एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम)

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एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कैसे:

सस्य क्रियाएं

ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई: गर्मी के मौसम में यदि खेत की गहरी जुताई कर दी जावे तो जमीन के अन्दर इल्लियों की शंखी के रूप में सुषुप्तावस्था में पडे़ कीट बाहर आ जाते हैं जिन्हैं काली मैना इत्यादि चिड़ियाएँ चुन-चुनकर खा जाती हैं। 

फसल चक्र अपनाना: फसल चक्र के सिद्धांतों के अनुरूप फसल चक्र अपनाकर कीटों का नियंत्रण किया जा सकता हैं। फसल चक्र अपनाने पर विशेष के कीट जब दूसरे वर्ष फसल नहीं मिलती हैं तो भोजन के अभाव में स्वतः ही उन कीटो का नियंत्रण हो जाता हैं।

अन्तरवर्तीय फसल पद्धति: अन्तरवर्तीय फसल लगाने से कीट के फैलने में दूसरी प्रजाति की फसल प्राकृतिक अवशेष का कार्य करती हैं। 

यांत्रिकी विधियां   

प्रकाश प्रपंच: कीड़ों के प्रकाश की ओर आकर्षित होने के गुण का फायदा उठाते हुए प्रकाशजाल बनाया गया हैं। इस विधि में दूधिया 160 वाट का मरक्यूरी व्हैंचर बल्व लगाना उपयुक्त होता हैं। वैज्ञानिको द्वारा बनाई गई डिजाइन का ट्रेप उपयोग कर सकते हैं या बल्व को फसल पर लटकाकर उसके नीचे चैड़े पात्र में पानी भरकर उसमें गोमूत्र या केरोसीन डाल देतेे हैं। जिससे कई हानि.कारक कीट पतंगे आकर पानी में गिरकर नष्ट हो जाते हैं। 

 

फेरोमेन ट्रेप: मादा तितलियां जैसे- हैलियोथिस, चितकबरी इल्ली, तंबाखूू की इल्ली, डायमंड बेक माॅथ, धान का तना छेदक, फलमक्खी इत्यादि एक प्रकार का अतिसूक्ष्म मात्रा में द्रव स्त्रावित करती हैं जिसकी खुशबू से नर तितलियां उन्हें मेटिंग हेतु ढूंढ लेती हैं इसी बात का फायदा उठाते हुए वैज्ञानिकों ने अलग-अलग प्रकार के कीड़ों के लिये अलग-अलग प्रकार के फेरोमेन कृत्रिम रूप से प्रयोगशाला में बना लिये हैं जिसे केप्सूल में रखकर खेत में फेरोमेन ट्रेप के रूप में लगाते हैं जिससे नर पतंगे मादा समझकर इसमें कैद हो जाते हैं जिससे मादा बिना मेटिंग के रह जाती हैं फलस्वरूप मादा जो अंडे देती हैं उसमें से इल्लियां नहीं निकलती।

 

सावधानियां:

  • तंबाखू, प्याज, लहसुन जैसे तेज गंध वाले हाथों से रबर सेप्टा  को ना छुएं ।
  • हर दूसरे-तीसरे दिन मरे हुए नर कीटों को निकालकर थेैली साफ करें।
  • अलग-अलग कीड़ों के लिये अलग-अलग ट्रेप लगावे ।
  • पाउच जिसमें सेप्टा रखते हैं, को खुला न रखें व तेज धूप से बचावें।

पीले चिपचिपे ट्रेप:- पीले रंग के कार्डबोर्ड पर ग्रीस या जला हुआ तेल लगाकर फसल के बीच में जगह-जगह लकड़ी की सहायता से लगा दें जिससे हरा मच्छर, एवं सफेद मक्खी जैसे रस चूसने वाले कीट इस पर चिपक जाते हैं। इसके अलावा यदि दो लकडी पर पीला कपड़ा जिस पर ग्रीस या तेल लगाकर फसल के बीच में चलाते हैं जिससे रस चूसने वाले कीट इस पर चिपक जाते हैं जिससे प्रभावी नियंत्रण होता हैं।

