सोयाबीन की फसल पर जल भराव का प्रभाव

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नुकसान को रोकने के तरीके

जल भराव का फसल और पैदावार पर प्रभाव

सोयाबीन फसल को अन्य फसलों की तुलना में विकास एवं अनाज उत्पादन के लिए अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। क्योंकि सोयाबीन के बीज में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है जिसको बनाने के लिए पौधे को नाइट्रोजन की अधिक आवश्यकता होती है। सोयाबीन का पौधा सहजीवी राइजोबिया के साथ मिलकर वातावरण से नाइट्रोजन लेकर उसका जड़ों के नोड्यूल्स में स्थिरीकरण कर सकता है। हालांकि नाइट्रोजन स्थिरी करण की प्रक्रिया में पौधे तो अधिक ऊर्जा के साथ-साथ सही मात्रा में ऑक्सीजन की भी आवश्यकता होती है। इसी कारण जल भराव की स्थिति में यह प्रक्रिया बहुत प्रभावित होती है। जल भराव तनाव के तहत नाइट्रोजन स्थिरीकरण में कमी आना ऊपज कम होने का मुख्य कारण माना जाता है। सामान्यतया मिट्टी में छोटे-छोटे छेद होते हंै जिनमें सामान्य स्थिति में 50 प्रतिशत पानी और 50 प्रतिशत वायु होती है। परन्तु जल भराव की स्थिति में वायु छिद्रों में भी पानी भर जाता है, इसी कारण मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जो कि पौधे की जड़ों की श्वसन क्रिया के लिए हानिकारक होता है। मिट्टी का तापमान भी कम हो जाता है ऐसी परिस्थिति में जड़ें श्वसन क्रिया नहीं कर पाती हंै और इसका विपरीत प्रभाव पौधों की वृद्धि और कार्य कि क्षमता पर पड़ता है। मिट्टी में ऑक्सीजन तापमान के साथ-साथ जल भराव से मिट्टी के पी.एच. मान में भी परिवर्तन आ जाता है जो कि मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता पर असर डालता है। जल भराव वाली मिट्टी में मुख्य पोषक तत्व जैसे कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम, जिंक आदि की कमी हो जाती है तो वहीं दूसरी ओर आयरन एवं मैंगनीज़ की अधिकता के कारण मिट्टी विषाक्त हो जाती है।

सोयाबीन मध्य भारत में उगाई जाने वाली खरीफ की महत्वपूर्ण फसल है। यह कुल तिलहन फसल उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत और कुल खाद्य तेल उत्पादन में 25 प्रतिशत योगदान देती है। सोयाबीन को वर्षा आधारित फसल के रूप में उगाया जाता है और इसी कारण इस फसल को कई जैविक और अजैविक (सूखा, भारी बारिश, गर्मी आदि) तनावों का सामना करना पड़ता है। पिछले कुछ दशकों से जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा में अनियमितता एवं कमी आ गयी है। कई बार बहुत समय तक बारिश नहीं होती या फिर अत्यधिक वर्षा कम समय में हो जाती है। इस कारण सोयाबीन की फसल को सूखे और जल भरण दोनों ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अत्यधिक वर्षा के कम समय में होने से पानी का रिसाव जमीन के अन्दर नहीं हो पाता जिस कारण या तो पानी खेत से ऊपरी सतह की उपजाऊ मिट्टी को लेकर निकल जाता है या फिर अगर पानी का निकास सही न हो तो खेत में जल भराव हो जाता है। दोनों ही परिस्थितियों में सोयाबीन की वृद्धि के साथ-साथ पैदावार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। ज्यादातर खेतों के निचले हिस्से में पानी जमा हो जाता है, इसका कारण है कि मध्यप्रदेश के ज्यादातर क्षेत्रों की मिट्टी काली है, और काली मिट्टी में क्ले की मात्रा अधिक होती है और इसकी संरचना भी सघन होती है। इसी कारण मिट्टी के अंदर पानी का रिसाव धीमे होता है जो कि जल भराव को बढ़ावा देता है।

