किसानों की आय में होगी वृद्धि जब चुनेंगे चने की आधुनिक खेती

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जलवायु व मौसम  

चना एक शुष्क एवं ठण्डे जलवायु की फसल है जिसे रबी मौसम में उगाया जाता है। चने की खेती के लिए मध्यम वर्षा (60-90 सेमी वार्षिक वर्षा) और सर्दी वाले क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त है। फसल में फूल आने के बाद वर्षा होना हानिकारक होता है, क्योंकि वर्षा के कारण फूल परागकण एक-दूसरे से चिपक जाते हैं जिससे बीज नहीं बनते है। इसकी खेती के लिए 24-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। फसल के दाना बनते समय 30 डिग्री सेल्सियस से कम या 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापक्रम हानिकारक रहता है।

भूमि का चुनाव 

सामान्य तौर पर चने की खेती हल्की से भारी भूमियों में की जाती है, किंतु अधिक जल धारण क्षमता एवं उचित जल निकास वाली भूमियां सर्वोत्तम रहती है। छत्तीसगढ़ की डोरसा, कन्हार भूमि इसकी खेती हेतु उपयुक्त है। मृदा का पीएच मान 6-7.5 उपयुक्त रहता है। चने की खेती के लिए अधिक उपजाऊ भूमियां उपयुक्त नहीं होती, क्योंकि उनमें फसल की पैदावार अधिक हो जाती है जिससे फूल एवं फलियाँ कम बनती हैं।

चना  भारत की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। चने को दालों का राजा भी कहा जाता है। पोषक मान की दृष्टि से चने के 100 ग्राम दाने में औसतन 11 ग्राम पानी, 21.1 ग्राम प्रोटीन, 4.5 ग्रा. वसा, 61.5 ग्रा. कार्बोहाइड्रेट, 14.9 मिग्रा. कैल्सियम, 7.2 मिग्रा. लोहा, 0.14 मिग्रा. राइबोफ्लेविन तथा 2.3 मिग्रा. नियासिन पाया जाता है। दलहनी फसल होने के कारण यह जड़ों में वायुमण्डलीय नत्रजन स्थिर करती है, जिससे खेत की उर्वराशक्ति बढ़ती है। भारत में चने की खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा बिहार में की जाती है। देश के कुल चना क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत भाग तथा कुल उत्पादन का लगभग 92 प्रतिशत इन्हीं प्रदेशों से प्राप्त होता है। भारत में चने की खेती 7.54 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है जिससे 7.62 क्ंिव./हे. के औसत मान से 5.75 मिलियन टन उपज प्राप्त होती है। भारत में सबसे अधिक चने का क्षेत्रफल एवं उत्पादन वाला राज्य मध्यप्रदेश है तथा छत्तीसगढ़ प्रांत के मैदानी जिलों में चने की खेती असिंचित अवस्था में की जाती है। 

भूमि की तैयारी

असिंचित अवस्था में मानसून शुरू होने से पूर्व गहरी जुताई करने से रबी के लिए भी नमी संरक्षण होता है। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल तथा 2 जुताई देशी हल से की जाती है। फिर पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है। दीमक प्रभावित खेतों में क्लोरोपायरीफॉस मिलाना चाहिए इससे कटुआ कीट पर भी नियंत्रण होता है। चना की खेती के लिए मिट्टी का बारीक होना आवश्यक नहीं है, बल्कि ढेलेदार खेत ही चने की उत्तम फसल के लिए अच्छा समझा जाता है। खरीफ  फसल कटने के बाद नमी की पर्याप्त मात्रा होने पर एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो जुताइयाँ देशी हल या ट्रैक्टर से की जाती है और फिर पाटा चलाकर खेत समतल कर लिया जाता है। दीमक प्रभावित खेतों में क्लोरोपायरीफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 20 किलो प्रति हेक्टर के हिसाब से जुताई के दौरान मिट्टी में मिलायें। इससे कटुआ कीट पर भी नियंत्रण होता है।

काबुली चना

काक-2: यह  120-125  दिनों में पकने वाली किस्म है । इसकी औसत उपज 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह भी उकठा निरोधक किस्म है ।

श्वेता (आई.सी.सी.व्ही. - 2): काबुली चने की इस किस्म का दाना आकर्षक मध्यम आकार  का होता है। फसल 85 दिन में तैयार होकर औसतन 13 - 20 क्विंटल उपज देती है। सूखा और सिंचित क्षेत्रों के लिए उत्तम किस्म है। छोला अत्यंत स्वादिष्ट तथा फसल शीघ्र तैयार होने के कारण बाजार भाव अच्छा प्राप्त होता है।

जेजीके-2: यह काबुली चने की 95-110 दिन में तैयार होने वाली  उकठा निरोधक किस्म है जो कि18-19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है । 

मेक्सीकन बोल्ड: यह सबसे बोल्ड सफेद, चमकदार और आकर्षक चना है। यह 90 - 95 दिन में पककर तैयार हो जाती है । बड़ा और स्वादिष्ट दाना होने के कारण बाजार भाव सार्वाधिक मिलता है। औसतन 25 - 50 क्ंिवटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। यह कीट, रोग व सूखा सहनशील किस्म है।

