सीताफल के बगीचे लगाना भी ठीक रहेगा।

फसलों के साथ दुग्ध देने वाले जानवर रखना- आज यह व्यवसाय बहुत ही लाभ का धंधा है- खेतों के लिए गोबर की खाद का मिलना, फसल अवशेष का उचित उपयोग, महिलाओं व बच्चों के लिए समय का सदुपयोग। अच्छा स्वास्थ्य, अनेक लाभ है। आज दूध के साथ यदि उचित रूप से गौमूत्र इकठा किया जाए तो कई दवा उद्योग व खेतों में कीटनाशक के बगैर उसका उपयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। डेयरी, बकरी पालन, मुर्गी पालन के उपयोग के अलावा आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में अहम भूमिका निभायेगा।

फसल बीमा जरूर करवाएँ-

प्रधानमंत्री जी की यह योजना विपरीत मौसम की मार सहने में कृषकों को वरदान है- अब प्रत्येक किसान अपनी फसल के नुकसान की भरपाई अलग से प्राप्त कर सकता है- पर उसका बीमा फसल बोने के पूर्व लेना जरूरी है। म.प्र. सरकार भावान्तर योजना भी ला रही है- यह अच्छा है।

कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि विभाग विशेषज्ञों से सलाह लेना - प्रत्येक किसान या कई किसान कृषि विश्व विद्यालय नहीं जा सकते, अत: जगह-जगह कृषि विज्ञान केन्द्र खोजे जा रहे है-कृषि विभाग के कर्मचारी निश्चित दिन व समय पर उचित सलाह हेतु उपलब्ध रहेंगे, इनसे संपर्क कर कीट व रोग की रोकथाम हेतु सलाह जरूर लें, जिससे फसल का उत्पादन न घटे।

फसल का बेचना- भारत शासन इस पर विशेष ध्यान कृषकों का आकर्षित कर रहा है- उसका लाभ लें। ई-मार्केटिंग देखें। 

टी.वी., रेडियो व समाचार पत्रों में कृषि की जानकारी- इन्हेें देखें, सुने, पढ़े और एक डायरी में नोट भी करें । अपना ज्ञान बढ़ाए, खुद लाभ लें व अन्य से लाभ साझ्ंाा करें।

कृषि ऋण का उपयोग और चुकाना- ध्यान रहे यह कर्ज है कोई दान नहीं, आपके कर का पैसा है उसे चुकाना कर्म ही नहीं धर्म भी है- जिससे दूसरों को भी वह उपलब्ध हो सके।

सारांश यह है कि उपरोक्त बिन्दु एक प्रकाश किरण सिद्ध हो सकते हैं। हानि और लाभ व्यवसायिक दृष्टि की कसौटी है। बैंक से उतनी राशि ही लें जो फसल उत्पादन के लिए चाहिए। कई कृषक फसल ऋण भी ले लेते हैं और उसी जमीन पर व्यक्तिगत ऋण भी ले लेते हैं- दोनों मिलकर किसान को एक बड़े कर्ज में डुबा देते है। जब अधिक उत्पादन मिले, पैसा अधिक मिले तो बचत करे जिससे हानि के वर्ष में सहारा मिले, दूध का व्यवसाय, मुर्गी पालन, फूलों की खेती, मसाला फसलों की खेती, एक वर्ष में लाभ देने वाले फलदार वृक्ष जैसे  पपीता, मुन्गा आदि अपने कृषि के कुछ खेत में जरूर लगाएँ। कीटनाशकों में अनावश्यक खर्च से बचें, गोमूत्र, नीम का तेल, सर्फ जैसे साबुन का पानी प्रारंभ में उपयोग कर कीड़ों को मारने का प्रयोग ठीक रहेगा। कृषि विज्ञान केन्द्र दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कृषि कार्यक्रम प्रतिदिन कुछ समय जरूर देखें। भूमि की मिट्टी की जाँच, गोबर-कचरें की खाद का प्रयोग कर बहुत कुछ पैसा बचाया जा सकता है। उन्नत जाति का बीज लगाएँ, कम लागत अधिक उत्पादन कृषि तकनीकों का ज्ञान पास के कृषि विज्ञान  केन्द्र से प्रशिक्षण प्राप्त कर अथवा उनके द्वारा प्रसारित प्रपत्रों को ध्यान से पढ़कर उन्हे अपनाकर नई सोच विकसित करें।

  • डॉ. बी. एम. गोयदानी
  • पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक
  • कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर (म.प्र.) 
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