न्यूनतम समर्थन मूल्य कितना तर्क संगत ?

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भारत सरकार ने विगत दिनों खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा की, जिसमें 50 से 311 रुपए प्रति क्विंटल वृद्धि की है। यह घोषणा भारत सरकार के कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की इस अनुशंसा के आधार पर की गई है। पिछले वर्ष 2018-19 की तुलना में सबसे कम 50 रुपए प्रति क्विंटल तक की वृद्धि बाजरा तथा सबसे अधिक 311 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि सोयाबीन के मूल्यों में की गई है। सोयाबीन के अतिरिक्त अन्य तीन तिलहनी फसलों मूंगफली, सूर्यमुखी तथा तिल के न्यूनतम मूल्यों में यह वृद्धि क्रमश: 200, 262 तथा 236 रुपए प्रति क्विंटल की गई है। जबकि रामतिल में यह वृद्धि मात्र 63 रुपये प्रति क्विंटल की गई है। दलहनी फसलों में आत्मनिर्भरता की ओर बढऩे के बाद इसे केन्द्रीय सरकार का तिलहनी फसलों में भी देश के आत्मनिर्भर होने की ओर एक सकारात्मक कदम की तरह देखना चाहिए। तिलहनी फसलों के न्यूनतम मूल्यों में वृद्धि को प्राथमिकता देने से किसानों को तिलहनी फसलों  की ओर आकर्षित होने तथा इन फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अवश्य प्रोत्साहन मिलेगा तथा यह तिलहनी फसलों में भी देश के आत्मनिर्भर होने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।

रागी के न्यूनतम मूल्य में पिछले पांच वर्षों से लगातार वृद्धि की जा रही है। वर्ष 2015-16 में रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1650 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। पिछले चार वर्षों में रागी के न्यूतम समर्थन मूल्य में 90.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है जबकि धान में इसी अवधि में यह वृद्धि मात्र 28.7 प्रतिशत रही। रागी की उत्पादन लागत से इस अवधि में धान की उत्पादन लागत अधिक बढ़ी है। रागी की अपेक्षाकृत न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि समझ के परे है।

धान का वर्ष 2019-20 में न्यूनतम समर्थन मूल्य सामान्य धान के लिए 1815 तथा ग्रेड ए धान के लिए 1935 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। जो दोनों प्रकार की धान के लिए पिछले वर्ष की तुलना में मात्र 65 रुपए प्रति क्विंटल अधिक है। इसमें मात्र 3.7 व 3.6 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जिसका कोई अर्थ नहीं। खरीफ की तीन प्रमुख दलहनी फसलों अरहर, मूंग तथा उर्द में पिछले वर्ष की तुलना में क्रमश: 125, 75 तथा 100 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है जो पिछले वर्ष 2018-19 की तुलना में क्रमश: मात्र 2.2, 1.1 तथा 1.8 प्रतिशत ही अधिक है। दलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में इतनी कम वृद्धि किसान को क्या राहत पहुंचायेगी यह प्रश्न चिन्ह ही है।

पिछले कुछ वर्षों से किसान मक्का की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिसका एक मुख्य कारण इसके न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि भी होना था। वर्ष 2015-16 में मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य जो मात्र 1325 रुपए प्रति क्विंटल था। वर्ष 2018-19 में बढ़कर 1700 रुपए प्रति क्विंटल पहुंच गया। इन तीन वर्षों में इसमें 28.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस वर्ष इसमें मात्र 60 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है जो प्रतिशत में 3.5 प्रतिशत आती है, जो पिछले तीन वर्षों के औसत 9.4 प्रतिशत की लगभग एक तिहाई है। मध्य प्रदेश के किसान जो मक्के की फसल को सोयाबीन के विकल्प के रूप में लेने की सोच रहे थे। उन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य जो वर्ष 2018-19 में 5877 रुपए प्रति क्विंटल था। वर्ष 2019-20 के लिए यह 5940 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया गया है। इसमें इस वर्ष मात्र 105 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है जो 2.0 प्रतिशत होती है जबकि इसके पहले के तीन वर्षों में औसतन यह वृद्धि 11.8 प्रतिशत थी। इस वर्ष 2019-20 के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि तिलहनी फसलों को छोड़कर किसानों को निराश ही करेगी। किसानों की आय दोगुनी करने के केन्द्रीय सरकार के संकल्प को पूरा करने के लिए किसानों की उत्पादन लागत को कम करना ही होगा। इसके लिए कृषि रसायनों के मूल्यों को इनकी लागत के अनुरूप लाने के लिए सरकार को कदम उठाने पड़ेंगे। 

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