गन्ने के कीट एवं रोकथाम

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भूमिगत कीट : दीमक (टरमाइट)

यह शुष्क जलवायु, हल्की भूमियों एवं सिंचाई की कमी वाले इलाकों में अधिक नुकसान पहुंचाता है। गन्ने की बोई हुई आंखों को पहले असरकर अंकुरण प्रभावित करता है। बाद में पोरियों में सुरंग जैसी बनाकर मिट्टी भरी दिखाई देती है। हालांकि रानी दीमक तो बाली में रहती है पर खेत में सफेद से चीटीं आकार के श्रमिक दीमक मिट्टी में दिखाई देते हैं। फसल को 30 से 40 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचाते है। इनका प्रकोप वैसे तो सारा साल रहता है पर गर्मी में तीव्रता से बढ़ जाता है।

रोकथाम : क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी 5 लीटर प्रति हेक्टेयर या वाइफेन्थ्रिन 400 मिली को 2 से 3 ली. पानी में घोलकर बारीक रेत में मिलाकर पौधों के पास डालें व हल्की सिंचाई करें।

 

व्हाईट ग्रब (कुंडल कीट)

इस कीट से विभिन्न फसलें जिनकी जड़ों को नुकसान पहुंचाकर यह कीट 20 से 40 प्रतिशत एवं कभी-कभी पूरी फसल को चौपट करता है। खेत में कच्चा खाद डालने से इसका प्रकोप अधिक होता है। ग्रब द्वारा जड़ों को खाने के कारण गन्ने की पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगती हैं। खेत में यत्र-तत्र सूखे पौधे नजर आने लगते हैं। मई से अगस्त माह तक इसका नियंत्रण आवश्यक है।

भूमिगत कीटों की रोकथाम

  • दीमक के बाम्बियों को आस-पास की पड़त भूमियों में तलाशकर उसमें रानी दीमक को नष्ट करें। नाली में क्विनालफॉस/सल्फास या अन्य धूम्र विनाशक पतली पाईप से डालें।
  • दीमक एवं ग्रब हेतु 20 से 25 किलो क्लोरोपायरीफॉस डालकर नमी बनाये रखें। अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत 400 मिली प्रति हेक्टेयर 1750 लीटर पानी में मिलाकर डालें।
  • अधिक प्रकोप की दशा में बाईफेन्थ्रिन (मारकर) 400 मिली को 2-3 लीटर पानी में घोल कर रेत में मिलाकर पौधों के पास भुरकें व सिंचाई करें।
  • वर्षा पूर्व कीटनाशक क्लोथियानीडीन 50 डब्ल्यूडीजी का 250 ग्राम 1800 लीटर पानी में मिलाकर पौधों में छिड़कें व नमी बनाये रखें।
  • जैविक रोकथाम हेतु बेविरिचाबेसियाना 5 कि.ग्रा. पके खाद या प्रेसमड में मिलाकर पौधों के पास डालकर मिलाएं। मेटाराइजियम एनासोपलाई का भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • दीमक के खेत में घूमते कीटों को नष्ट करने हेतु मटकों में मक्का के छूंछ (दाना निकला भुट्टा) एवं थोड़ा पानी डालें। ऐसे मटकों को खेत में 5-6 स्थानों पर रखें। यह भुट्टों की सड़ांध वाली महक दीमक को आकर्षित करेगी। जब पर्याप्त दीमक अन्दर दिखें तब मटकों के मुंह पर कपड़ा बांधकर अंगारों पर थोड़ी देर रखें, इससे दीमक नष्ट हो जायेगी। ऐसा दो-तीन बार करें।
  • ट्रेप फसलें- ढेंचा की जड़ों के पास या गन्ने के खेत के आसपास नीम, जामुन, बबूल की टहनियां जगह-जगह गाड़ें। इन पर इल्लियां आकर्षित होंगी। उनको कीटनाशकों से मारें।
गन्ने की विभिन्न अवस्थाओं एवं मौसम के आधार पर देश में लगभग 275 से अधिक प्रकार के कीट इस प्रमुख नगदी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इसमें से प्रदेश में सक्रिय भूमिगत, बेधक एवं चूसक कीटों के बारे में आवश्यक जानकारी यहां दी जा रही है। यह अनुमान है कि गन्ना फसल में 20 प्रतिशत से अधिक औसत उपज व शक्कर रिकवरी में भी कीटों द्वारा नुकसान होता है। वैज्ञानिक अनुशंसा है कि सावधानी अपनाकर एवं समय पर उपचार कर अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

