सोसायटी में किसानों से फिर धोखाधड़ी

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इंदौर। इन दिनों किसानों के साथ धोखाधड़ी की घटनाएं ज्यादा ही सामने आ रही है। गत दिनों इंदौर के पास लसूडिय़ा परमार में 3 हजार बोरी नकली इफको खाद पकड़े जाने के मामले की खबर की स्याही सूख भी नहीं पाई थी, कि अब धार जिले के मनावर में सहकारी समिति से किसानों को वितरित की गई बोरियों में खाद कम निकलने का मामला सामने आया है। किसान की शिकायत के बाद उर्वरक निरीक्षक की रिपोर्ट पर संबंधित कम्पनी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

मिली जानकारी के अनुसार मनावर तहसील के ग्राम निगरनी के किसान श्री भारत सिंह पिता रुखड़ू ने गत दिनों आ. जा. सेवा सहकारी समिति, मनावर से 23 बोरी खाद ली थी। घर जाकर उसे बोरी में खाद कम होने की शंका होने पर बोरी को तौला तो वजन कम निकला। इसकी शिकायत कृषि विभाग में किए जाने पर उर्वरक निरीक्षक श्री हरेसिंह डावर निगरनी पहुंचे और किसान के यहां रखी खाद की 23 बोरियों को तौला तो वजन कम पाया गया। पंचों की उपस्थिति में पंचनामा बनाया गया।

खाद बोरियों में वजन कम 

श्री डावर ने कृषक जगत को बताया कि किसान के यहां आरएम फास्फेट एवं केमिकल्स लि. एमआईडीसी इंडस्ट्रियल एरिया सोनगिर धुले महाराष्ट्र और श्रीराम फर्टिलाइजर एवं केमिकल लि. नई दिल्ली की सिंगल सुपर फास्फेट खाद की बोरियों में निर्धारित मात्रा 50 किलो के बजाय 300 ग्राम से लेकर पौने दो किलो तक खाद कम निकली। इसके बाद सहकारी समिति के गोदाम में रखे खाद की जाँच की गई तो उनमें भी निर्धारित 50 किलो से कम वजन पाया गया। इस पर संबंधित कम्पनी के खिलाफ श्री डावर की शिकायत पर आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955, उर्वरक अधिनियम 1985 और भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद थाना मनावर में प्रकरण दर्ज किया गया। वहीं मनावर के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी एस.एल. अलावा ने कृषक जगत को बताया कि सहकारी समिति मनावर में रखी खाद की बोरियों में भी वजन कम पाया गया। उर्वरक निरीक्षक श्री हरेसिंह डावर की शिकायत पर मामला दर्ज हो गया है। समिति को गोदाम में रखी कम वजन वाली खाद को वितरित नहीं करने के निर्देश दिए हैं।

इस मामले में अन्य क्षेत्रीय किसान श्री योगेश, श्री रमेश चोयल, श्री गोपाल वास्केल का कहना था कि खाद -बीज और अन्य कृषि सामग्री को लेकर क्षेत्र में दुकानदारों द्वारा मनमानी की जा रही है। जिन कम्पनियों के खाद -बीज आदि की जिन किस्मों की बिक्री की अनुमति दी जाती है, उसे सार्वजनिक नहीं किया जाता है। ऐसे में किसानों को मजबूरन दुकानदार द्वारा दी गई सामग्री लेना पड़ती है। यदि फसल खराब निकले तो इसका खामियाजा किसानों को ही भुगतना पड़ता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि धोखाधड़ी के ऐसे मामले प्राय: ग्रामीण आदिवासी इलाकों में ज्यादा सामने आते हैं, क्योंकि यहां के लोग भोले और निरक्षर होते हैं, जो सब पर सहज विश्वास कर लेते हैं और बेईमानों के धोखे का शिकार हो जाते हैं।

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