धान खेती में हरी खाद का महत्व

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फसल की कटाई के बाद ज्यादा से ज्यादा भूमि में मिश्रित हरी खाद बोने (या बाहर से लाकर खेत में देने) से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने का बेहद कारगर तरीका है। इसे जैविक और रसायनिक खेती करने वाले दोनों तरह के किसान अपना सकते हैं। सनई, ढैंचा, उर्द और मूंग आदि से मिट्टी में मुख्य तौर पर नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है, जबकि मिश्रित हरी खाद से हर फसल की जड़ों में इर्द-गिर्द अलग-अलग सूक्ष्म जीव पनपते हैं, जो मिट्टी में आवश्यक तत्वों की आपूर्ति करते हैं। इसलिए मिश्रित हरी खाद से पौधे को संतुलित पोषण मिलता है, जिससे फसल प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होती है और कीड़ों, रोगों एवं प्रतिकूल मौसम का मुकाबला कर पाती है।

अगली फसल की बुआई से 10-15 दिन पहले या हरी खाद का तना सख्त होने से पहले या 50 प्रतिशत फूल बनने से पहले, जो भी पहले हो, जुताई कर दें। हरी खाद की बुआई के 30 से 45 दिन के बीच जुताई की जा सकती है। इसके साथ ही यह सावधानी रखनी जरूरी है कि हरी खाद की जुताई और अगली फसल की बुआई (रोपाई) के बीच लगभग 10-15 दिन का अंतर अवश्य हो नहीं तो अगली फसल का फुटाव (जर्मिनेशन और इमरजेन्स) प्रभावित होता है। 

धान की खेती मुख्य रूप से भारतवर्ष में लगभग सभी जगह उगायी जाती है। देश में अधिकतर लोग इसको प्रमुख रूप से खाने के लिये उपयोग में लेते है। यह कार्बोहाइड्रेट और खाद्य- ऊर्जा का अच्छा स्रोत है साथ ही वसा और कोलेस्ट्रॉल की कम मात्रा होने की वजह से बच्चे- बूढ़े सभी मनुष्य भोजन के रूप में खा सकते हैं। मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बढ़ाने में हरी खाद का प्रयोग अति प्राचीनकाल से किया जा रहा है। सघन कृषि पद्धति के विकास तथा नकदी फसलों के अंतर्गत क्षेत्रफल बढऩे के कारण हरी खाद के प्रयोग में निश्चय ही कमी आई, लेकिन बढ़ते ऊर्जा संकट, उर्वरकों एवं कीटनाशियों के मूल्यों में वृद्धि तथा गोबर की खाद जैसे अन्य जैविक स्त्रोतों (कम्पोस्ट, वर्मी- कम्पोस्ट) की सीमित आपूर्ति से आज हरी खाद का महत्व और भी बढ़ गया है।

हरी खाद के लिये मुख्यत: दलहनी फसलों (ढैंचा, सनई, बरसीम, लोबिया, उर्द, मूंग) को ही लेते हैं जिसमें निम्नलिखित विशेषता होनी चाहिए-

  • फसल शीघ्र बढऩे वाली हो।
  • ऐसी फसल होनी चाहिये जिसमे तना, शाखाएं और पत्तियां कोमल हो, जो आसानी से मिट्टी मे अपघटित हो कर जीवांश की मात्रा को बढायें।
  • मूसला (गहरी) जड़ों वाली फसलों को लें जिससे अधिक गहराई से पोषक तत्वों को ले सके साथ ही लवणीय और क्षारीय भूमि में भी अन्त: जल निकास का कार्य करे।
  • फसल सूखा अवरोधी होने के साथ बाढ़ की स्थिति (जलमग्नता) को भी सहन कर सके।
  • दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु जो ग्रंथियों के रूप में रहते हंै वातावरण में मुक्त नाइट्रोजन को भूमि में स्थिरीकरण करके पौधों को उपलब्ध कराती है।
  • हरी खाद के साथ-साथ फसलों को अन्य कामों में भी लाया जा सकें।
  • रोग और कीट कम लगते हों तथा बीज उत्पादन की क्षमता भी अधिक हो।
कुछ दलहनी फसलों से मिलने वाले हरी खाद और नाइट्रोजन की मात्रा
सामान्य नाम वानस्पतिक नाम  उगाने की ऋतु हरी खाद की उपज (टन प्रति हेक्टेयर) नाइट्रोजन (प्रतिशत)
सनई क्रोटोलेरिया जंसिया वर्षा ऋतु 21.2 0.43
ढैंचा सस्बेनिया एकुलियाटा वर्षा ऋतु  20 0.43
पिलिपेसारा फेजियोलस ट्राइलोबस वर्षा ऋतु  18.3 1.1
मूंग फेजियोलस ऑरियस वर्षा ऋतु  8 0.53
लोबिया विग्ना साइनेन्सिस वर्षा ऋतु  15 0.49
ग्वार सायनोप्सिस टेट्रागोनोलोबा वर्षा ऋतु  20 0.34
सेंजी मेलिलोटस एल्बा रबी (ड्राई) ऋतु  28.6 0.57
खेसारी लेथाइरस सेटाइवस रबी (ड्राई) ऋतु  12.3 0.54
बरसीम ट्राइफोलियम एलक्जेन्ड्रिनम रबी (ड्राई) ऋतु  15.5 0.43
स्रोत: सन्यासी राजू एन (1952). रोल ऑफ आर्गेनिक मेन्योर्स एंड इन ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर्स इन स्वायल फर्टिलिटी, मद्रास एग्रीकल्चर जर्नल, (39)157-159.

हरी खाद से मृदा और फसलों में होने वाले प्रभाव

  • दलहनी फसलों की जड़ें मजबूत होने के साथ गहराई तक जाती हंै जिससे यह कम उपजाऊ भूमि में अच्छी प्रकार से उगती है और मिट्टी को एक साथ बांधे रखती है जिससे मृदा- क्षरण कम होता है।
  • हरी खाद से मृदा में जैविक पदार्थों की मात्रा भी बढ़ जाती है।
  • राइजोबियम जीवाणु की उपस्थिति में दलहनी फसलों के द्वारा 60-150 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक की प्राप्ति होती है।
  • हरी खाद से मिट्टी के भौतिक एवं रसायनिक गुणों में प्रभावी परिवर्तन होता है जिससे सूक्ष्म जीवों के संख्या, क्रियाशीलता एवं आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता मे वृद्धि होती है।
  • धान के पौधों की लम्बाई, पत्तियों में हरित-लवक और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।
  • गुणवत्ता-युक्त उपज की प्राप्ति होती है जिससे बाजार मूल्य अधिक मिलता है।
  • हरी खाद के प्रयोग से पहले वर्ष के साथ-साथ दूसरे और तीसरे वर्ष में भी फसलों को पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है।
  • प्रोटीन की प्रचुर मात्रा के कारण पोषकीय चारा उपलब्ध कराने में हरी खाद पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखती है तथा मृदा उर्वरता को स्थायित्वता प्रदान करती है।
  • हरी खाद टिकाऊ खेती के लिये एक अच्छा विकल्प है।
  • क्षारीय एवं लवणीय भूमि के सुधार के लिये हरी खाद का प्रयोग करते हैं।

 

  • विशाल कुमार 

    शोधरत, शस्य विज्ञान विभाग, काशी 
    हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी,  (उप्र)
    vishalw29194@gmail.com

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