चूसक कीट
पपड़ी कीड़ा

यह पोरियों पर पपड़ी की तरह चिपका रह कर रस चूसता है। पौधों की बढऩ को काफी नुकसान होता है। बीज के साथ, कृषि कार्यों के उपकरणों के साथ, पुराने ठूठों के माध्यम से स्वस्थ फसल में इधर-उधर फैलता है। जड़ी फसल में अधिक प्रकोप पाया जाता है। इसका प्रकोप गांठें बढ़ाने के बाद से अन्त तक बना रहता है। वर्षा ऋतु में अधिक फैलता है।

रोकथाम

  • कीट मुक्त बीज का उपयोग करें। जड़ी फसल से बीज न लें।
  • बीजोपचार के घोल में 1 मिली प्रति लीटर पानी के मान से मेलाथियान (30 ई.सी.) का अवश्य उपयोग करें।
  • निचली पत्तियों को निकाल कर पोरियों पर डायमिथिएट (30 ई.सी.) या क्विनालफॉस दवा 2.5 ली./ हेक्टेयर का छिड़काव करें।
  • जैविक उपचार में गो-मूत्र व नीम का घोल पोरियों पर छिड़कें। काक्सीनिलिड परभक्षियों के 1500 वयस्क बीटल प्रति हे. फसल पर छोड़ें। इस दशा में रसायनिक उपचार न करें।
  • क्विनालफॉस/क्लोरोपायरीफॉस 2 मि.ली./ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें।

पाइरिल्ला

पत्तियों से रस चूसकर नुकसान करने वाला प्रमुख कीट है। इसका प्रकोप मुख्यतया अप्रैल से अक्टूबर तक रहता है। वयस्क कीट भूरे रंग का व सिर के आगे चोंच जैसा होता है। निम्फ या शिशु के पीछे दो पूंछ जैसी संरचना होती है। शिशु एवं वयस्क दोनों नुकसान करते हैं व इसके कारण पत्तियों का रंग पीला पडऩे लगता है। यह कीट पत्तियों पर लसलसा पदार्थ छोड़ता है जिस पर काली फफूंद का असर होने लगता है। हरीतिमा में कमी के कारण बढऩ रुक जाती है। उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक कमी एवं साथ ही चीनी की मात्रा पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। अण्डों के हल्के पीले रंग के गुच्छे नजर आते ही नियंत्रण उपाय शुरू कर देना चाहिए।

नियंत्रण के उपाय

  • पाइरिल्ला का सफल प्रबंधन जैविक उपायों से संभव है। इस हेतु एप्रिकेनिया के 4-5 लाख अण्डे या 5 हजार शंखियां प्रति हेक्टेयर प्रकोपित फसल पर छोड़ें। खेत में, अगर वर्षा न हो तो, सिंचाई कर नमी बनाएं।
  • मेटाराईझियम एनीसोपलाई फफूंद ग्रसित 250-400 पाईरिल्ला प्रति हेक्टेयर छोड़ें या इस फफूंद के 10 विषाणु (स्पोर) प्रति मि.ली. पानी में घोल कर छिड़कें। इसी तरह ग्रेनिलोसिस विषाणु के प्रयोग भी संतोषजनक रहे हैं।
  • पायरिल्ला अण्डों का परजीवी टेट्रास्टिकस पाईरिल्ली के ग्रसित अण्डों के समूहयुक्त पत्तों को काटकर जगह-जगह फैलायें।
  • अगर परजीवी प्रभावित फसल में नजर न आये तो क्विनालफॉस 25 प्रतिशत 800 मि.ली. प्रति हेक्टेयर या अन्य स्पर्श प्रभावी कीटनाशक का छिड़काव करें।

