कृषि उद्यमिता एक विचारणीय विषय

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कृषि सेवा प्रदायक ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कृषकों की आवश्यकताओं, खाद्य सुरक्षा की उपलब्धता, गरीबी उन्मूलन एवं जोखिम, अनिश्चितता संबंधी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यह कुछ क्रांतिक क्षेत्रों जैसे प्राकृतिक संसाधनों, उन्नत खेती की तकनीकियों, उत्पाद विकास, बाजारीकरण संबंधी दक्षता, पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के बारे में ज्ञान को साझा करने की भूमिका है। यहां ग्रामीण विकास की प्रक्रिया में कृषि सेवा प्रदाता की पांच महत्वपूर्ण एवं आवश्यक अवसरों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें से चार इस प्रकार हैं -

1. सबसे उपयुक्त दृष्टिकोण पर ध्यान केन्द्रित 
2. भागीदारी दृष्टिकोण का उपयोग करना
3. क्षमता विकसित करना
4. लंबी अवधि की संस्थागत समर्थन सुनिश्चित करना

अवसर एवं समस्याएं

वर्तमान के अवसर एवं समस्याएं, ग्रामीण एवं कृषि विस्तार के प्रभाव को बढ़ाने की ओर अग्रसर है। यह विस्तार सेवाएं कृषि में कृषकों को सुझाव देती हैं कि किस बीज की बुवाई की जाए, दूरदर्शन द्वारा मौसम भविष्यवाणी से जुड़ी जानकारी प्रदान करना, सुपर बाजार में सब्जियों के भाव पता करना एवं कौन इसका खरीदार है यह तय करना, एक कृषक संगठन अनुसंधान के लिए इसके सदस्यों को नई तकनीकियों की आवश्यकता होती है। कृषि विस्तार की दक्षता को और अधिक बढ़ाने के लिए सूचना एवं कृषि खाद्य क्षेत्र में सुझावों कों और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है जिससे यह जानकारी हो कि कैसे विस्तार प्रणाली लाभ एवं छोटे सीमांत कृषकों की सामाजिक आर्थिक स्थिति ऊंची उठाने में मदद कर सकते हैं।

  • कृषि सेवा प्रदायकों की ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में कृषि से परे निम्नलिखित भूमिकाएं होती हंै।  
  • उन्नत तकनीकियों, नए अनुसंधानों, बाजारों एवं वित्तीय सेवाओं, मौसम तथा जलवायु संबंधी आदि जानकारियों का स्थानांतरण करना।
  • व्यक्तिगत कृषक, कृषक समूहों, कृषक संगठनों, सहकारी संस्थाओं एवं बाजार श्रंृखला सें जुड़ी हुई अन्य कृषि व्यवथाओं में कार्यरत व्यक्तियों को प्रशिक्षण तथा उचित सलाह प्रदान करना।
  • प्रक्षेत्र पर नवीनतम तकनीकियों एवं क्रियाओं का प्रशिक्षण तथा अंगीकरण।
  • छोटे सीमांत कृषकों एवं अन्य स्थानीय उद्यमियों में व्यवसाय दक्षता (कौशल) का विकास करना।
  • छोटी जोत वाले कृषकों, ग्रामीण उद्यमियों एवं कृषि समुदाय के अन्य सदस्यों के आपस में जोड़कर के क्षेत्र में संस्थागत स्तर पर प्रशिक्षण तथा शिक्षा प्रदान की जाए।
  • कृषक एवं उनके संगठनों एवं पब्लिक सेक्टर के लोगों के बीच आपसी जुड़ाव की सुविधा प्रदान करना।
  • संस्थागत विकास की प्रक्रिया एवं सामाजिक, संस्थागत एवं संगठनात्मक नवीनीकरण को सहारा प्रदान करना।
  • अनौपचारिक एवं औपचारिक कृषक संगठनों एवं ग्रामीण युवा संगठनों का विकास एवं उनकी मांगों को पूरा करने हेतु सहायता करना।
  • शासकीय नीतियों विकल्पों पर सलाह जिसमें की भूमि प्रबंध, खाद्य सुरक्षा एवं पशु कल्याण आदि शामिल हो, चाहे जा रहे हैं। इनको सहारा प्रदान करना।
  • कृषकों एवं स्थानीय उद्यमियों के लिए ग्रामीण वित्तीय संस्थानों से वित्तीय सहायता प्रदान करना।
  • पोषण संबंधी शिक्षा एवं गृह विज्ञान।
  • प्राकृतिक संसाधनों से जो झगड़ों को रोकना।
  • न्यायिक एवं उचित सलाह प्रदान करना।

