सोयाबीन की उन्नत खेती

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सोयाबीन का व्यावसायिक उपयोग तिलहन के रूप में किया जाता हैै। सोयाबीन उत्पादक प्रमुख राज्यों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक व तमिलनाडू प्रमुख हैैं। इसमें 40-45 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20-22 प्रतिशत तक तेल की मात्रा उपलब्ध है। यहां पर दी गई सघन पद्धतियां अपनाकर सोयाबीन की खेती अधिक लाभप्रद हो सकती है।

जलवायु 

सोयाबीन में बीज के अच्छे अंकुरण के लिये अधिक नमी तथा लगातार कम नमी, दोनों ही दशाएं हानिकारक होती है, सोयाबीन में अंकुरण की अवस्था बहुत ही संवेदनशील होती है, क्योंकि किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में इसका अंकुरण बहुत कम पाया जाता है, परन्तु अंकुरण के बाद कुछ समय तक अधिक या कम नमी का पौधों पर कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है, अच्छी फसल के लिये कम से कम 60-65 सेमी वर्षा की आवश्यकता होती है। सोयाबीन के अच्छे विकास के लिये 26-30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान हो। सोयाबीन की अच्छी वृद्धि के लिये अधिक तापमान व नमी की जरूरत होती है। तापमान कम होने की स्थिति में पौधों पर फूलों की संख्या प्रभावित होती है तथा फल लगने में विलम्ब भी होता है।

खेत का चुनाव 

सोयाबीन के लिये अच्छे जल निकास वाली माध्यम से गहरी काली मिट्टी बेहतर होती है खेत का ढाल इस प्रकार से हो की जल निकास आसानी से हो जाये ओर खेत मे पानी न रुके। 

खेत की तैयारी 

रबी फसल की कटाई के बाद 2-3 वर्ष में एक बार गहरी जुताई करें। जुताई की गहराई 15 से.मी. से अधिक न हो, गहरी जुताई का मुख्य उदेश्य भूमि मे पड़े कीटों के अंडे, लार्वा तथा भूमिजनित बीमारियों के जीवाणु को खत्म करना होता है। सोयाबीन के अच्छे अंकुरण के लिये मिट्टी को भुरभुरा होना चाहिए। मानसून की प्रारम्भिक वर्षा के तुरन्त बाद 2-3 बार खेत की जुताई कर पाटा चलाकर खेत को समतल कर लें। 

उन्नत किस्में
किस्म पकने की अवधि (दिनों में) उपज (क्वि./हे.) प्रमुख विशेषता
जेएस 2034 87-88 22-25 शीघ्र पकने वाली किस्म (87 दिन), कई रोगों के प्रति प्रतिरोधी किस्म, कम और मध्यम बारिश एवं हल्की एवं मध्यम मृदा के लिए उपयुक्त, उत्कृष्ट अंकुरण क्षमता। 
जेएस 20-29 95 25-30 जैविक तनाव के लिए एकाधिक प्रतिरोधी। उत्कृष्ट अंकुरण क्षमता। अंतर फसल के लिए उपयुक्त।
जेएस 20-69 93-95 25-28 यह किस्म पीला मोजेक रोग, चारकोल राट, बेक्टेरियल पशचूल एवं कीट प्रतिरोधी। झडऩे एवं गिरने की समस्या नहीं देखी गई। 
जेएस 20-98 94 25-30 फूलों का रंग सफेद, मजबूत जड़ तंत्र के कारण अधिक वर्षा की स्थिति में जड़ सडऩ संबंधी बीमारियों के लिए प्रतिरोधी किस्म एवं स्टेम बोरर, स्टेम फ्लाय एवं अन्य कीटों के प्रति सहनशीलता ।
आरवीएस 2001-4 92-95 25 फूलों का रंग सफेद होता है।  मजबूत जड़ तंत्र होने से जड़ सडऩ, एवं पीला मोजक रोग, फलिया रोयेदार होने से गर्डल बीटल, सेमीलूपर आदि के लिए सहनशील है। पौधे जल्दी नहीं सूखेंगे। जल जमाव व सूखे में संतुलित।  
एनआरसी-87  92-95 25 गर्डल बीटल और तना-मक्खी के लिए प्रतिरोधी होता है।
एनआरसी-86  90-95 20-25 गर्डल बीडल और तना-मक्खी के लिए प्रतिरोधी, चारकोल रॉट एवं फली झुलसा के लिए मध्यम प्रतिरोधी।