जैविक नियंत्रण विधियां 

क्रायसोपा: यह परभक्षी कीट हैं। इसका भोजन सफेद मक्खी, माहू एवं हैलियोथिस तथा अन्य कीटों के अंडे हैं। इस कीट के ग्रब छोटी-छोटी इल्लियों को भी चुन-चुनकर खाते हैं। इसके हरे रंग के पारदर्शी पंखोवाली मादा वयस्क एक-एक करके या गुच्छे में अंडे देती हैं। अंडों से निकलने के पश्चात इसके ग्रब माहू, हैलियोथिस के अंडों को खाकर अपना जीवन यापन करते हैं। इसकी ग्रब अवस्था भी बहुत सक्रीय होती हैं और यह हानिकारक कीटों का प्रभावी नियंत्रण करती हैं। इसका जीवन काल 16-24 दिन में पूरा होता हैं। इसलिए यह फसलों को कीटों के आक्रमण से बचाने में सहायक होते हैं। इसको फसलों पर पनपने के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने की जरूरत होती हैं। ये परभक्षी कीट कीटनाशक औषधियों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। 

लेडी बर्ड बीटल: इस परभक्षी कीट की दो प्रजातियाँ मिनोचिलस, सेक्समाकुलाटा एवं काक्सीनेल्ला सेप्टमपंक्टाटा मुख्य हैं। इसका वयस्क अंडाकार, चमकीले लाल नारंगी रंग का होता हैं। मिनोचिलास के वयस्क के ऊपरी भाग पर 6 काले धब्बे एवं काक्सीनेल्ला के ऊपर 7 काले धब्बे पाए जाते हैं। इसका वयस्क लगभग 3-8 मि.मी. लम्बा होता हैं। यह कीट माहो (एफिड), व्हाईट फ्लाई तथा इल्लियों के अंडों को खाता हैं। इस कीट की ग्रब 10 से 30 माहू प्रतिदिन तथा वयस्क 15 से 50 माहू प्रतिदिन खा लेता हैं। फसल मे माहू होने पर यह कीट दिखाई देता हैं। 

ट्राइकोग्रामा: ये अंडा परजीवी गहरे रंग के छोटे कीट होते हैंजो तना छेदकों और पत्ती लपेटक कीटों के अंडों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। इनकी मादा पोषक अंडे में 30-40 अंडे देती हैं और इस परजीवी के अंडों से निकले अवयस्क पोषक अंडों का भ्रूण खाकर पोषित होते हैं। अंत में, ये पोषित अंडों से वयस्क कीटों के रूप मे बाहर निकलते हैं। इन परजीवियों को अंडों से वयस्क बनने में 10-14 दिन लगते हैं। 

सिरफिड फ्लाई: यह गहरे-पीले, हरे या गुलाबी रंग की होती हैं तथा इस परभक्षी कीट का स्वरूप ततैया से मिलता-जुलता होता हैं। इसके सिर वाला भाग नुकीला तथा पीछे वाला भाग चैड़ा होता हैंै। इस कीट की इल्ली 10-15 मि.मी. लम्बी तथा कम सक्रीय होती हैं। इस परभक्षी कीट का भोजन माहू हैं।  

ततैया: इस कीट की कई जातियाँ पाई जाती हैं और सभी सामान्य ततैया से मिलती-जुलती स्वरूप की होती हैं। यह मुख्य रूप से हानि.कारक कीटों के अवयस्कों के आन्तरिक परजीवी हैं। ये अपना जीवनचक्र परपोषी के ऊपर पूरा करते हैं। इसमें मुख्यतः ब्रेकान एवं चेलसिड तथा इक्नोमिनिड जातियाँ हैं। ये कीट मुख्य रूप से माहो, सफेद मक्खी, मिलीबग, कपास की डेंडू छेदक इल्लियों के परजीवी हैं ।

