सोनामुखी धोरों में सोना उपजाएं

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जलवायु एवं मिट्टी

सोनामुखी के लिए शुष्क जलवायु तथा काफी कम वर्षा की आवश्यकता होती है। ऐसे क्षेत्र जहां वर्षा 30 सेमी तक हो, इसकी खेती के लिए उपयुक्त होते हैं। यह पौधा न्यूनतम 4 डिग्री तथा अधिकतम 50 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी सहन करने की क्षमता रखता है। इस प्रकार भारत के लगभग सभी राज्यों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। यद्यपि यह सभी प्रकार की भूमियों (ज्यादा लवणीय भूमियों को छोड़कर) में उगाया जा सकता है परन्तु इसकी खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी ज्यादा उपयुक्त रहती है। विशेष रूप से ऐसे क्षेत्र जहां कभी खेती नहीं हुई हो (बंजर क्षेत्र) अथवा जहां खेती में कभी रसायनिक खाद का उपयोग न किया गया हो, में इसकी उपज काफी गुणवत्तापूर्ण प्राप्त होती है।

खेत की तैयारी

सोनामुखी की बुवाई से पूर्व खेत की कोई विशेष तैयारी करने की आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी यदि एक दो बार हल चलाकर खेत की गहरी जुताई कर ली जाए तो उपयुक्त रहेगा। गहरी जुताई करने से वर्षा जल का पर्याप्त मात्रा में संग्रहण होगा तथा फसल के लिए आवश्यकतानुसार जल की उपलब्धता बनी रहेगी। 

बुवाई का समय, बीज दर व विधि 

सोनामुखी की बुवाई के लिए 15 जुलाई से 15 सितम्बर तक का समय उपयुक्त माना जाता है। मानसून की अंतिम वर्षा के तुरन्त बाद जब खेत में पर्याप्त नमी हो तब इसकी बुवाई करना उपयुक्त रहता है। यद्यपि इसकी बुवाई हल या ट्रैक्टर द्वारा सीडड्रिल से की जाना चाहिए परन्तु छिटकवां पद्धति से भी इसकी सफलतापूर्वक बुवाई की जा सकती है। बुवाई करते समय यह ध्यान रखें कि कतार से कतार की दूरी 30 से 45 सेमी से अधिक न हो। एक हेक्टेयर में बुवाई हेतु लगभग 10-12 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है। प्राय: इसके बीजों का अंकुरण 60 से 70 प्रतिशत तक हो पाता है। अत: इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि अंकुरण के उपरान्त पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी से ज्यादा न रहें। बीज 1 से 2 सेमी से ज्यादा गहरा नहीं हो अन्यथा उसके अंकुरण में कठिनाई हो सकती है। बीज प्राय: 10-15 दिनों में अंकुरित हो जाते हैं। 

उन्नत किस्में

एएलएफटी: यह किस्म गुजरात कृषि विश्वविधालय, आनंद द्वारा विकसित की गई हैं।

सोना : केन्द्रीय औषधीय व सुगंधित पौध अनुसंधान संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित की गई किस्म हैं।

खाद उर्वरक

बुवाई से पूर्व 8-10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी के समय भूमि में मिलाना उपयुक्त रहता है। यदि रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करना हो तो बुवाई के समय 40 किग्रा. नत्रजन, 20 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 20 कि. ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से दें। उर्वरक की मात्राएं पौधे की बढ़वार एव पक्तियों की कटाई की संख्या पर निर्भर करती हैं।