सफेद मक्खी

पत्तियों पर सफेद काले कीड़े (कोष) चिपके नजर आते हैं। निचली सतह से रस चूसकर नुकसान पहुंचाती है जिससे पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं। जिन खेतों में पानी का भराव हो या नत्रजन की कमी से कमजोर फसल में प्रकोप अधिक होता है। जड़ी फसल में प्रभाव पहले नजर आता है। उपज में 20-25 प्रतिशत एवं रिकवरी में 1 से 3 प्रतिशत की कमी आती है।

रोकथाम

  • प्रभाव दिखते ही क्राईसोपर्ला के 2500 अण्डे या लार्वा जो प्रयोग शालाओं या बाजार में उपलब्ध हैं को ग्रसित पत्तों पर छोड़ें।
  • जल निकासी करें व नत्रजन की कमी न होने दें। प्रारंभिक अवस्था में ग्रसित पत्तियों को निकाल कर नष्ट करें।
  • रसायनिक उपायों में क्विनालफॉस या क्लोरोपायरीफॉस 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। फुहार पत्तियों के नीचे की तरफ अवश्य पड़े। अधिक प्रकोप की दशा में इमिडाक्लोप्रिड (17.8 प्रतिशत) 200 मिली. प्रति हेक्टेयर छिड़कें।
  • जैविक नियंत्रण के लिए बेविरिया बेसिलना/ मेटाराहीजियम 250 ग्रा./एकड़ या ट्राइकोडर्मा 10 किलो प्रति हे. प्रयोग करें।

मिली बग

यह गुलाबी रंग का कीट गन्ने की गठानों के पास चिपका नजर आता है। गन्ने पर लसलसा पदार्थ जिसमें बाद में काले रंग की मोल्ड का प्रभाव हो जाता है। सूखे की दशा में अधिक प्रकोप होता है। तेज वर्षा में एसपरजिलस फफूंद का प्रभाव बढऩे से प्रकोप में कमी आती है। दूर से गन्ने में ऊपर नीचे चढ़ते-उतरते चीटें इसका लक्षण हैं। यह 15-20 प्रतिशत उपज में व 1-2 प्रतिशत रिकवरी का नुकसान कर देते हैं।

रोकथाम

स्वच्छ बीज के टुकड़ों को पानी में रात भर भिगोकर उपचारित करें। बाविस्टीन के साथ मैलाथियान या अन्य कीटनाशक डालें। गन्नों के तनों पर पपड़ी कीट की तरह कीटनाशी का छिड़काव करें। इस हेतु क्विनालफॉस या क्लोरोपायरीफॉस का 2 मिली दवा प्रति लीटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड 200 मि.ली. 800 ली. पानी में मिला कर गन्नों पर छिड़कें। परजीवी क्राईसोपर्ला अगर मौजूद हो तो वह इस कीट का भक्षण करता है।

छेदक कीट
अग्र तना छेदक

बुआई उपरांत अंकुरण के बाद बढ़ते तापक्रम के साथ अग्र तना छेदक का प्रकोप ऊपर की पोई सूखने के लक्षण से दिखाई देने लगता है। बसंतकालीन एवं गर्मी की बुआई में इसका प्रकोप अधिक होता है।

इसकी इल्ली मुलायम तने में सतह के पास छेदकर प्रवेश करती है एवं गोफ को खाने के कारण ऊपर निकलती पोई सूख जाती है। इसे जरा सा खीचने से बाहर निकल आती है। इस छेदक का प्रकोप उपज और शक्कर की मात्रा पर घातक सिद्ध होता है।