जल भराव अगर विकास के महत्वपूर्ण चरणों जैसे की नोड्यूल्स बनने, फूल आने और फली भरने की अवस्था पर आता है तो फसल खराब हो जाती है। अगर जल भराव लंबे समय (यानी, कई हफ्तों के लिए) तक रहता है तो, सोयाबीन की कुछ जल भराव के प्रति सहनशील किस्मों में जल भराव तनाव से बचने के लिए ऊपर की और साहसिक (ड्डस्र1द्गह्लद्बह्लद्बशह्वह्य) जड़ें बनाती हंै और इंटेरनोड की लम्बाई बढ़ जाती जिसके कारण पौधा पतला और लम्बा नजर आएगा। स्टेम, जड़ों और नोड्यूल्स में ऊतकों का विकास होता है जिसमे की वायु का संग्रहण होता है जो कि जड़ों में ऑक्सीजन की कमी के तनाव को कम करता है और तना और जड़ प्रणाली के बीच गैस विनिमय में सुधार लाता है। इस कारण नोड्यूल की नाइट्रोजन निर्धारण क्षमता में सुधार होता है। परन्तु, अल्पकालिक जल भराव (यानी, एक सप्ताह से भी कम) की स्थिति में पौधे में साहसिक जड़ें एवं एयरेंन कायमा ऊतकों का विकास नहीं हो पाता। इसी कारण ऑक्सीजन का चलन लगभग बंद हो जाता है जिससे नोड्यूल की नाइट्रोजन निर्धारण क्षमता में कमी आ जाती है। अगर यह स्थिति विकास के महत्वपूर्ण चरण पर आ जाये तो वृद्धि को प्रभावित करती है। अतिरिक्त पानी के हटने के बाद सोयाबीन में नाइट्रोजन के अधिग्रहण करने की क्षमता में पुन: सुधार आना अच्छी वृद्धि एवं पैदावार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वैज्ञानिकों के द्वारा किये गए शोध में पता चला है कि चार दिन से एक सप्ताह तक की जल भराव की स्थिति सोयाबीन की उपज में कमी ला देती है। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर चौथी त्रिपत्रक अवस्था और फूल व फली बनने की अवस्था पर 4-10 दिन तक जल भराव की स्थिति रह जाए तो पैदावार में 20-40 प्रतिशत कमी आ सकती है। बहुत लंबे समय तक के जल भराव से जड़ें पूरी तरह गल जाती हंै और फसल को भी भारी नुकसान होता है।

सावधानियां एवं उपाय

बुआई के समय अगर आपके क्षेत्र या किसी खेत में जल भराव हमेशा रहता है तो सबसे पहले आपको बुवाई के समय ही थोड़ी सी ढलान देते हुए खेत को समतल करवाना चाहिए। ढलान पानी के निकास की तरफ होनी चाहिए और बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए। अधिक ढलान से पानी के साथ-साथ ऊपरी सतह की उपजाऊ मिट्टी भी चली जाती है। अगर खेत नहरी क्षेत्र में है तो ध्यान दें कि कहीं नहर से पानी का रिसाव तो खेत की तरफ नहीं हो रहा है ऐसे में सरकारी माध्यम से नहर का मरम्मत करवाने की कोशिश करें।

भारतीय सोयाबीन अनुसधान संसथान, इंदौर द्वारा विकसित ब्रॉड बेड और फरो पद्धति से बुवाई करना काफी लाभकारी है। इसमें दो फरो (नाली) के बीच में बेड पर 4 -5 सोयाबीन की पंक्तियां लगायी जाती है जो कि जड़ों में पानी के ठहराव को रोकता है और तनाव से बचाता है।

अगर खेत में जल भराव की वजह से फसल पीली पड़ती दिख रही है तो आप 1 प्रतिशत - 2 प्रतिशत डीएपी+ 1 प्रतिशत ्यष्टद्य (रूह्रक्क) का छिड़काव कर सकते हैं।

सोयाबीन की कुछ प्रजातियां जैसे की छ्वस् 97 52, पीके 472 कुछ हद तक जल भराव के प्रति सहन शीलता रखती है। परन्तु छ्वस् 20 29 और छ्वस् 95 60 जल भराव के प्रति अत्यंत संवेदनशील है और जल भराव की स्थिाति में कम पैदावार देती है।

  • शिवानी नागर
  • महाराज सिंह 
  • सुभाष चंद्रा
  • राकेश वर्मा 

    भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, 
    नई दिल्ली, भारतीय सोयाबीन         
    अनुसंधान संस्थान, इंदौर 
    shivaninagar19@gmail.com

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