कृषकों को भूमि बंधीकरण एवं नियमित विषयों से संबंधित आवश्यक सलाह प्रदान करना। कुछ अन्य विषय जैसे गृह विज्ञान एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को प्राय: शासकीय कृषि विस्तार समितियों एवं अन्य नायकों जैसे स्वास्थ्य एवं वातावरण मंत्रालय या अशासकीय संगठनों के साथ पोषण एवं वातावरण संरक्षण संबंधी महत्वपूर्ण विषयों को लेकर आपसी भागीदारी कराई जा सकती है।

कृषि विस्तार में संस्थागत क्षमता को बढ़ाने से भविष्य में ज्ञान को साझा करने के लिए एवं सतत् विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होगी। इस बात को पता करने में मदद होगी कि किसान के पास जानकारी, दक्षता, बाजार तकनीकी एवं अन्य सेवाएंं, विस्तार एवं सलाहकारी सेवाओं के द्वारा गुणवत्ता मेें सुधार, सघनता, आयतन एवं खाद्य पदार्थों की उपलब्धता के द्वारा भुखमरी एवं पोषण संबंधी बीमारियों को दूर करने में मदद मिलेगी। विस्तार की सहायता से ग्रामीण कृषक परिवारों में पोषण संबंधी शिक्षा, खाना बनाने हेतु दक्षता विकास एवं स्वास्थ्य संबंधी जानकारी द्वारा भुखमरी एवं पोषण संबंधी बीमारियों एवं कमियों को दूर अथवा कम करने में ग्रामीण कृषक समुदायों को मदद प्राप्त होगी।

ज्ञान साझा करना सतत विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्रिया है अधिक एवं अच्छी ग्रामीण कृषि विस्तार एवं सलाहकारी सेवाएं ज्ञान आधारित अधोसंरचना के जरिये उन्नत एवं नवीनतम कृषि तकनीकों को अपनाने में मदद करती है। कृषि में ज्ञान संबंधी प्रणाली के द्वारा पांच क्षेत्रों में विस्तार एवं सलाहकारी सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

1. सबसे उपयुक्त दृष्टिकोण (कृषि सेवा प्रदायक के लिए) वर्तमान के बदलते एवं बढ़ते हुए पर्यावरण के अनुसार आवश्यक अनुसंधान के लिए कृषि सेवा प्रदायक की मांग उठी जिसमें कृषक जोखिम एवं अनिश्चितता उठाने में एवं सहन करने में व्यक्तिगत एवं संस्थागत क्षमता विकास में एवं बाजार एवं उत्पाद संबंधी सेवाओं की जानकारी विविधता के बारे में, जहां शासकीय स्तर पर, क्षमता का स्तार, खेती की प्रणाली, पर्यावरण परिवर्तन, बाजार संबंधी अवसर, और अन्य कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब नीतियों के निर्माण रणनीतियों, कार्यक्रमों एवं संस्थानों के विकास के संबंधी क्रियाकलापों के अंतर्गत इन पर विचार करना चाहिए। यहां प्रमुख रूप से पिछली जानकारियों को ध्यान में रखते हुए सबक याद रखने की आवश्यकता है जब हम नए कठोर मॉडल पेश करना चाहते हैं। बाजार एवं जलवायु में तीव्र एवं अप्रत्याशित परिवर्तन एवं इन परिवर्तनों को एक ही विधि को उपयोग कर दूर करने के विविध तरीके प्राप्त होते हैं। कुछ कृषि सेवा प्रदायकों ने सबसे उपयुक्त दृष्टिकोण को अतीत की समस्याओं से निजात पाने के रास्ते के रूप में बढ़ावा दिया है।

कृषि सेवा प्रदायक

विभिन्न कृषि सेवा प्रदायक संपूर्ण अथवा आंशिक रूप से विभिन्न प्रकार के ग्राहकों तक पहुंचाने में प्रभावी होते हैं। दो आधारभूत श्रेणियां कृषि सेवा प्रदायाकों की जैसे शासकीय एवं निजी गैर राज्य है बाद में कृषक संगठनों, अशासकीय संगठनों, निजी कंपनियों एवं व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है।

शासकीय

अनेक देशों में वे राष्ट्रीय स्तर पर शासकीय सेवा प्रदान करते हैं वे निजी कलाकार की तुलना में अधिक से अधिक उपयुक्त सलाह प्रदान करते हुए विभिन्न मुद्दों जैसे कि प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, परिवार के रहन सहन स्तर में सुधार आदि। शासकीय सेवा प्रदायक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, उद्देश्य संबंधी जानकारी प्रदान करना, कृषकों को जोखिम सहन करने जुड़े सुझाव आदि विषयों पर कार्य करते हुए पिछड़े हुए क्षेत्रों में भी सेवा प्रदान करते हैं।

