रोग रहित बीज उपयोग से उत्तम फसल उत्पादन

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बीजोपचार 

बीज की अंकुरण क्षमता को बिना कोई नुकसान पहुंचाये बीज में उपस्थित रोग जनकों को नष्ट करने की प्रक्रिया को बीजोपचार कहते हैं। इसके अंतर्गत भौतिक, यांत्रिक, रसायनिक एवं जैविक विधियों का उपयोग किया जाता है, ताकि बाह्य एवं आंतिरिक बीज जनित रोग जनकों को अलग या समाप्त किया जा सके। जिससे बीज को अंकुरण ठीक से हो तथा पौध एवं पौधा स्वस्थ पैदा हो। 

बीजोपचार के प्रकार

बीजोपचार की मुख्य तीन विधियाँ हैं, जो इस प्रकार हैं-

भौतिक विधि से बीज उपचार

ठंडा जल उपचार: इस विधि में ठंडे पानी में 4 प्रतिशत नमक का घोल बनाते हैं। (इसके लिये 5 ग्राम नमक प्रति लीटर पानी की दर से घोलते हैं) फिर उसमें जिस बीज को उपचारित करना होता है, उसको उसमें 30 मिनिट तक डुबाकर रखते हैं, इस विधि से कटे घुने एवं हल्के दाने तथा धूल कचड़ा के साथ रोग जनक भी पानी की सतह पर तैरने लगते हैं। जिनको छानकर बाहर निकाल दिया जाता है। बचे बीज को साफ  पानी से धोकर कच्चे फर्श पर फैला कर सुखा लिया जाता है। यह उपचार बोवाई के 2-3 दिन पूर्व करना चाहिये, इस विधि से गेहूं का सेहूं रोग, अर्गट तथा बरसीम के बीज को उपचारित करते हैं।  

गेहूं, जौ एवं जई के कण्डुआ के निवारण के लिये सादा पानी में बीज को रात को 4-5 घण्टे के लिये भिगा कर छोड़ देते हैं। और दूसरे दिन बाद कच्चे फर्श पर फैलाकर कड़ी धूप में सुखा लेते हैं। इससे इन फसलों में कण्डुआ रोग का नियंत्रण हो जाता है। लेकिन यह कार्य गर्मी के मौसम ही उपयुक्त रहता है। जब वातावरण में नमी कम रहती है। तथा 12-14 घण्टे कड़ी धूप बीज को मिल जाती है। 

गर्म जल से बीज उपचार: यह विधि निमेटोड, जीवाणु तथा विषाणुओं द्वारा संक्रमित बीजों को उपचारित करने के लिये प्रयोग में लाई जाती है। गन्ने के बीज के टुकड़ों को 50 से 52 डिग्री सेंटीग्रेट गर्म पानी में 2 घण्टे तक डुबोकर रखने से रैटल स्ंिटग कण्ड तथा ग्रासीसूट जैसी बीमारियाँ रूक जाती हैं। धान के बीज को 52 डिग्री सेंटीग्रेट गर्म पानी में 30 मिनट तक डुबोकर रखने से जीवाणुधारी रोग के जीवाणु समाप्त हो जाते हैं। मूंगफली  के बीज को 50 डिग्री सेंटीग्रेट गर्म पानी में 15 मिनिट तक डुबोकर रखने से कलरा एलीगैन्स नामक कवक खत्म हो जाता है। कपास के बीज को 65 डिग्री सेंग्रे गर्म पानी में 20 मिनिट तक डुबोकर रखने से जैन्थोमोनास माल्वेसियेरम की रोकथाम हो जाती है। गेहूं एवं जई के बीज को 50 से 52 डिग्री से.ग्रे. गर्म पानी में कुछ मिनिटों तक डालकर रखने से कण्डुआ रोग से छुटकारा पाया जा सकता है। 

गर्म हवा द्वारा बीज उपचार: गर्म हवा द्वारा बीज उपचार की विधि यद्यपि कम प्रचलन में है, परन्तु आसान एवं कारगर होने के कारण प्रयोग किया जता है। इस विधि में बीज को कम क्षति पहुंचती है। गेहूं के सेहूं रोग की रोकथाम के लिये बीज को 60 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम की गर्म हवा में 10 मिनट तक रखने से रोगजनक (निमेटोड) समाप्त हो जाता है। मिर्च के बीज को 70 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम वाली गर्म हवा में 7 दिन तक उपचारित करने से मोजेक रोग तथ कोलेट्रोट्राकम कौप्सिकाई का निवारण हो जाता है। 

