पानी और पर्यावरण सुधार की अनूठी पहल

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सफलता की कहानी 

इंदौर। प्रकृति की सुरम्य वादियों में सांवेर तहसील के अंतिम छोर पर इंदौर से करीब 20 किमी दूर आशामति और क्षिप्रा नदी के संगम पर स्थित मेल कलमा गांव में एक किसान परिवार द्वारा बनाया गया तालाब और बबूल के पेड़ों से आच्छादित सघन वन लोगों को बरबस ही आकर्षित करने लगा है। इस तालाब में वर्षा जल से संचित जल राशि इतनी है, कि रबी में गेहूं -चना की फसल की सिंचाई के बाद भी पानी खत्म नहीं होता। दो पीढिय़ों का यह संघर्ष अन्य लोगों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गया है।

कृषक जगत के प्रतिनिधि ने गत दिनों मेल कलमा पहुंचकर 54 वर्षीय एमएससी (एजी) उत्तीर्ण उन्नत किसान श्री राकेश पाराशर से जब रूबरू चर्चा की तो इस तालाब की अकूत जल राशि और हरीतिमा के पीछे की मेहनत और संघर्ष से पर्दा उठा। श्री पाराशर ने बताया कि पाराशर परिवार के इस पुश्तैनी गांव में तीन भाइयों के परिजनों की करीब 300 बीघा जमीन है। जिनके हिस्से-बंटवारे के बावजूद परिवार में एकता है। बरसों पहले विधवा दादी के जीवनकाल में खेत में 80  फीट गहरे खुदे कुंए से ही सिंचाई हो जाती थी। लेकिन बाद में कुंआ सूखने से कई नलकूप  खुदवाए लेकिन रबी में सिंचाई की समस्या खत्म नहीं हुई, तो 2004 में तालाब बनाने का निर्णय लिया। स्वयं ने ट्रैक्टर चलाकर बारिश पूर्व तालाब बनाया जो पहली ही बारिश में फूट गया। लेकिन इस वर्षा जल ने उत्साह बढ़ाया और अगले साल 2005 में फिर दुबारा प्रयास किया और तकनीकी रूप से तालाब की मजबूत पाल बनाई। जिसमें वर्षा का जल संग्रहित होने लगा। हर साल तालाब को गहरा किया जाता रहा। सवा हेक्टर क्षेत्रफल वाले इस तालाब की गहराई करीब 30 फीट है। जो सम्भवत: वर्षा जल संग्रह की मात्रा के अनुसार इंदौर जिले का पहला सबसे बड़ा निजी तालाब है। इससे 40 बीघा जमीन में रबी में गेहूं -चने की फसल को पांच पानी देने के बाद भी तालाब में पानी बच जाता है। तालाब में जल संग्रहण का यह अनूठा उदाहरण है।

पर्यावरण सुधार के क्षेत्र में पाराशर परिवार का एक और योगदान प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। इनके भाई प्रो. विनोद पाराशर ने करीब 15  साल पहले अपनी दो हेक्टर बंजर भूमि में तार फेंसिंग कर बबूल के पौधे लगाए थे। अब इन पेड़ों की संख्या करीब 4 हजार हो गई है। बबूल के इस सघन वन में हरियाली का यह दृश्य आँखों को भाने के अलावा ठंडी छाँव भी देता है। यही नहीं श्री राकेश पाराशर ने अपनी कृषि भूमि में दस वर्ष पहले, प्रति वर्ष 5  पौधे लगाने का संकल्प लिया था, जो अब भी जारी है। अच्छी परवरिश से पौधों से पेड़ बने आम, नीम, पीपल , सागवान, शीशम आदि के पेड़ ठंडी छाँव के साथ सुकून का एहसास कराते हैं। यहां सरकारी योजना से पांच एचपी का सोलर पैनल भी लगाया गया है, जिससे सिंचाई कर बिजली की बचत भी हो रही है। उद्यानिकी के तहत प्रयोग का तौर पर हल्दी के कुछ पौधे लगाए गए हैं और अब लहसुन लगाने की तैयारी है। अन्य खेत में देशी गुलाब के फूल खिल रहे हैं और 1500 गुलाब के पौधे लगाने के लिए तैयार है। बस, बारिश का इंतजार है। बारिश के बिना सोयाबीन की फसल भी मुरझाने लगी है। एक-दो  दिन के इंतजार के बाद सिंचाई शुरू करेंगे। आध्यात्मिक पाराशर परिवार ने वर्षों पूर्व देवी अहिल्या माता द्वारा आशामति नदी के किनारे स्थापित शिव मंदिर के क्षतिग्रस्त हो जाने पर एक नया शिव मंदिर का निर्माण मार्च 2000 में कराकर उसी शिव लिंग को स्थापित कराया। इस अद्भुत शिव लिंग की विशेषता यह है कि इसमें प्राकृतिक रूप से नाग, त्रिपुण्ड और जनेऊ की आकृति उभरी हुई है। सावन माह और शिवरात्रि पर यहां दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ जाती है। निकट भविष्य में यह स्थान जल तीर्थ के रूप में जाना जाएगा, क्योंकि श्री पाराशर की प्रेरणा से कई अन्य किसानों ने भी अपने खेत में छोटे तालाब बनाए हैं।

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