फॉर्मिंग 3.0 : सूक्ष्म सिंचाई से कृषि को टिकाऊ बनाना

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अशोक शर्मा, एमडी एंड सीईओ, महिंद्रा एग्री साल्यूशंस

भारत में जल की कमी का दबाव लगातार बना हुआ है। जनसंख्या वृद्धि और खपत की वर्तमान दर को देखते हुए 2050 तक भारत जल अभाव ग्रस्त देश बन सकता है। एक वर्ष में प्रति व्यक्ति 1000 क्यूबिक मीटर से कम पानी उपलब्ध होगा। कृषि के लिए पानी मूलभूत आवश्यकता है। यह क्षेत्र भारत के कुल नवीकरणीय जल संसाधनों का लगभग 80 प्रतिशत की खपत करता है। जिसका अर्थ यह है कि देश की सिंचाई की जरूरत को देखते हुए पानी की कमी  से खेती बुरी तरह प्रभावित होगी। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का 15 प्रतिशत योगदान है। देश की दो तिहाई आबादी की आजीविका का आधार कृषि है। देश की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में हुई पानी की कमी से विनाशकारी और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। महाराष्ट्र का मराठवाड़ा तो एक उदाहरण है। यह एक दुष्चक्र है, जिसे जल संरक्षण और प्रबंधन के जरिए बाहर निकालना महत्वपूर्ण है। इसका समाधान सूक्ष्म सिंचाई में निहित है।

सूक्ष्म सिंचाई:  भारत में कुल खेती वाले क्षेत्र का आधा हिस्सा ही सिंचित हो पाता है, जबकि पुराने अकुशल सिंचाई तरीकों से बहुत सारा पानी रिसने, टपकने और वाष्पीकरण में बेकार चला जाता है। लेकिन सूक्ष्म सिंचाई में पानी के ऐसे अपव्यय से बचत होती है। जल क्षमता में सुधार होता है और कृषि उत्पादकता में वृद्धि से समृद्धि आती है। भारत में दो प्रमुख सिंचाई पद्धतियां ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई अपनायी जाती है। ड्रिप सिंचाई के तहत फसल की जड़ों में सीधे पानी पहुंचाने के लिए पाइप के नेटवर्क का उपयोग किया जाता है, जबकि स्प्रिंकलर विधि में वर्षा का अनुकरण करते हुए खेत को सींचने के लिए स्प्रिंकलर का उपयोग किया जाता है।

सूक्ष्म सिंचाई से लाभ: पारम्परिक बाढ़ सिंचाई अर्थात् तेज गति से खेत में पानी के प्रवाह करने की तुलना में सूक्ष्म सिंचाई को अपनाने से 30 -40  प्रतिशत पानी की बचत, उत्पादकता में सुधार 10 -30 प्रतिशत, बिजली की खपत में कमी 20 -40 प्रतिशत, श्रमिक आवश्यकता में कमी 30 -50 प्रतिशत और उर्वरक और पोषण की खपत में 30 प्रतिशत की कमी के साथ पानी की भी बचत होती है। सूक्ष्म सिंचाई से किसानों को मानसून की अनियमितताओं से मुक्ति मिलती है। फसलों को जरूरत के मुताबिक सही सिंचाई की जा सकती है। अति सिंचाई का खतरा नहीं रहता है। सूक्ष्म सिंचाई से मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में भी मदद मिलती है। जबकि बाढ़ सिंचाई से मिट्टी तो बहती ही है,खारापन भी पैदा करती है। जल वितरण की लक्षित प्रकृति के कारण खरपतवारों की वृद्धि भी सीमित रहती है। फसलों को बीमारियों से बचाने में भी मदद मिलती है। यह सिंचाई  ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी इलाकों में भी उपयोग लाई जा सकती है। इससे अयोग्य भूमि को भी उपज योग्य बनाया जा सकता है। लेकिन  इतने सारे फायदों के बाद भी सूक्ष्म सिंचाई विधि का उपयोग बहुत कम हो रहा है। कई किसान अभी भी पारम्परिक तरीकों से सिंचाई कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 45 -70  मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि पर सूक्ष्म सिंचाई लागू करना सम्भव हो सकता है, जबकि फिलहाल उस क्षमता का 7 -10 प्रतिशत ही उपयोग में लाया गया है। 

प्रौद्योगिकी के प्रति जागरूकता बढऩे और सरकार के प्रयासों से सूक्ष्म सिंचाई को प्रोत्साहन मिलना निश्चित है। सूक्ष्म सिंचाई के लाभ और अवसर को नीति निर्माता समझ रहे हैं। मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र सरकार मराठवाड़ा क्षेत्र में अगले तीन वर्षों में गन्ने जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों के लिए ड्रिप सिंचाई शुरू करने का प्रयास कर रही है। जिसमे कई कंपनियों और कारोबारियों की भूमिका तय की जा रही है।

इस मामले में महिंद्रा एग्री साल्यूशंस का  ईपीसी व्यवसाय भारत में सूक्ष्म सिंचाई में अग्रणी रहा है। हमारे उत्पाद, जिसमे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली शामिल है, किसानों की सहायता कर रहे हैं। हम लागत प्रभावी तकनीक के साथ किसानों को सशक्त बनाकर कृषि समृद्धि को बढ़ाने के दृष्टिकोण को साकार करने में मदद कर रहे हैं। जबकि सूक्ष्म सिंचाई की लागत के बारे में जागरूकता की कमी और गलतफहमी से इसे अपनाने में आ रही रुकावटों को देखते हुए सरकार और उद्योग जगत द्वारा किए जा रहे संयुक्त प्रयासों से इसे दूर करने में मदद मिल रही है। इसे निरंतर जारी रखने की जरूरत है। समय भी हमारे पक्ष में है इसलिए हमें सूखे खेतों को सिंचित कर इन्हें समृद्ध खाद्य कटोरे में बदलने की जरूरत है, क्योंकि इसी पर हमारा भविष्य टिका हुआ है।
 

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