रोकथाम

  • अग्र तना छेदक ग्रसित पौधों को सतह से काटकर निकालें। इसके उपरांत जो कल्ले आयेंगे वे गन्ना बनेंगे।
  • पलवार बिछे खेत में नाजुक इल्ली तने तक पहुंचने के पहले ही नष्ट होने की संभावना अधिक रहती है।
  • देर की बोनी में अंकुरण के समय ही फोरेट दानेदार 25 किलो/ हेक्टेयर डालकर पानी देते रहें। मैलाथियान/कार्बोरिल डस्ट भी पौधों के पास भुरकी जा सकती है। स्पर्श कीटनाशी का जैसे क्विनालफॉस, क्लोरोपायरीफॉस का छिड़काव भी प्रकोप को रोकता है।
  • अण्डों के परजीवी ट्राईकोग्रामा किलोनिस 5000 वयस्क मार्च माह में छोड़ें। असर कम हो तो दुबारा छोड़ें।

शीर्ष तनाछेदक

यह प्राय: भरपूर बढ़त होने के बाद प्रकोप करता है। अगर तीव्रता अधिक हो तो किसी भी अवस्था में इसका असर देखा जा सकता है। यह ऊपरी अधखुली पत्ती की शीर्ष से प्रवेश कर नीचे की ओर सुरंग बनाते हुए गोफ तक पहुंच कर बढ़वार बिन्दु को नष्ट कर देता है। बढ़वार रुक जाने से ऊपरी गांठों पर अंकुरित शाखाएं दिखने लगती हैं। ऊपरी खुलती पत्तियों को देखें तो उन पर एक लाईन में कई छेद नजर आते हैं। यह इस छेदक की मुख्य पहचान है। विभिन्न अवस्थाओं में इस कीट की 5 पीढिय़ां मार्च माह से वर्षा काल में नुकसान पहुंचाती हैं। औसतन 20-25 प्रतिशत उपज में कमी आ जाती हैं। शक्कर की गुणवत्ता एवं मात्रा में भी नुकसान होता है।

रोकथाम

  • जैविक उपचार हेतु ट्राइकोग्रामा 50000 वयस्क प्रति हे. 15-20 दिन के अंतराल पर छोड़ें। ट्राईकोकार्ड अच्छी प्रयोगशाला से ही लें। लाईट ट्रेप का प्रयोग करते रहें।
  • गन्ने में मिट्टी अवश्य चढ़ायें।
  • कार्बोफ्यूरान (3जी) वर्षा शुरू होते ही नमी में गन्नों के पास डालें या सिंचाई करें। या फ्यूराडान (3जी) 33 किलो का प्रयोग करें।

जड़ छेदक

यह बेधक कीट भूमि के अंदर से तनों में छेद कर प्रवेश करता है। इसकी इल्ली पत्तियों पर से रेंगती हुई नीचे तक आकर नुकसान पहुंचाती है। अगर इसका प्रकोप प्रारंभिक अवस्था में होता है तो मध्य पोई सूख जाती है पर खींचने से निकलती नहीं है। ना ही दुर्गन्ध आती है जैसी अग्र तना छेदक के ग्रसित पौधों में आती है। बाढ़ की अवस्था में लक्षण बाहर से नहीं दिखते, पौधा सूखता जाता है। इसकी इल्ली का रंग सफेद, सिर का रंग भूरा व पीठ पर कोई धारी नहीं होती जबकि अग्रतना छेदक इल्ली के सिर का रंग काला व पीठ पर पांच जामुनी रंग के पट्टे दिखते हैं। प्रकोपित पौधों में अधिकतर कल्ले नहीं फूटते या अपेक्षाकृत कम फूटते हैं।

रोकथाम

  • ट्राईकोग्रामा परजीवी कीट 3 लाख प्रति हेक्टेयर मान से छोडं़े, यह अण्डों को नष्ट करेगा।
  • क्लोरोपायरीफॉस (20 ईसी) का 5 लीटर प्रति हेक्टेयर का 1000 ली. पानी में मिलाकर जड़ों के पास ड्रेसिंग करें।
  • क्विनालफॉस (50 प्रतिशत) या कार्बोफ्यूरान या फोरेट दानेदार 25 से 30 किलो प्रति हेक्टेयर जड़ों के पास सिंचाई करें।

