क्या संघर्ष के लिए तैयार हैं हम

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'खेती और किसान' पर भारी संकट है, आगे आने वाला समय किसानों के लिए चुनौतियों भरा है। किसानों को अब हर स्तर पर जद्दोजहद, संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। किसान अपना उत्पादन अब आसानी से सरकार को नहीं बेच पाएंगे। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कुल उत्पादन का केवल 25 प्रतिशत ही खरीद पाएगी, शेष किसानों को जहां बेचना है, बेंचे। यह जानकारी सरकार कई बार नीति आयोग व अन्य बैठकों में दे चुकी है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य नोटिफिकेशन के तहत एक घोषणा मात्र है, जब तक इसका एक्ट (विधेयक) जो कि संसद में लंबित है, पारित नहीं होगा, तब तक किसान लुटते ही रहेंगे। ... कोई भी वस्तु के दाम न्यूनतम से न्यूनतम कैसे हो सकते हैं? समझ के परे है।

किसानों को उसके उत्पादन की खरीद की गारंटी मिले, निर्धारित न्यूनतम मूल्य से कम दाम पर खुले बाजार में बिक्री पर सजा का प्रावधान हो... जब तक यह नहीं होगा समर्थन मूल्य का लाभ किसानों को नहीं मिल पायेगा। इससे संबंधित एक्ट भी संसद में प्रस्तुत हो चुका है, पर जब सरकार की प्राथमिकता में किसान हैं ही नहीं, तो उस पर विचार संभव कैसे हो, कौन करेगा?

फसलों की लागत, समर्थन मूल्य से ज्यादा है, यह सरकार भी मान चुकी है। इस संबंध में उन्हें आंकड़ों सहित विस्तृत रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जा चुकी है। जब किसान की लागत ही नहीं निकलेगी, तो खेती लाभ का धंधा कैसे होगा?

वर्ष 2006 में डॉ. स्वामीनाथन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया था कि कुल लागत, जिसमें जमीन का किराया, ब्याज आदि सभी शामिल हो (सी-2 फार्मूले के आधार पर) में 50 प्रतिशत लाभ जोड़ कर जब तक किसान को नहीं दिया जाएगा, किसान घाटे में ही रहेंगे। उनकी उन्नति संभव ही नहीं है। उन्होंने 15 अगस्त 2007 से इसे लागू करने की सिफारिश की थी, 11 वर्ष बीत गए अभी तक लागू नहीं हो सकी, सरकारें किसी की भी रही हों, उनकी प्राथमिकता में किसान कभी रहा ही नहीं। इसका भी एक्ट संसद में विचाराधीन ही है। विडम्बना है किसानों की ओर किसी को गम्भीरता से सोचने की फुरसत नहीं है। 2007 से यदि रिपोर्ट लागू हो जाती तो हम पर कर्ज का बोझ नहीं बढ़ता। कर्मचारियों के वेतन आयोग तो पूर्व वर्षों से एरियर्स दिलवाते हैं, पर किसानों के लिए कमीशन जिसे सरकार ने ही बनाया था को तबज्जो नहीं दी गई।

11 वर्षों में सरकार ने किसानों के साथ ज्यादती की और 10 लाख करोड़ से ज्यादा बचा लिए। हमसे बचाये गए पैसे से ही, हमारे किसान कर्ज से मुक्ति चाहते हैं, जो ज्यादा नहीं है, केवल 4 लाख करोड़ से कम है। हम खैरात नहीं मांग रहे, यह हमारा हक है। उद्योगों का तो 12 लाख करोड़ एन.पी.ए. हो सकता है, पर किसान का नहीं, ऐसा क्यों? उस पर ही कहर क्यों?

जब किसान को सरकार उचित मूल्य नहीं दे पा रही, तो उन्हें सब्सिडी, प्रोत्साहन, राहत, सेवाओं में प्राथमिकता, पेंशन क्यों नहीं, हमारी सरकार वैश्विक दवाब में क्यों? क्या विश्व के अन्य देश नहीं देते। किसानों के लिए हमारे देश में ही बंदिशें क्यों? हमारे यहां फसल बीमा देखें तो वह भी आधा अधूरा, अव्यवहारिक, कोई सुधार करने को तैयार नहीं।

यह सब कम दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ सरकारों को मिलकर करना होगा, आखिर तेलंगाना सरकार अपने किसानों को आठ हजार प्रति एकड़ प्रति वर्ष दे ही रही है, उन्होंने अपनी बीमा पॉलिसी बनाई। कैसे? सबको सोचना होगा। इसके बिना किसान का पोषण, उनका जीवित रहना (सर्वाइवल) संभव नहीं होगा।