फसल उत्पादन का प्राथमिक निवेश एवं मुख्य आधार बीज है।  समस्त खाद्य फसलें जैसे- गेहूँ, धान, मक्का, ज्वार, दलहनी फसलें उर्द, मूंग, अरहर, चना, मटर, मसूर, तिलहनी फसलें- सरसों अलसी, कुसुम, मंूगफली एवं टमाटर, मिर्च, गोभी, मूली इत्यादि सब्जियों वाली फसलें बीज के द्वारा ही पैदा की जाती हैं। लेकिन किन्ही कारणों से बीज रोग के जीवाणुओं द्वारा संक्रमित हो जाने के कारण या तो बीज जमीन के अन्दर ही सड़ जाते हैं या अंकुरण के बाद पौधे गलने लगते हैं या सूखने लगते हैं, जिससे पौधों की संख्या में कमी हो जाती है तथा पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बीज पर बीज जनित एवं भूमि जनित दोनों प्रकार की बीमारियों का प्रकोप हो सकता है। जिसके फलस्वरूप बीज सडऩ, पौध गलन, उकठा, कंडुआ, गेरूआ, पर्णधब्बा आदि जैसे अनेक रोगों का प्रकोप फसलों पर हो सकता है। इन रोगों के जनक फफूंदी एवं बैक्टीरिया होते हैं। इनके बीजाणु बीजों के बाहरी या भीतरी सतह में मौजूद होते हैं। जब ऐसे रोगी बीज का प्रयोग बोनी में करते हैं तो बीज उगने के पूर्व ही संक्रमित होकर नष्ट हो जाते हैं। यदि किसी प्रकार बीज से पौधा बनकर जमीन के बाहर निकल आता है, तो रोग के प्रभाव से शुरू में ही गलकर या सूख कर मर जाता है, जैसे सब्जियों की नर्सरी में पौध गलन एवं चने की फसल में उकठा रोग होता है। या फिर फलने की अवस्था में फूल के स्थान पर रोग के बीजाणु बन जाते हैं, जैसे गेहूँ, जौ एवं बाजरा रोग के बीजाणु बन जाते हैं, जौ एवं बाजरा में कण्डुआ रोग लगने पर होता है। ऐसे रोगी पौधों से रोग के बीजाणु स्वस्थ पौधों में प्रवेश हो जाते हैं। इस फसल को उगाने के लिये प्रयोग में लाया जाता है, तो इसके बहुत ही बुरे परिणाम देखने को मिलते हैं। मतलब ये कि फसल पर अधिकांश रोगकारक बीज द्वारा ही फैलते हैं। जिनसे बचाव के लिये बीज को बुवाई के पूर्व उपचारित करना बहुत ही आवश्यक है। प्रस्तुत लेख में विभिन्न रोगों से बचाव के लिये बीज उपचार की विभिन्न विधियों, दवाओं एवं उपचार के तरीकों का वर्णन किया गया है। ताकि किसान भाई बीज को उपचारित कर रोग मुक्त बीज की बोनी कर भरपूर पैदावार ले सकंे। 

यांत्रिक विधि से बीज उपचार

आमतौर पर संक्रमित बीज सामान्य बीज की तुलना में आकार, प्रकार, रंग एवं वजन के कारण अलग ही पहचान में आ जाता है। जिसको सामान्य बीज से अलग किया जा सकता है। उदाहरण के लिये यदि अर्गट से प्रभावित बीज आकार में बड़ा होता है, परन्तु सामान्य दानों से हल्का होता है। जिसको छननी से छान कर अलग किया जा सकता है। गेहूं में सेहूं रोग से प्रभावित बीज का आकर छोटा तथा हल्का होता है। जिसको पानी में तैराकर अलग कर लेते है। उसी प्रकार अनेक बीज जनित बीमारियों के बीज को श्रेणीकरण, पानी में डालकर गुरूत्वाकर्षण की शक्ति या फिर पानी में ऊपर तैराकर या फिर छननी से छानकर अलग किया जा सकता है।

रसायनिक विधि से बीज उपचार 

बीज जनित बीमारियों की रोकथाम के लिये बीज में रसायनों का प्रयोग सबसे कम खर्चीला एवं सर्वाधिक प्रभावी तरीका है। कवकनाशियों द्वारा बीज शोधन करने से बीज जनित रोगजनक समाप्त हो जाते हैं या उनकी वृद्धि को रोक देते हैं तथा बीज के ऊपर एक कवच का कार्य करते हैं। जो बीज सडऩ, पौध गलन, आद्र्रगलन, झुलसा, पर्ण धब्बा कण्डुआ एवं अनेकों प्रकार की बीमारियाँ तथा सूत्रकृमि आदि से बचाव करता है। 

