कपास फसल पर संकट का साया

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अति वर्षा का असर, निमाड़ अंचल में

इंदौर। सफेद सोना (कपास) उपजाने वाले निमाड़ अंचल में इस साल ज्यादा बारिश होने से कपास की फसल पर संकट का साया मंडरा रहा है। खरगोन-खंडवा और धार जिले के चुनिंदा किसानों से हुई बातचीत में कपास के पत्ते लाल होने, फूलों के खिरने और घेटों (डेंडू) के सडऩे की शिकायत सामने आई है।

कपास का कटोरा कहे जाने वाले कपास उत्पादक क्षेत्र खरगोन-खंडवा जिलों के किसानों ने अपनी पीड़ा यूँ बयां की। नैतनगांव (खंडवा) के किसान श्री वीरेन्द्र सिंह भीमसिंह यदुवंशी ने बताया कि जुलाई में 40  एकड़ में कपास लगाया था। ज्यादा बारिश होने से पौधों के पत्ते लाल होकर गिर रहे हैं। घेंटे (डेंडू) भी सडऩे लगे हैं। 25 में से 10  डेंडू खराब निकल रहे हैं। करीबी सुलगांव, करोली आदि में भी यही शिकायत है। जबकि बिलाया (खंडवा) के सरपंच श्री नानसिंह चौहान का कहना है कि ज्यादा बारिश होने से कपास की फसल का 40 प्रतिशत नुकसान हुआ है। पंचायत क्षेत्र के मदला, लोंदी, पिपलिया और बिलाया में भी ऐसे ही हालात हैं। उधर, मुल्थान (खरगोन) के श्री केशरीलाल मालाकार कपास की फसल के फूल खिरने और पत्तों के मुरझाने से दुखी हैं। हरे -सफेद मच्छरों का भी प्रकोप है। घेंटे भी छोटे रह गए हैं। खाद -दवाई का छिड़काव कर बचाया जा रहा है। अजंदीकोट (धार) के श्री दिलीप कांजी पाटीदार ने कहा कि घेंटे कम लगने से उत्पादन प्रभावित होगा। जबकि बोधगांव (खरगोन) के श्री पूरन सिंह चौधरी के यहां भी अति वर्षा से पत्तों के लाल होने और डेंडू के सडऩे की शिकायत के चलते  उत्पादन में 50 -60  प्रतिशत नुकसान का  अंदेशा है।

किसानों की इस समस्या पर कृषक जगत ने कृषि विज्ञान केंद्र खंडवा के कृषि वैज्ञानिक डॉ. पी. पी. शास्त्री से बातचीत की। डॉ. शास्त्री ने बताया कि यह नया उकटा रोग (न्यू विल्ट) है, जो किसी फंगस या जीवाणु से नहीं होता, बल्कि खेतों में जल जमाव से होता है। जल में पौधे की जड़ें सांस नहीं ले पाती हैं, जिससे जड़ें अंदर पानी खींचना बंद कर देती है। पानी की कमी से पौधे सूखने लगते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में ही कुछ पौधे झुक जाते हैं। जिससे ऐसा आभास होता है कि पूरी फसल खराब हो गई। लेकिन ऐसा नहीं है। नवंबर -दिसंबर में नई कोंपले आने की संभावना बनी रहती है और नुकसान शत-प्रतिशत नहीं होता। इसका उपाय यही है कि खेत में जल जमाव न होने दें। खेत से पानी की निकासी करें। जड़ों के पास 2 प्रतिशत यूरिया का घोल डालें। इससे सुधार की संभावना बनी रहती है।

अति वर्षा से कपास की फसल प्रभावित हुई है। किसानों को जल निकासी की सलाह दी जा रही है। फसल की नुकसानी को लेकर सर्वे शुरू किया गया है। शासन के निर्देश पर फसल बीमा को पोर्टल पर दर्ज करने  का प्रशिक्षण ग्रामीण कृषि  विस्तार अधिकारियों को दिया जा रहा है। अति वर्षा से 15 -20 प्रतिशत नुकसानी का अनुमान है। वास्तविक आंकड़े तो सर्वे रिपोर्ट के बाद ही पता चलेंगे।
 

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