चुनौती

  • कृषि सेवा प्रदायक को ग्रामीण जनसंख्या के अंतर्गत मानविक एवं सामाजिक पूंजी में निवेश करना अत्यंत आवश्यक होता है।
  • वर्तमान में यहां खाद्य सुरक्षा एवं ग्रामीण विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कृषि विस्तार सेवाओं को गति प्रदान करने की आवश्यकता है जिसमें कि अत्यंत आवश्यक प्रयास निम्न क्षेत्रों में आवश्यक हैं।
  • पुरूषों-महिलाओं की पहचान एवं नई तकनीकों के बारे में उनके ज्ञान में वृद्धि।
  • यह पक्का करना कि मूल्य श्रंृखला में कृषक तथा अन्य नायक बदलते हुए बाजार में साथ अच्छी तरह व्यवहार कर सकते हैं।
  • नई जलवायु परिवर्तन चुनौतियों को समझने, कम करने तथा उनका अंगीकरण करने के लिए कृषकों को योग्य बनाना।
  • ग्रामीण समुदायों को उनके प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंध करने सहारा देना।
  • ग्रामीण कृषकों को खाद्य एवं आय में वृद्धि हेतु उनके पास उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग करने हेतु प्रेरित करना।
  • एक दशक पूर्व यह आशा थी कि कमजोर सार्वजनिक संस्थायों द्वारा पैदा किये गए अंतर को विभिन्न प्रकार की निजी सलाहकारी सेवा प्रदायकों के द्वारा पूरा किया जा सकता है जिस प्रकार एक निजी सेवा प्रदायक बाजार से जुडी हुई हर नई परिवर्तन एवं तकनीकियों के बारे में जानकारी रखते हुए नए ग्राहकों को फायदा प्रदान कर सकता है सार्वजनिक सलाहकारी सेवा प्रदायकों की तुलना में।
  • विभिन्न देशों के कृषक संगठन यह पता कर सकते हैं कि यहां कौन सी उचित सलाह कृषकों को दी जाये एवं संगठन के सदस्यों को आगे बढऩे के लिए नई राहों की जानकारी, प्रदान की जा सकती है।
  • जब सार्वजनिक विस्तार संस्थाओं का पतन होना शुरू हुआ तो वहां यह आशा थी कि स्थानीय एवं अंतरष्ट्रीय स्तर के अशासकीय संगठन इस अंतर को पूरा करेगें। इस अशासकीय संगठनों से संबंधित क्रियाकलापों को प्रदान किया गया। 
  • मानव संसाधनों का विस्तार सुधार की सबसे बड़ी आधारभूत कठिनाईयां हैं विस्तार कृषकों को नवीनतम तकनीकी पैकेज प्रदान करने का एक माध्यम है इससे ज्यादा कुछ नहीं यह सामान्यत: देखा जाता है कि सलाहकारों की नई क्षमता यह होती है कि परिचर्चा को कैसे सुधारकर प्रस्तुत किया जाए एवं विभिन्न स्टॉक होल्डरों को प्राकृतिक संसाधन प्रबंध एवं बाजार या पूर्ति श्रंृखला में कैसे बाइड किया जा सके। 
  • यह ज्ञान की बढ़ती हुई संरचना है जो कि यह बताती हैं कि कैसे मांग को पूरा करने लायक सुधारा जा सकता है पर ये दोनों विस्तार की अवधारणायें आपस में एक-दूसरे की सहयोगी नहीं हैं।
  • यहां शुरूआत में कृषि विस्तार की कोई निश्चित निर्धारित विधि नहीं थी परियोजनाओं एवं विस्तार के बीच का संबंध केवल इस अनुमान पर आधारित था कि तकनीकी विकास को प्राप्त करने के लिए कौन सी विधि सही होगी। 
  • एक मुख्य यह थी कि एक निश्चित भू माप में बसने वाले कृषकों की आवश्यकताओं एवं समस्याओं को पूरा करने हेतु कौन सी उचित सलाह दी जाए। जिससे उनका विकास हो सके एवं जो उनके विकास के लिए उपयुक्त हो सके।
  • दीपक पाल, बिजनेस एसोसिएट

बीपीडी यूनिट जनेकृविवि, जबलपुर 

  •  लवीना शर्मा, बिजनेस एसोसिएट

बीपीडी यूनिट जनेकृविवि, जबलपुर 

  • डॉ. एस.के. राव, कुलपति 

रा.वि.सि. कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर
deepakpal2010@gmail.com

 

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