किसान की आर्थिक दशा सुधरे तो कैसे

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स्वतंत्र भारत के 72 साल के सफर मेें कृषि ने आधारभूत सफलता प्राप्त की है। आजादी के बाद जहां खाद्यान्न के लिये देश को दूसरे देशों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं आज देश-दुनिया की दूसरी बड़ी जनसंख्या की आवश्यकता पूर्ति कर खाद्यान्न फसलों का निर्यात कर रहा है। भारत दूसरे सबसे बड़े जनसंख्या वाले देश के साथ-साथ वह विश्व का कृषि उत्पादन करने वाला दूसरा बड़ा देश बन गया है। पिछले कुछ वर्षों से देश प्रतिवर्ष लगभग 2200 अरब रुपयों से अधिक खाद्य पदार्थों का उत्पादन कर रहा है। यह स्थिति तब है जब किसानों को जितना महत्व मिलना चाहिए उतना नहीं मिल रहा है। यदि इस क्षेत्र को महत्व मिल जाये तो, जो उसको मिलना चाहिए, यह देश की अर्थव्यवस्था को अधिकतम ऊंचाईयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। गेहूं तथा धान के उत्पादन में हम विश्व में दूसरे स्थान पर पहुंच गये हैं इसके अतिरिक्त भी हम नारियल, खनिजों के साथ-साथ मछली तथा अंडों के उत्पादन में भी विश्व में दूसरे या तीसरे स्थान पर आ गये हैं। देश की कृषि अर्थव्यवस्था सुधारने में देश के लगभग 2600 लाख किसानों तथा कृषि पर आधारित श्रमिकों का बहुत बड़ा योगदान है। यदि हम इन देश की अर्थव्यवस्था सुधारने वाले नागरिकों  को देखें तो अभी भी इन्हें समाज में वह सम्मान नहीं मिल रहा जिनके वह पात्र हैं। भले ही उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था सुधारने में एक बहुत बड़ा योगदान दिया है पर उनकी अपनी आर्थिक स्थिति में बहुत बड़ा आधारभूत परिवर्तन नहीं आया है। राजनैतिक दृष्टि से सामाजिक रूप से भले ही उनको सहारा जाता है परंतु समाज अभी भी उन्हें हीन भावना से ही देखता है वह भूल जाता है कि वह हमारा अन्नदाता है। व्यापारिक जगत में ऐसी व्यवस्था बन गयी है कि फसल की कटाई के समय आने वाली फसलों के दाम गिरा दिये जाते हैं ताकि किसान को उसकी उपज का उचित दाम न मिल सके और वह आश्रित ही बना रहे। कम दामों में खरीदने के बाद व्यापारी अपनी भंडारण क्षमता के कारण खरीदे गये मूल्य पर कहीं अधिक लाभ प्राप्त कर लेता है। जबकि किसान को फसल उगाने में उसकी मजदूरी के बराबर लाभ ही मिल पाता है। भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रकाशित करती है। उसमें खेती में किसान द्वारा लगाये गये समय की कीमत एक मजदूर के रूप में आंकी जाती है जबकि समय की वह कीमत एक प्रबंधक के रूप में आंकी जानी चाहिए ताकि किसान की मेहनत का सही आकलन हो। उसकी आर्थिक दशा सुधरे व समाज में उसे सही स्थान मिले। फिर देश में ऐसा वातावरण बने कि किसान को आत्महत्या करने का विचार भी न आये।

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