जैविक बीजोपचार एवं जैव उर्वरकों

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जैविक बीजोपचार एवं जैविक उर्वरकों के उपयोग से 

 

रोगों के नियंत्रण हेतु जैविक बीजोपचार

जैविक पौध रोग नियंत्रण कवकीय या जीवाणुवीय उत्पत्ति के होते हंै जो मृदा जनित फफंूदों जैसे- फ्यूजेरियम, राइजोक्टोनिया, स्क्लेरोशियम, मेक्रोफोमिना इत्यादि के द्वारा होने वाली बीमारियों जैसे- जड़ सडऩ, आद्र्रगलन, उकठा, बीज सडऩ, अंगमारी आदि को नियंत्रित करते हैं। ट्राइकोडर्मा विरडी, ट्राइकोडर्मा हरजिनेयम, ग्लोमस प्रजाति आदि प्रमुख कवकीय प्रकृति के रोग नियंत्रक है जबकि बेसिलस सबटिलिस, स्यूडो-मोनास, एग्रोवैक्टीरियम आदि जीवाणुवीय प्रकृति के जैव नियंत्रक है जो कि हानिकारक फफूंदियों के लिये या तो स्थान, पोषक पदार्थ, जल, हवा आदि की कमी कर देते हैं या इनके द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रति जैविक पदार्थों का स्त्रावण होता है जो रोगजनक की वृद्धि को कम करते हैं अथवा उसे नष्ट करते हैं जबकि कुछ जैव नियंत्रक रोगकारक के शरीर से चिपककर उसकी बाहरी परत को गलाकर उसके अंदर का सारा पदार्थ उपयोग कर लेते हैं जिससे रोगकारक जीव नष्ट हो जाते हैं। ट्राइकोडर्मा एक प्रकार का फफूंद है यह बहुत तीव्रता से अपना कवक जाल फैलाकर शत्रु फफूंद का पौधे के पास आने नहीं देता और एक सुरक्षा क्षेत्र उत्पन्न करता है जो बहुत लम्बे समय तक रोगों से रक्षा करता रहा है। 

जैविक फफूंदनाशियों की 5-10 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति कि.ग्रा. बीज का उपचार करने है। मृदा में रोगजनक का प्राथमिक निवेश द्रव्य अधिक है तथा रोग का प्रकोप पूर्व में अधिक तीव्रता से हुआ है ऐसी स्थिति में मृदा उपचार अधिक कारगर रहता है। मृदा उपचार हेतु 50 कि.ग्रा. गोबर खाद में एक कि.ग्रा. ट्राइकोडर्मा अथवा बेसिलस सवटिलस या स्यूडोमोनास को मिलाकर छाया में 10 दिनों तक नम अवस्था में रखते हैं। तत्पश्चात् एक एकड़ क्षेत्र में फैलाकर जमीन में मिलाते हैं।

बीजों के अच्छे परिणाम हेतु बीजोपचार व जैव उर्वरकों से निवेशित किया जाना आवश्यक है। बीजोपचार अति आवश्यक है। यह फसलों को रोगों से होने वाली हानि को रोककर अंकुरण क्षमता भी बढ़ाता है। बीज की बुवाई के बाद रोगजनक अपनी प्रकृति के अनुसार बीज को खेत में अंकुरण के पहले या उसके तुरंत बाद आक्रमण कर हानि पहुंचाते हैं या बाद में पत्तियों पर पर्ण दाग, जड़ सडऩ एवं बालियों पर कंडवा रोग पैदा करते हैं। अगर हम बीजोपचार द्वारा बीजोढ़ रोगजनक को खेत में जाने से रोक दें तो रोग से होने वाली हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता हैं।

जैव उर्वरकों के उपयोग से उत्तम फसल उत्पादन

जैव उर्वरकों में मौजूद सूक्ष्मजीव में पौधों के लिये पोषक तत्व उपलब्ध कराने की क्षमता होती है ये वायुमण्डलीय नत्रजन को भूमि में स्थापित (स्थिर) करने, भूमि में अघुलनशील स्फुर व पोटाश जो खनिजों के अपक्षय से बनते हैं उन्हे घुलनशील बनाते हैं एवं कार्बनिक पदार्थो (जीवांश) को सड़ा-गला कर पौधों के लिये उपयोगी बनाते हंै। जैव उर्वरक सरल, प्रभावी, प्रकृति अनुकूल एवं सस्ता साधन है, जिसका उपयोग कर कम लागत में वांछित पोषक तत्वों की पूर्ति कर सकते हैं।

जैव उर्वरकों से लाभ

  • जैव उर्वरक सस्ते, प्रभावी व रसायनिक उवर्रकों का उत्तम विकल्प है।
  • वृद्धि कारक हारमोन्स, विटामिन्स व खनिज तत्वों की भी पूिर्त करने में सहायक है।
  • जैव उर्वरक प्रयोग से बीजों का अंकुरण शीघ्र होता है एवं पौधों की वृद्धि अधिक होती है।
  • पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित, रसायन रहित एवं भूमि की उर्वरता बनाये रखने में मदद मिलती है।
  • जैव उर्वरकों के उपयोग से फसल उत्पादन में 10-20 प्रतिशत वृद्धि होती है।

राइजोबियम जैव उर्वरक 

राइजोबियम जैव उर्वरक, दलहनी फसलों की जड़ों में गठानें बनाकर वायुमण्डलीय नत्रजन को एकत्रित करते हैं, जिससे पौधे की बढ़वार अच्छी एवं उपज अधिक होती है। इसके उपयोग से दलहनी फसलों की पैदावार एवं मिट्टी की उत्पादकता में वृद्धि होती है।