तना छेदक

इस कीट की भी इल्लियां हानि पहुंचाती हैं। इस कीट का प्रकोप वर्षा ऋतु में ही होता है। पत्तियों पर अण्डों से निकलकर इल्ली तने पर आंखों के सहारे गन्ने में छेदकर प्रवेश करती हैं। पोरियों पर छोटे-छोटे छेद पाये जाते हैं जहां से यह बाहर निकलती हैं। आंखें अंकुरित हो जाती हैं। गन्ना सूखने लगता है। अगोला पहले सूखता है। उपज में 15-20 प्रतिशत की कमी एवं गुणवत्ता में 1 से 1.5 प्रतिशत का नुकसान हो जाता है।

रोकथाम

  • अन्य बेधक कीटों की तरह ट्राईकोकार्ड लगायें। कोटेशियाफेलियस इस इल्ली का परजीवी है। 500 वयस्क प्रति हेक्टेयर 2 या 3 बार छोड़ें।
  • स्पर्श कीटनाशी क्लोरोपायरीफॉस/ क्विनालफॉस आदि का छिड़काव करें।
  • निचली पत्तियों को निकाल कर नष्ट करें।
  • गन्ना गिरने से बचायें।
  • खेतों में लाईट ट्रेप एवं फेरोमेन ट्रेप अवश्य लगायें।

सफेद ऊनी माहू

महाराष्ट्र में इसका प्रकोप होता रहता है। इस हेतु सावधानी आवश्यक है। शिशु पीले हरे रंग के होते हैं, जिनकी पीठ पर सफेद रोयें ऊन की तरह दिखाई देते हैं। पत्तियों की पिछली सतह पर मुख्य शिरा के दोनों ओर दिखाई देते हैं। रस सूचकर एवं उत्सर्जित शहदनुमा पदार्थ जिस पर काली फफूंद होने से बढऩ रुक जाती है। उपज व रिकवरी पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

रोकथाम

इसका जैविक नियंत्रण हेतु कोनोवाथ्रा (डीफा एफीडोव्होरा) परजीवी की इल्लियां, माहू को चट कर जाती हैं। इसके अलावा मावक्रोसम इगोरोट्स एवं सिरफिड मक्खी भी प्रभावी सिद्ध हुई हैं। क्राईसोपर्ला परजीवी भी अगर फसल में हो तो इल्लियों को नष्ट करने में सहायक है।

रसायनिक नियंत्रण हेतु स्पर्श कीटनाशकों का छिड़काव करें।

चूहों का नियंत्रण

चूहे गन्ने की फसल के बड़े शत्रु हैं। यह जड़ से गन्नों को कुतर कर बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। अधिकतर गन्ना गिर जाता है व सूख जाता है।

रोकथाम

  • चूहों के प्राकृतिक शत्रु नेवला, सांप, उल्लू आदि को न मारें। खेत में चिडिय़ों को बैठने हेतु 'ञ्जÓ आकार की छडिय़ां गाड़ें।
  • जिंक फास्फाईड (80 प्रतिशत का 2 प्रतिशत जहर गेहूं, ज्वार, बाजरे या तेल में तले भजियों, पूरियों में मिलाकर बिलों के पास रखें। चूहे इससे मरेंगे लेकिन अगर दिख रहें हों तो ब्रोमोडियोलान (0.005 प्रतिशत) की टिकिया चूहों के घूमने वाले स्थानों पर रखें।
  • भयंकर प्रकोप की दशा में एल्यूमिनियम फास्फाईड (सल्फास) दवा जिन्दा बिलों में रखकर गीली मिट्टी से बंद करें।      

 

  • डॉ. साधुराम शर्मा

   गन्ना विशेषज्ञ, पूर्व गन्ना आयुक्त (म.प्र.)
  मो. : 9630042412  

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