किसानों का गला थामने की तैयारी

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इस बार लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस पार्टी ने दस दिनों में किसानों का ऋण माफ करने की घोषणा की और भाजपा ने 6 हजार रूपए साल किसान सम्मान निधि देने की घोषणा की है। ऐसी लोक-लुभावन घोषणाएं कर राजनेता सत्ता के शिखर पर तो विराजमान हो गए और चुनाव पश्चात किसान आस लगाए देख रहा है कि कब कर्जा माफ होगा और कब सम्मान निधि मिलना शुरू होगी। 

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर
केन्द्रीय कृषि मंत्री

 

कर्जा माफी

मध्यप्रदेश की ऋणग्रस्त सरकार आर्थिक संकट से घिरी हुई है। विरासत में उसे एक लाख अस्सी हजार करोड़ की कर्ज देनदारी चुकानी है। शासकीय कर्मचारियों तक को कर्ज ले लेकर तनखा बांटी जा रही है। ऐसे में दस दिन में कर्ज न चुकाने पर मुख्यमंत्री बदलने का दावा हवा-हवाई हो गया है। सरकार तरह-तरह की बहानेबाजी कर रही है। पहले सरकारी समिति से ऋण धारक किसान का कर्ज चुकाएंगे फिर एक लाख तक का कर्ज चुकाएंगे और फिर दो लाख की ऋण माफी पर विचार किया जाएगा। चुनाव के लिए वादा करना तो आसान है परंतु चुनाव बाद समय सीमा में वादा निभाने की किसे परवाह है। 

किसान सम्मान निधि

साल में तीन किश्तों में दो-दो हजार रूपए की खैरात बांट कर किसान सम्मान निधि का आयोजन अत्यंत हास्यास्पद है। खेती किसानी का लागत मूल्य कम करने और फसल का लागत के आधार पर बाजार भाव दिलाने की बजाए सरकार लगातार ऐसे कार्य कर रही है जिससे किसानों की मुसीबत बढऩा तय है।

जमीनी वास्तविकताओं से अनजान वातानुकूलित कक्षों में विराजित नीति आयोग, राजनेता और उनके वित्तीय सलाहकार नित नई ऐसी कार्यशैली विकसित कर रहे हैं जिनसे खेती छोडऩे और जमीन बेचकर मजदूरी करने में ही किसान चैन की नींद ले सकेगा। गरीबी से जूझते दीन-हीन किसान को इन सभी नीति निर्माताओं ने धन्ना सेठ समझ लिया है। भारत की स्वतंत्रता से लेकर वर्तमान सरकार के पहले तक किसानों की दीन-दशा विपन्नता को समझते हुए सरकारें उसे सस्ते कृषि आदान और खरीदने के लिए भरपूर रियायतें देती थी परंतु अब इस नीति से ठीक उलटा किसानों को अपनी जेब से पूँजी लगाकर महंगे कृषि आदान खरीदने होंगे और बाद में उसके बैंक खाते में डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर योजना के अंतर्गत अनुदान सहायता राशि मिलेगी। 

उलझती अनुदान नीति 

राजस्थान में वर्तमान में किसानों को कृषि सिंचाई पम्पों के भारी-भरकम पूरी लागत के बिल थमाए जा रहे हैं और अनुदान राशि किसान के खाते में आ रही है। यह योजना कुछ गैस सिलेंडर अनुदान सहायता जैसी है। पहले पूरे रूपए चुकाओ और बाद में बैंक खाते में अनुदान सहायता जमा हो। राजस्थान में लगभग बारह लाख कृषि पम्प उपभोक्ता किसान है और इनमें से अभी तक लगभग 5.59 लाख किसानों के खाते में ही अनुदान सहायता आ रही है। बाकी किसान मुसीबत के मारे बिना शासकीय सहायता मिले बिजली बिल भुगतान करने के लिए विवश है। 