परभक्षी कीट:

डेमसेल बग: इसका रंग सामान्यतः पीला-भूरा होता हैं। इन परभक्षी कीट की कई  प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इस कीट के आगे के पैरों के भीतरी भाग में कांटे पाए जाते हैं, जिससे ये हानिकारक कीटों को पकड़कर आसानी से खाते हैं ये माहो, इल्लियों एवं अन्य कीटों को पकड़कर खाते हैं जिससे फसल सुरक्षा आसान होती हैं। 

सूक्ष्मजीवों द्वारा कीटों का नियंत्रण: सूक्ष्मजीव जैसे जीवाणु एवं विषाणु द्वारा भी कीटों को प्राकृतिक रूप से नियंत्रण होता हैं। विशेष रूप से डेंडू छेदक इल्लियों के लिए बेसीलस थूरेन्जेंसिस एवं न्यूक्लियर पोली हाइड्रोसिस वायरस का उपयोग बहुतायत से किया जाता हैं। 

बेसिलस थुरनजेनसिस: यह एक जीवाणु हैं जो इल्लियों में रोग उत्पन्न कर उसे मार देता हैं। इसी जीवाणु को जेनेटिक इंजीनीयरिंग तकनीक सेे बीज में बी. टी. जीवाणु मार्कर जीन डाला गया हैं। बी.टी. कल्चर भी बाजारों में उपलब्ध हैं। एक किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के मान से छिड़काव किया जा सकता हैं। इससे डेंडू छेदक इल्लियों का नियंत्रण होता हैं। बी. टी. घोल का छिड़काव शाम के समय किया जाना चाहिए। ताकि प्रभावी परिणाम प्राप्त हो सके। बी. टी. इल्लियों की भक्षण क्रिया को एकदम रोक देता हैं। इससे पौधों के विभिन्न भाग जैसे पत्ती, फूल, पुडी एवं डेंडू आदि का नुकसान रूक जाता हैं। अन्त में इसके प्रभाव से इल्लियां 48-72 घंटो के अन्दर मर जाती हैं।  

न्यूक्लियर पालीहायड्रोसिस वायरस: फसल में लगने वाले खतरनाक कीटों जैसे चने की इल्ली (हेलियोथिस), तम्बाकू की इल्ली रोंयेदार इल्ली, फौजी और कामलिया कीट, गोभी की इल्ली में प्राकृतिक रूप से लगने वाले कीटाणु (वायरस) रोग को वैज्ञानिकों ने खोज निकाला हैं। फिलहाल हेलियोथिस तथा तम्बाकू की इल्ली के वायरस क्रमशः एच. एन. पी. व्ही. तथा एस.एन. पी. व्ही. द्वारा प्रमुख फसलों जैसे कपास, चना, मूंगफली, सोयाबीन, टमाटर , मक्का इत्यादि फसलों पर लगने वाली हरी इल्ली को इसमें नियंत्रित किया जाता हैं तथा एस. एन. पी. व्ही. द्वारा सोयाबीन, कपास, सब्जियां आदि  पर लगने वाली तम्बाकू की इल्ली को नियंत्रित करता हैं।  

ट्रायकोडर्मा: ट्रायकोडर्मा एक प्रकार का लाभकारी फफूंद हैं। ये फसलों की जड़ों में अपनी काॅलोनी बनाते हैं। ये काॅलोनी विकसित कर रोग फैलाने वाले कीटाणुओं का नाश करते हैं। ट्रायकोडर्मा, विरिडीन नामक एक तत्व छोडता हैं जिसमें कुछ एन्जाइम और सेल्युलोज होते हैं जो रोग उत्पन्न करने वाले फफुन्दो का आवरण गलाकर उन्हें नष्ट कर देता हैं। 

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