बुवाई समय 

सोयाबीन की बुवाई 75-100 मिलीमीटर बरसात के बाद ही करनी चाहिये कभी-कभी असामान्य स्थिति में बुवाई 15 जुलाई तक भी की जा सकती है। जुलाई के द्वितीय सप्ताह के बाद बुवाई करने पर पैदावार में गिरावट आती है, सोयाबीन को देर से बोने से तापमान कम हो जाने के कर्ण पौधे कम फैलते हैं तथा उपज भी घट जाती है। बुवाई का समय इस प्रकार भी निश्चित करें की फलियों के पकते समय बरसात न हो। यदि फलियों के पकते समय बरसात हो गई तो दाने खराब हो सकते है तथा बीज की गुणवत्ता कम हो सकती है। 

बीज का चयन एवं मात्रा 

सोयाबीन के लिए बीज की दर, बीज के आकार, किस्म, अंकुरण प्रतिशत इत्यादि पर निर्भर होती है। बीज का आकार छोटा हो तो बीज दर कम तथा बीज का आकार बड़ा होने पर बढ़ा दें। सोयाबीन के बीज की मात्रा 28-30 किलोग्राम प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है। अच्छी उपज के लिए 4.4 लाख पोधे प्रति हेक्टेयर हो। 

बीजोपचार 

सोयाबीन को बोने से पहले थाइरम एवं कार्बेन्डाजिम (2:1) के 3 ग्राम मिश्रण, थायोमिथाक्सेम 78 डब्लू. एस. 3 ग्राम अथवा ट्राईकोडर्मा विरडी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।

जैव उर्वरक

बीज को राइजोबियम कल्चर 5 ग्राम एवं पी.एस.बी.(स्फुर घोलक) 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बोने से कुछ घंटे पूर्व टीकाकरण करें।

बुवाई की विधि

चौड़ी क्यारी व नाली पद्धति : फसल बुवाई की यह यथास्थिति नमी संरक्षण के लिये अपनाई जाती है इसमें बुवाई संरचना, फरो इंटीग्रेटेड रेज्ड बेड प्लान्टर से बनाई जाती है जिसमें सामान्यत: प्रत्येक दो कतारों के बाद लगभग 25 से 30 सेमी चौड़ी व 15 से 20 सेमी गहरी नाली या कूड़ बनते हैं। जिससे फसल की कतारें रेज्ड बेड पर आ जाती है। इन खाली कूड़ों का उपयोग वर्षा ऋतु में कम वर्षा की स्थिति में कूड का अंतिम छोर बंद करने पानी रोकने में हो सकता है। जिससे फसल में अधिक समय तक नमी बनी रहती है।

वहीं अत्याधिक वर्षा की स्थिति में कूड़ के अंतिम छोर खोल देने पर आवश्यकता से अधिक पानी खेत से बाहर चला जाता है। ऐसी स्थिति में खेत में जल भराव की स्थिति पैदा नहीं हो पाती है। इस विधि से बुवाई करते समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी रहती है। फसल की दो कतारों के बीच कूड़ बनने पर कतार से कतार की दूरी 45 सेमी हो जाती है।