सोनामुखी/सनाय एक बहुवर्षीय कांटे रहित झाड़ीनुमा औषधीय पौधा है जिसकी ऊँचाई 40 से 120 से.मी. तक होती है। यह 'लेंगुमीनस कुल का पौधा है तथा एक बार लगा देने के उपरान्त पांच वर्ष तक उपज देता है। हिन्दी में यह सैन्ना अथवा सनाय, राजस्थानी में सोनामुखी तथा संस्कृत में मार्कण्डी आदि नामों से जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम है- केसिया आंगस्टीफोलिया वाल। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसे इंडियन सैन्ना अथवा टिन्नेबेली सैन्ना के नाम से जाना जाता है। सोनामुखी मूलत: अरब उत्पत्ति का पौधा है तथा देश में इसकी खेती तमिलनाडु राज्य में प्रारम्भ हुई थी, वर्तमान में केरल, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और उड़ीसा में भी इसकी खेती काफी मात्रा में हो रही है। सोनामुखी की पत्तियों व अन्य उत्पादों के निर्यात से देश को वर्ष 2014-15 में 1348 करोड़ रूपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। 

खरपतवार नियंत्रण

फसल की बढ़वार अवस्था में यदि खेत में खरपतवार ज्यादा उग जाए तो एक बार निराई कर दें। जब पौधे बड़े हो जाएं तो खेत में पशु छोड़े जा सकते हैं जो खरपतवार को तो खा जाते हैं परन्तु इसके पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। इस प्रकार एक बार फसल के विकसित होने के बाद खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती है।

सिंचाई प्रबंधन

जिन क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था हो, अथवा जिन क्षेत्रों में ज्यादा दिनों तक पानी भरा रहता हो, वहां इसकी खेती करना न तो उपयुक्त होगा तथा न ही लाभप्रद। क्योंकि इसकी जड़ें जमीन में काफी नीचे तक चली जाती हैं और एक बार उग जाने के उपरान्त जड़ें अपने आप पानी खोज लेती हैं। फलत: इसे सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती विशेषकर नई पत्तियां एवं फूल निकलते समय सिंचाई लाभप्रद रहती है। इस प्रकार सोनामुखी की एक बार बुवाई करने के बाद इसे विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं होती।

फसल कटाई एवं उपज

सोनामुखी की बुवाई के लगभग 100-120 दिनों में इसकी पत्तियां कटाई हेतु तैयार हो जाती हैं। इस स्थिति में पहुंच जाने के बाद में सनाय के पौधों की कटाई कर लेनी चाहिए। पौधे को जमीन से तीन इंच ऊपर से काटें तथा काटने हेतु तेज धार वाले हंसिए का उपयोग करें। काटते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पौधा जमीन से न उखड़े तथा जमीन से इतना ऊपर से कटे कि उसमें आसानी से दोबारा पत्ते आ जाएं। अधिक उत्पादन तथा उपज की गुणवता बनाये रखने के लिए पहली कटाई लगभग 100 से 120 दिनों के बाद तथा इसके बाद की कटाइयां 60 से 75 दिन के अंतराल पर करें। इस प्रकार प्रतिवर्ष इसकी चार कटाई ली जा सकती है। कटाई में देरी होने पर पत्ते ज्यादा पुराने हो जाते हैं और पौधे के नीचे के पत्ते झडऩे लगते हैं जिससे उपज का नुकसान होता है। साथ ही पत्ते पतले तथा पौधे की टहनियां मोटी होने लगती हैं जिससे एक तो उपज में कमी होती है, वहीं दूसरी ओर इससे उपज की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। वर्षभर में चार कटाइयों में सनाय की फसल से लगभग 400 किग्रा. सूखी पत्तियों का उत्पादन होता है। 