शुष्क उपचार 

इस विधि में बीज उपचारित ड्रम या पॉलीथिन की बोरी या मटका का प्रयोग करते हैं। इसमें जमाव के लगभग आधी मात्रा में बीज भरकर दवा डालकर 5-10 मिनिट तक चलाते हैं। ताकि दवा प्रत्येक बीज की सतह पर अच्छी तरह चढ़ जाये। तो उसको बाहर निकाल लेते हैं एवं बोनी के उपयोग में लाते हैं। 

बीज उपचार क्यों आवश्यक है 

बीज उपचार खेती में कम लागत की तकनीकी में सबसे महत्वपूर्ण एवं सबसे उपयोगी पहलू है। बीज उपचार के अभाव में फसल उत्पादन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो इस प्रकार हैं

बीज के अंकुरण एवं वृद्धि में कमी: संक्रमित बीज बोनी के उपरांत जैसे ही नमी को अवशोषित करता है। बीज जनित रोगाणु सक्रिय हो जाते है, जिससे या तो बीज सड़ जाता है। या फिर आद्र्रगलन की बीमारी छोटे पौधों में लग जाती है। जिससे खेत में पौधों की संख्या में भारी कमी आ जाती है। सोयाबीन में अंतजनित फफूंदी के कारण खेत में बीज का जमाव कम होता है। मैक्रोकोमिना फैज्योलाई के कारण सोयाबीन का अंकुरण लगभग 60 प्रतिशत कम हो जाता है। इसी प्रकार धान में फ्यूजेरियम मोनिलीफॉमी कवक बीज को सडऩे पौधों में ब्लाइट तथा पत्तियों में बदरंगा धब्बा पैदा करने का कार्य करता है। बैंगन, मिर्च, आलू, चना, मटर एवं अन्य फसलों के जमाव में भी बीज जनित रोगाणुओं से भारी कमी आती है। 

संक्रमित बीज पौधों में बीमारियों के साधन

संक्रमित बीज पौधों में होने वाली बीमारियों के बीजाणुओं को पनपने का एक उचित माध्यम होते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण गेहूं में खुला कण्डुआ, जौ का आवृत कण्डुआ, जौ एवं गेहूं का विषाणु धारीदार रोग आदि है। ये रोग बीज के द्वारा ही उत्पन्न होते है। इस कारण रोगों का बीज के द्वारा प्रसारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है। रोगों के बीजाणु मृदा की अपेक्षा बीजों में अधिक समय तक जीवित रहते हैं। चूंकि रोग के बीजाणु बीज के सीधे सम्पर्क में होने के कारण पौधों के जल्दी ही रोगग्रसित होने की सम्भावना बढ़ जाती है। बीज के द्वारा रोग जनक नित्य नये-नये क्षेत्रों में प्रसारित हो रहे हैं। यातायात के साधनों के बढऩे के कारण बीज द्वारा रोग जनक देश के अंदर तथा एक देश के अन्दर तथा एक देश से दूसरे देश में शीघ्रता से फैल रहे हैं। बीजों का आदान प्रदान से भी रोगजनकों के फैलाने का खतरा बढ़ जाता है। 

फसलों के पैदावार में कमी

बीमार बीजों के कारण फसलों की पैदावार काफी घट जाती है। गेहूं में करनाल बंट, खुला कण्डुआ एवं सेहूं रोग से पैदावार में लगभग क्रमश: 60 प्रतिशत, 30-35 प्रतिशत पैदावार में कमी आ सकती है। यदि सेहूं रोग से पूरी बाल संक्रमित नहीं है, तो 5-5.5 प्रतिशत एवं 100 प्रतिशत तक उत्पादन में कमी आती है, दाने भार में हल्के हो जाते हैं। धन में भूरा धब्बा बीमारी से बंगाल में अकाल पड़ गया था। 

 

  • डॉ. प्रमोद गुप्ता
  • ज.ने.कृ.वि.वि., जबलपुर
  • डॉ. आशीष त्रिपाठी
  • कृषि विज्ञान केन्द्र, सागर  
  • aktjnkvv@gmail.com
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