आश्चर्य तो यह है कि किसान 60 प्रतिशत हैं, और हमारे लिए बजट मात्र कुल देश के बजट का 3 से 4 प्रतिशत ही, प्रांत का बजट 6 से 7 प्रतिशत तक ही बस। इसी से पता चलता है कि किसान सरकारों की कितनी प्राथमिकता में हैं। विडम्बना तो यह है कि इस मूल जड़ पर किसी का ध्यान नहीं है। किसी को कोई चिंता नहीं। कोई मांग नहीं, कोई दबाव नहीं। जब बजट ही ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर होगा, तो किसान कल्याण की कल्पना ही बेमानी है।

देश की जी.डी.पी. में खेती की हिस्सेदारी एक तिहाई है, तो फिर हम कमतर क्यों? खेती का बजट कम से कम 25 प्रतिशत तो हो। सरकार को यह भी समझना होगा कि सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर 'कृषि' के सेक्टर में ही है। मशीनीकरण व ऑटोमेशन के चलते उद्योगों से रोजगार नहीं बढ़ सकेंगे। ऐसा नहीं कि सरकार को यह मालूम नहीं है, पर स्वार्थों के चलते उद्योगों से मोह टूटना असंभव ही लगता है।

खेती किसानी के लिए कम बजट के चलते ही प्रदेश सरकारों को दिया जाने वाले खरीद का लक्ष्य भी निहित है (खरीद के लिए, भंडारण की व्यवस्था हेतु राशि ही नहीं है)... और परिणाम... ज्यादा खरीद पर, उत्पादन का उठाव करने व भुगतान से इनकार। कम खरीद पर पुरस्कार।... वास्तव में सरकार समर्थन मूल्य तो तय करती है, पर उस पर खरीद करना ही नहीं चाहती। खरीद करे भी कैसे, बजट, राशि तो हो। जब यह स्थिति है तो हमें अपना उत्पादन बेचने जद्दोजहद तो करनी ही पड़ेगी।

गांधी जी कहते थे गांव समृद्ध हुए बिना, देश समृद्ध नहीं होगा। आज सरकार शहरों की ओर समृद्ध करने में जुटी है। स्मार्ट सिटी के लिए बजट, तो स्मार्ट विलेज के लिए गांव की संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर), विकास के लिए बजट क्यों नहीं। बिजली, पानी, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा में गांवों के साथ भेदभाव क्यों? क्या गांव के लोगों को दोयम दर्जे का समझा जाता है। गांव-किसान का बजट शहर के बराबर क्यों नहीं? भेदभाव क्यों, ऐसे में गांवों की समृद्धता की कल्पना बेमानी है। गांधी जी शताब्दी वर्ष में सरकार उनके संदेश को तबज्जो दे और इस दिशा में सोचे, यही हमारी मांग है, आग्रह है।

सरकार की नीतियां, आयात-निर्यात का निर्णय विश्व व्यापार संगठन के दबाव पर निर्भर है, सरकार उससे उबर नहीं पा रही है। इसके चलते किसानों का कभी भला होने वाला नहीं है। आगामी सालों में सरकार की नीति खेती के रकबे व किसानों की संख्या को आधा करने की है, उद्योगों को सहयोग करने के चलते सरकार हमें शहरों दिहाड़ी मजदूर बनाने कार्यरत है। केन्द्र सरकार कहती है संघीय ढांचे में- कृषि, सिंचाई, बिजली प्रान्तों का विषय है, प्रान्त बोलता है केन्द्र का नियंत्रण है, सहयोग का अभाव है, हम दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। नीचे स्तर पर भ्रष्टाचार चरम सीमा में व्याप्त है, डिलीवरी सिस्टम चरमराया हुआ है, सरकारी समितियां जो सीधे किसानों को सेवाएं, सुविधाएं देने जिम्मेदार हैं, जमीन पर डिलीवर करने में बिल्कुल भी सक्षम नहीं है, इनको सुदृढ़ करने कोई ठोस प्रयास कभी नहीं हुये।

किसानों के संगठनों ने भी ज्यादातर अपने-अपने स्वार्थों और अपने अहम की ही पूर्ति की है। संगठनों का उपयोग तथाकथित लोगों ने अपने लिए ही ज्यादा किया है और उनके मोहरे, सहायक बने हम।

अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग, अपना-अपना स्वार्थ। अहम। अहंकार बस। इन्होंने किसानों को तबकों में बांटने का काम ज्यादा किया है, किसानों को एक सूत्र बांधने व उनकी संगठित लड़ाई लडऩे का काम कम। और सरकारों का भी इसमें बड़ा योगदान रहा, उनकी 'फूट डालो और राज करो' की नीति सफल हुई।
 

  • के.के. अग्रवाल, कृषक इंजीनियर

   अध्यक्ष भारत कृषक समाज, महाकौशल (म.प्र.)

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