कटाई उपरान्त प्रबंधन व संग्रहण

सोनामुखी की फसल में व्यावसायिक उत्पाद होता है- इसके पत्ते। अत: कटाई के बाद पत्ते सूखने पर भी उनका रंग हरा रहे। इसीलिए फसल काटने के उपरान्त उनकी छोटी-छोटी ढेरियां लगा दें, जिनके थोड़ा सूख जाने पर इनकी बड़ी डेरियां लगा दें। पत्तों का रंग हरा रहे इसके लिए पत्तों को छाया में 4-5 दन तक सुखाया जाना उपयुक्त रहता है। सूख जाने पर एक तिरपाल बिछा कर पत्तियों को झाड़ लें जिससे पत्तियां अलग हो जाएं तथा डंठल अलग हो जाएं। टहनियों से झाड़े गए पत्तों को बोरों में भरते समय पत्तियों में 8 प्रतिशत तक ही नमी रहे, ज्यादा नमी होने पर पत्तियों के खराब होने की सम्भावना रहती हैं। सूखी पत्तियों को बिक्री हेतु भेजा जा सकता है। सोनामुखी के पत्ते हल्के होते हैं अत: यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन बोरों में पत्ते भरे जाएं वे हल्के बारदाने के बने हो। प्राय: इस कार्य हेतु 50 & 50 के बोरों को उपयोग में लाया जाना उपयुक्त रहता है।

सोनामुखी के फायदे

  • सोनामुखी निर्यातोन्मुखी होने के कारण रोजगार व विदेशी मुद्रा दिलाती है।
  • यह सभी प्रकार की भूमि में पैदा हो सकती है।
  • बेकार पड़ी जमीन/ बंजर भूमि का उचित उपयोग संभव है।
  • भूमि की ऊपरी परत (मृदा) को सुरक्षित रखती है।
  • भू-संरक्षण तथा जल संरक्षण दोनों के लिये उपयुक्त।
  • अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।
  • किसी प्रकार की खाद, रसायनिक उर्वरक या कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती है। अथवा नगण्य होने के कारण विदेशी मुद्रा की बचत तथा पर्यावरण संतुलन बनाये रखने में सहायक हैं।
  • पशुओं अथवा पक्षियों से नुकसान नहीं होता है जिससे प्रतिवर्ष बुवाई, बीज आदि खर्चे की बचत होती हैं।
  • रखरखाव पर कोई खर्च नहीं आता है।
  • ज्यादा देखभाल की आवश्यकता नहीं है।
  • बोने के चार माह में ही उपज बेचने के लिए तैयार हो जाती है।
  • एक बार बोने के बाद पांच वर्षों तक लगातार उपज मिलती रहती है।
  • पौधे में वर्षभर फूल आते रहते हैं अत: मधुमक्खी पालन हेतु लाभकारी है।
  • फसल की प्रोसेसिंग पर कोई विशेष व्यय नहीं होती है।
  • फसल से खेत हरा-भरा रहता है और पर्यावरण संरक्षण/सुरक्षा की दृष्टि से काफी उपयोगी है।

सावधानियां

सोनामुखी एक रेगिस्तानी पौधा है और यह अधिक वर्षा सहन नहीं कर सकता। इसीलिए इसकी बुवाई तथा कटाई के समय वर्षा का विशेष ध्यान रखना होगा। इसकी दुई मानसून की आखिरी वर्षा के बाद की जायें क्योंकि यदि इसकी बुवाई के तुरन्त बाद जर को बारीक हो जाती है तो बीजों के अंकुरण में परेशानी होगी तथा पौधे अंकुरित ही न हो। अत: बुवाई के उपयुक्त समय का सही आकलन करना होगा। यदि बीज अंकुरित नहीं हो तो पुन: बुवाई करनी होगी।

इसी प्रकार सोनामुखी के पत्तों की कटाई के समय भी वर्षा का ध्यान रखना होगा। जद फसल कटने की स्थिति में हो तो उस समय बारिश नहीं हो। वरना पत्ते झड़ जाएंगे अथवा सड़-गल जाएंगे। अत: वर्षा से पहले ही उचित समय पर कटाई कर लें और सही स्थान पर उपज का भण्डारण कर लें जिससे किसी भी प्रकार के नुकसान की संभावना न रहे।

  • डॉ. बाघसिंह राठौड़, आचार्य

    कृषि अनुसंधान केन्द्र, मण्डोर (राज.)
   rathorebs1957@rediffmail.com

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