उन्नत किस्म    

देशी चने का रंग पीले से गहरा कत्थई या काले तथा दाने का आकार छोटा होता है। काबुली चने का रंग प्राय: सफेद होता है। इसका पौधा देशी चने से लम्बा होता है। दाना बड़ा तथा उपज देशी चने की अपेक्षा कम होती है। अनुशंसित चने की प्रमुख किस्मों यहां प्रस्तुत है:

वैभव, जेजी-74, उज्जैन 21, राधे, जे.जी. 315, जे. जी. 11, जे.जी. 130,  बीजी-391, जेएकेआई-9218, विशाल।

बीज की मात्रा 

चने की समय पर बोआई करने के लिए देशी चना (छोटा दाना) 75 - 80 कि.ग्रा/हे. तथा देशी चना (मोटा दाना) 80 - 10 कि. ग्रा./हे., काबुली चना (मोटा दाना) - 100 से 120 कि.ग्रा./हे. की दर से बीज का प्रयोग करें। पिछेती बुवाई हेतु देशी चना (छोटा दाना) - 80 - 90 किग्रा./हे. तथा देशी चना (मोटा दाना) - 100 से 110 कि.ग्रा./हे. तथा उतेरा पद्धति से बोने के लिए 100 से 120 किग्रा./हे. बीज पर्याप्त रहता है। सामान्य तौर पर बेहतर उपज के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 3.5 से 4 लाख की पौध संख्या अनुकूल मानी जाती है।

बुवाई का समय व विधि  

चने की बुआई समय पर करने से फसल की वृद्धि अच्छी होती है साथ ही कीट एवं बीमारियों से फसल की रक्षा होती है, फलस्वरूप उपज अच्छी मिलती है। अनुसंधानों  से ज्ञात होता है कि 20 से 30 अक्टूबर तक चने की बुवाई करने से सर्वाधिक उपज प्राप्त होती है। असिंचित क्षेत्रों में अगेती बुआई सितम्बर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के तृतीय सप्ताह तक करनी चाहिए। सामान्यतौर पर अक्टूबर अंत से नवम्बर का पहला पखवाड़ा बोआई के लिए सर्वोत्तम रहता है। सिंचित क्षेत्रों में पिछेती बोआई दिसम्बर के तीसरे सप्ताह तक संपन्न कर लेनी चाहिए। उतेरा पद्धति से बोने हेतु अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा उपयुक्त पाया गया है।

हरा चना


जे.जी.जी.1: यह किस्म 120 - 125 दिन में पककर तैयार होने वाली हरे चने की किस्म है। औसतन उपज 13 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

हिमा: यह किस्म 135 - 140 दिन में पककर तैयार हो जाती है एवं औसतन 13 से 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। इस किस्म का बीज छोटा होता है 100 दानों का वजन 15 ग्राम है

दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक चने की बोआई की जा सकती है,जिसके लिए जे. जी. 75 जे. जी. 315 भारती, विजय, अन्नागिरी आदि उपयुक्त किस्में है। बूट हेतु चने की बोआई सितम्बर माह के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह तक की जाती है। बूट हेतु चने की बड़े दाने वाली किस्में जैसे वैभव, पूसा 256, पूसा 391, विश्वास, विशाल, जे.जी. 11 आदि लगाना चाहिए।

सिंचाई  

आमतौर पर चने की खेती असिंचित अवस्था में की जाती है। चना फसल के लिए कम जल की आवश्यकता होती है। चने में जल उपलब्धता के आधार पहली सिंचाई फूल आने के पूर्व अर्थात् बोने के 45 दिन बाद एवं दूसरी सिंचाई दाना भरने की अवस्था पर अर्थात् बोने के 75 दिन बाद करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक  

चने की फसल से अच्छी उपज लेने के लिए 20 किलो नत्रजन, 40 किलो स्फुर, 20 किलो पोटाश व 20 किलो सल्फर प्रति हेक्टेयर का उपयोग करें। उर्वरक की पूरी मात्रा बोवाई के समय कूंड में बीज के नीचे 5-7 से.मी. की गहराई पर देना लाभप्रद रहता है। मिश्रित फसल के साथ चने की फसल को अलग से खाद देने की आवश्यकता नहीं रहती है।

उपज एवं भण्डारण  

चने की शुद्ध फसल को प्रति हेक्टेयर लगभग 20-25 क्ंिव. दाना एवं इतना ही भूसा प्राप्त होता है। काबुली चने की पैदावार देशी चने से तुलना में थोड़ा सा कम देती है। भण्डारण के समय 10-12 प्रतिशत नमी रहना चाहिए।

 

  • झालेश कुमार
  • इन्द्रपाल सिंह पैकरा
  • दिनेश कंवर
  • नीरज कुमार ठाकुर 
  • लोकेश चंद्राकर

इ.गां.कृ.वि.वि., रायपुर (छ.ग.)
email: jhalesh.ku.sahu@gmail.com

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