उर्वरकों का उपयोग बढ़ा, पर संतुलित नहीं हो पाया

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देश में खाद्यान्न व अन्य फसलों के उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने में उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश की आजादी के बाद वर्ष 1950-51 में उर्वरकों का प्रयोग नगण्य ही था। इस वर्ष देश के किसानों ने मात्र 55 हजार टन नत्रजन, 8.8 हजार टन स्फुर तथा 6 हजार टन पोटाश का उपयोग किया था। वर्ष 1966-67 तक इन उर्वरकों का उपयोग नत्रजन, स्फुर व पोटाश का उपयोग क्रमश: 737.8, 248.6 व 114.2 हजार टन तक ही पहुंच पाया। साठ के दशक के उत्तराद्र्ध में गेहूं तथा धान की अधिक उपज देने वाली बौनी जातियां आने के बाद इनके उपयोग में इजाफा हुआ। वर्ष 1967-68 में इनका उपयोग बढ़कर क्रमश: 1034.6, 334.8 तथा 169.6 हजार टन तक पहुंच गया। वर्ष 1966-67 की तुलना में वर्ष 1967-68 में नत्रजन के उपयोग में 296.8 हजार टन, स्फुर के उपयोग में 86.2 हजार टन तथा पोटाश के उपयोग में 55.4 हजार टन की वृद्धि देखी गई। इसके पश्चात वर्ष प्रतिवर्ष उर्वरकों का किसानों द्वारा उपयोग बढ़ता चला गया, परिणामस्वरूप वर्ष 1996-97 में नत्रजन की खपत 10,301.8 हजार टन तक पहुंच गई। इसी तरह स्फुर तथा पोटाश की खपत भी क्रमश: 2976.8 तथा 1029.6 हजार टन तक के स्तर तक पहुंच गई। वर्ष 2008-09 में नत्रजन की खपत ने 15090.5 हजार टन का आंकड़ा पार कर लिया और स्फुर तथा पोटाश की खपत भी क्रमश: 6506.2 तथा 3312.6 हजार टन तक पहुंच गई। यह खपत वर्ष 1950-51 की तुलना में नत्रजन में 274.3, स्फुर में 739.3 व पोटाश में 552.1 गुना थी। वर्ष 2010-11 में नत्रजन, स्फुर तथा पोटाश की खपत क्रमश: 16558.2, 8049.7 तथा 3514.3 हजार टन पहुंचने के बाद इन उर्वरकों की खपत में लगभग स्थिरता आ गई। वर्ष 2017-18 में इन उर्वरकों की खपत क्रमश: 16959.3, 6854.4 तथा 2779.7 हजार टन रही। इन उर्वरकों की खपत में स्थिरता एक चिंता का विषय है।

वर्ष 1950-51 में नत्रजन, स्फुर तथा पोटाश के उपयोग का अनुपात 9.1:1.4:1.0 था, जो उर्वरकों के उपयोग की शुरुआत के कारण था। वर्ष 1967-68 में यह अनुपात 6.1:1.9:1 तक ही संतुलित हो पाया। वर्ष 1996-97 में यह अनुपात फिर से और अधिक असंतुलित होकर 10.0:2.9:1.0 हो गया। वर्ष 2017-18 में नत्रजन, स्फुर तथा पोटाश के उपयोग का अनुपात 6.1:2.4:1.0 रहा जो वर्ष 1967-68 से अधिक संतुलित है। नत्रजन का अभी भी अधिक उपयोग होना या स्फुर तथा पोटाश का नत्रजन की तुलना में कम उपयोग होना एक चिंता का विषय है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना में अधिक से अधिक किसानों को सम्मिलित करना सरकार का उद्देश्य है और आंकड़ों के अनुसार हम इसमें सफल भी हुए हैं। परन्तु मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर यदि किसान उर्वरकों का उपयोग नहीं करता है तो हमारा मूल उद्देश्य प्राप्त नहीं होगा। किसान अपनी फसलों में नत्रजन का अनावश्यक उपयोग करता रहेगा जिसका असर फसल के उत्पादन व किसान की आय पर पड़ेगा। अब समय आ गया है कि हम किसान को उसके खेतों में तत्वों की मात्रा के आधार पर उर्वरकों के उपयोग पर जोर दें।

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