एजोटोबेक्टर जैव उर्वरक

एजोटोबेक्टर ऐजोस्पाइरीलम जैव उर्वरकों, पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से रहते हुए वायुमण्डलीय नत्रजन का स्थिरीकृत कर पौधों को नत्रजन उपलब्ध कराता है। यह जैव उर्वरक विशेष रूप से धान्य फसल जैसे गेहूं, मक्का, ज्वार, कोदो, कुटकी, कपास, सूरजमुखी, गन्ना और शाक सब्जियों के लिए लाभकारी पाया गया है। यह एजेटोबेक्टर कल्चर 20-25 कि.ग्रा./हे. वायुमण्डलीय नत्रजन को एकत्रित करते हैं, जिससे पौधे की बढ़वार अच्छी एवं उपज अधिक होती है।

राइजोबियम से प्राप्त नाइट्रोजन की मात्रा
फसल प्राप्त नाइट्रोजन /हे. (कि.ग्रा.) यूरिया की बचत (कि.ग्रा./हे.)
सोयाबीन 60-80 150
मूंगफली 50-60 110
मूंग/उड़द 50-55 110
अरहर 100-120 215
चना 80-100 170
मटर 55-60 110
मसूर 60-65 130

पीएसबी

फास्फोरस प्रदायी जैव उवर्रक स्यूडोमोनास, वेसिलस, माइकोराइजा भूमि में उपस्थित अघुलनशील स्फुर को घुलनशील व गतिशील अवस्था में लाने का कार्य करते हंै। सामान्यत: स्फुर की पूर्ति हेतु प्रयोग होने वाले रसायनिक उर्वरकों जैसे-सुपर फास्फेट, डी.ए.पी. मृदा के संपर्क में आते ही 70-80 प्रतिशत अनुपलब्ध हो जाता है और पौधों की पहुंच से बाहर हो जाता है। स्फुर प्रदायी जैव उर्वरक, भूमि में उपस्थित अघुलनशील स्फुर को घुलनशील एवं गतिशील अवस्था में लाकर पौधों को उपलब्ध कराते हंै जिससे पौधों की वृद्धि व विकास अच्छा होने से 8-10 प्रतिशत उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। इसके उपयोग से 20-30 किलो स्फुर प्रति हेक्टेयर की बचत की जा सकती है।

जैव उर्वरक उपयोग विधि

बीज निवेशन (बीज उपचार): 20 से 40 कि.ग्रा. बीज के लिये राइजोबियम का एक पैकेट (200 ग्राम) पर्याप्त है इस हेतु 50-100 ग्राम गुड़/शक्कर को 500 मिली पानी में घोल बनाकर उसे गर्म करते है व ठंडा कर इसमें जैव उर्वरक को घोलकर, बीज के साथ मिलायें। जब राइजोबियम व पीएसबी को एक साथ उपयोग करना हो तब राइजोबियम का एक पैकेट व पीएसबी के दो पैकेट उपयोग करें। बीज को छाया में सुखाकर, उसी दिन बुवाई कार्य करें।

पौध उपचार:- जब पौध को नर्सरी में तैयार कर खेते में लगाया जाता है तब ऐजोटोबेक्टर की एक कि.ग्रा. मात्रा को 10-12 लीटर पानी में घोलकर एक एकड़ की पौध को उसमें 5 मिनिट के लिये डुबोयें व घोल से निकालकर तुरंत रोपाई करें। इसी प्रकार पीएसबी का घोल बनाकर (500 से 1000 ग्राम जैव उवर्रक को 15 लीटर पानी में घोलें) 30 मिनट तक डुबोकर उपचारित करें।

भूमि उपचार:- सभी प्रकार के जैव उर्वरकों से भूमि उपचार किया जा सकता है। भूमि उपचार के लिये 1-2 कि.ग्रा. जैव उर्वरक को 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद या कम्पोस्ट में मिलाकर मिश्रण को गीलाकर अंधेरे में 7-8 दिन तक रखकर बुवाई से पूर्व खेत में मिलायें।

जैव उर्वरकों के उपयोग में सावधानियां

  • जैव उर्वरकों से उपचारित बीज को रसायनिक उर्वरकों के साथ नहीं मिलायेें।
  • जब बीज को फफूंदनाशक दवा से भी उपचारित करना हो तो पहले फफूंद नाशक से और फिर जैव उर्वरक से उपचारित करें।
  • अम्लीय भूमि में, जैव उर्वरक से उपचारित बीज पर कैल्शियम कार्बोनेट की व क्षारीय भूमि में जिप्सम की पर्त चढ़कर बोवनी करें।
  • जैव उर्वरकों की अच्छी कार्यप्रणाली के लिये 20-35 सेंटीग्रेड तापमान अनुकूल रहता है। परिवहन के दौरान इन्हें धूप से बचायें। साथ ही पर्याप्त नमी होने पर ही खेत में उपयोग करें।
  • जैव उर्वरकों का स्वजीवन 6 माह का होता है अत: प्रभाव समाप्ति अवधि के पूर्व ही फसल अनुसार उपयोग करें।

 

  • डॉ. आशीष त्रिपाठी 
  • डॉ. वैशाली शर्मा 
  • डॉ. के. एस. यादव
  • मयंक मेहरा

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र, सागर  (म.प्र.)
aktjnkvv@gmail.com

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