कूड़ एवं नाली पद्धति: फसल बुवाई की यह विधि यथास्थिति नमी संरक्षण के लिए अपनाई जाती है जिसमें फसल की बुवाई मेड़ पर की जाती है तथा प्रत्येक दो कतारों के बीच में नाली बनती है। जिससे फसल की कतारें मेड़़ पर आ जाती है। इस विधि से बुवाई करने पर फसल की प्रत्येक कतार दूसरी कतार से 30 से.मी. दूर रहती है। इस विधि में अत्यधिक वर्षा की स्थिति में जल भराव की स्थिति उत्पन्न नहीं होती है। बुवाई के तुरंत बाद तेज बारिश हो जाने पर अंकुरण प्रभावित नहीं होता है तथा किसान दोबारा बुवाई की मार से बच जाता है। मेड़ की उठी हुई मिट्टी में जड़ों का फैलाव अच्छा होने से फसल गिरने की संभावना कम हो जाती है। 

खाद एवं उर्वरक 

सोयाबीन की खेती मे भूमि की तैयारी के समय 10 टन सड़ी गोबर की खाद डाले इससे जड़ों मे ग्रंथिया अच्छी बनती है। इसके साथ समान्यत: उन्नतशील किस्मों से अधिक पैदावार लेने के लिए 20 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। रसायनिक उर्वरकों का उपयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही किया जाना सर्वथा उचित होता है। 

सिंचाई प्रबंधन 

फूल एवं फलियों में दाना भरते समय अर्थात् सितम्बर माह में खेत में नमी न होने की स्थिति में आवशकतानुसार एक या दो सिंचाई करना लाभप्रद है। 

फसल की कटाई 

जैसे ही फसल पीली पडऩे लगे 70-80 प्रतिशत फलियां पक जाये उस समय फसल कटाई कार्य करें। कटाई में विलम्ब होने पर फलियां चटकने लगती हंै जिससे नुकसान होता है। खलिहान में कटी फसल अच्छे से सूख जाने के बाद गहाई करें, गहाई करते समय बीज में 14 प्रतिशत नमी रहेे। 

भंडारण 

गहाई करने के बाद बीज को धूप मे जब तक सुखाना चाहिए तब तक की बीज में नमी 10-12 प्रतिशत न हो सुखाने के पश्चात बीज का भण्डारण नमी रहित स्थान पर करें। 

उपज 

यदि उत्पादन की ऊपर वर्णित कार्यमाला अपनाई जाती है तो सोयाबीन की उपज 20-25 क्वि. प्रति हे. तक प्राप्त की जा सकती है।  

खरपतवार नियंत्रण
शाकनाशी  प्रति एकड़ मात्रा डालने की डालने का समय रिमार्क
  सक्रिय तत्व की (ग्राम) संरचना (मि.ली./ग्राम)      
एलाक्लोर 50 डब्लू.पी. 600-800 1200-1600 बोनी के 0-3 दिन तक सकरी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण मे प्रभावी है।
पेंडीमिथालिन (स्टाम्प) 300-400 1000-1200 बोनी के 0-3 दिन तक सकरी पत्ती वाले खरपतवारों एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण में प्रभावी है।
फ्लूक्लोरोलिन 45 ई.सी. 300-400 1000-1200 (बुवाई के पूर्व) चौड़ी व सकरी पत्ती वाले खरपतवारों का कारगर नियंत्रण होता है।
क्लोरीम्यूरान 25 ई.सी. 12-15   बुवाई के दो दिनों में) घासकुल चौड़ी पत्ती एवं मेथी कुल के खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण
क्यूजालोफाप इथाईल (टरगा सुपर 10 ई.सी.) 16-20 320-400 बुवाई के 15-20 दिन बाद घासकुल के खरपतवारों के नियंत्रण में प्रभावी है।
इमेजेथापायर (परस्यूट 10 एसएल अथवा लगाम) 40 400 बुवाई के 15-20 दिन बाद चौड़ी पत्ती वाले एवं कुछ घासकुल के खरपतवारों के नियंत्रण में प्रभावी है।
फेनाक्जाप्राप (व्हिप सुपर 10 ई.सी.) 40 300-400 बुवाई से 20-25 दिन बाद वार्षिक घासकुल के खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण।
  • डॉ. देवीदास पटेल 

    कृषि विज्ञान केंद्र,बनखेड़ी, होशंगाबाद 
    devidaspatelp24@gmail.com

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