इसी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना के अंतर्गत केन्द्र सरकार किसानों को पूरे दाम पर उर्वरक खरीदने के लिए योजना बना रही है व उर्वरक में बिल पर अनुदान सहायता बाद में उसके खाते में आएगी। वर्तमान में केन्द्र सरकार लगभग 74 हजार करोड़ रूपए प्रति वर्ष उर्वरकों पर अनुदान निर्माताओं को दे रही है। जो कि इस वर्ष बंद कर 78 हजार करोड़ रूपए होने का अनुमान है। सरकार चाहती है कि किसान पहले महंगे उर्वरक खरीदे, 74 हजार करोड़ रूपए का अपनी जेब से अग्रिम भुगतान करे फिर उसके खाते में अनुदान राशि समायोजित की जाएगी। पिछले पांच वर्षो से जारी मृदा परीक्षण कार्ड के आधार पर किसान उर्वरक खरीदें, स्फुर और पोटाश की पूरी मात्रा खरीदे तभी अनुपातित रूप से यूरिया लेने की उसे आजादी मिलेगी। उर्वरक पर अनुदान लेने के लिए उसे खेती में स्वामित्व का पूरा विवरण, उगाई जाने वाली फसल की जानकारी, आधार कार्ड, समग्र आई.डी., बैंक पास बुक और पहचान के लिए प्रत्येक खाता धारक को लेकर उर्वरक विक्रेता के पास जाना होगा नहीं तो अनुदान सहायता नहीं मिलेगी। सभी को मंगते जैसे लाईन में लगना होगा चाहे बूढ़ा बाप हो, मां हो, भाई बहन हो, बीबी हो, बच्चे हो और तो और शादी के बाद ससुराल गई बहन को भी पैतृक कृषि भूमि में हिस्सा मिलने के बाद अनुदान लेने के लिए मायके आना होगा और यदि भूमि स्वामी की मृत्यु या भूमि बिकने पर जब तक राजस्व अभिलेख में सुधार नहीं हो जाता तब तक कोई अनुदान नहीं मिल पाएगा। 

उर्वरक विक्रेता परेशानी में 

सरकार उद्योगपतियों के लिए उद्योग लगाने हेतु एकल खिड़की सुविधा दे रही है, पलक पावड़े बिछाकर उन्हें सिर पर बैठा रही है वहीं किसान को सहूलियत देने की बजाए तरह-तरह के नियम कायदों में जकड़ कर उसकी मुसीबतें बढ़ा रही है। देश भर में लगभग सवा दो लाख उर्वरक विक्रेता हैं। उन्हें लेपटॉप -कम्प्यूटर पहचान के लिए मशीनें लेना होंगी पूरा खाता बही किसानों की जानकारी रखना होगी तभी किसानों को अनुदान सहायता उसके बैंक खाते में मिल पाएंगी। इस कार्य प्रणाली से किसानों को सहूलियत होगी? कम से कम विशेषज्ञ तो यही समझते हैं जबकि उन्हें जमीनी सच्चाई का रंच मात्र भी ज्ञान नहीं है। 

बेईमान व्यापारियों द्वारा झूठे बड़ा बिल बनाकर बिना चुकाए टैक्स वापिस लेने के उदाहरण सामने हैं। क्या इसी प्रकार झूठे बिलों के आधार पर उर्वरक सब्सिडी नहीं निकाली जाएगी ? म.प्र. शासन ने उन्नत बीजों के संदर्भ में यही नीति अपना रखी है परंतु बीज निगम प्रदेश में किसानों की बीज मांग का तीन प्रतिशत बीज भी उपलब्ध नहीं करा पाता और केवल समृद्ध किसान ही बीज निगम से बीज नगद में क्रय कर पाते है, गरीब किसानों की तो महंगे बीज खरीदने की बिसात ही नहीं है। 

संक्षेप्त में ना नौ मन तेल होगा और न ही राधा नाचेगी। ना तो छोटे गरीब किसान की जेब में पर्याप्त धनराशि होगी और ना ही वे अपनी जरूरत का पूरा उर्वरक खरीद पाएंगे और उन्हें उसे खरीदने के लिए फिर ब्याज पर रूपया उधार लेना होगा और कर्ज के जाल में फंसना होगा। इस नीति से पर्याप्त उर्वरक में अभाव में कृषि उत्पादन भी विपरीत रूप से प्रभावित होंगा। अपर्याप्त उत्पादन से महंगाई बढ़ेगी और यह दृष्टचक्र चलता ही रहेगा। 

  • श्रीकांत काबरा, मो. : 9406523699
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