बीजों के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी

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इंदौर। बीज की शुद्धता पर ही फसल का उत्पादन निर्भर है। बीज ही कृषि का आधार है ,जो अपने छोटे से वजूद में विराट उत्पादन की संभावनाएं समेटे रहता है। लेकिन अफसोस की बात यह है, कि कृषि के मूलाधार बीज की सुलभता, शद्धता और गुणवत्ता को लेकर वो अभी तक प्रयास नहीं किए गए, जो अपेक्षित हैं। बीजों को लेकर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

सुलभ हो बीज की आपूर्ति -  करीब 70 प्रतिशत से अधिक किसान अपनी ही फसल या फिर अन्य किसान की अधिक उपज देने वाले बीज अथवा अन्य कंपनियों बीज का इस्तेमाल करता है। हालाँकि बीज उत्पादक संस्थानों, सहकारी समितियों और निजी कंपनियों के बावजूद किसानों की बीज की जरूरत पूर्ति नहीं हो पाती है। इससे उत्पादकता प्रभावित होती है,क्योंकि समय पर जो बीज मिलता है, किसान को मजबूरी में वही बीज बोना पड़ता है। जबकि बीज की गुणवत्ता से 15 -20 प्रतिशत उत्पादन बड़ता है। इसी कारण  प्रमाणित बीजों का उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं हो पाता है। चूंकि निजी कंपनियों का मकसद लाभ कमाना होता है, इसलिए वे उतना ही बीज उत्पादित करती  हैं, जितने का वह विपणन कर सके। भले ही किसानों की मांग बाकी रह जाए। यह बात बीज विक्रेताओं से हुई चर्चा में भी सामने आ चुकी है। उन्नत गुणवत्तायुक्त बीज के अभाव में कालाबाजारी को बढ़ावा मिलता है। हर साल यही स्थिति रहती है। इसके समाधान के लिए दीर्घकालिक प्रयासों के तहत बीजों की आनुवंशिकता,शुद्धता,उच्च अंकुरण क्षमता को लेकर किसानों को जागरूक करने की जरूरत है,क्योंकि आम किसान बीजों को लेकर अभी भी उतने जागरूक नहीं हुए हैं। इसलिए उन्हें बीजों के प्रकार प्रजनक बीज,आधार बीज और प्रमाणित बीज से रूबरू कराते हुए प्रजनक बीज के पीले रंग के टैग, आधार बीज के सफेद रंग के टैग और प्रमाणित बीज के नीले रंग के टैग की जानकारी देकर इनको क्रमश: प्रजनक (ब्रीडर) मप्र राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम द्वारा तैयार किए जाने की प्रक्रिया से अवगत कराया जाना चाहिए। इससे उनकी कोई भी बीज बोने की धारणा बदलेगी।

वितरण व्यवस्था दुरुस्त हो - बुआई से पहले बीज की उपलब्धता से उसके बोने तक में समय की भूमिका अहम रहती है। बीज की आपूर्ति करने में सरकारी तंत्र की विफलता का खामियाजा किसान को भुगतना पड़ता है। समय पर बोनी करने के चक्कर में किसान को जो बीज उपलब्ध होता है, उसे ही खेतों में बो देता है। इससे भी उत्पादन प्रभावित होता है। बीजों की ऊँची कीमतें भी किसान को सस्ता और हल्का बीज बोने को मजबूर करती है। इसीलिए ज्यादातर किसान पिछली फसल का बीज ही इस्तेमाल करते हैं, भले ही वह गुणवत्ता के मापदंडों पर खरा न हो। इसलिए बीजों की कीमतों को नियंत्रित करने के कोई तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि गरीब किसान भी अच्छे बीजों की बुआई कर बढिय़ा उत्पादन ले सके।

बीज बैंक -  बीजों की आनुवंशिक शुद्धता को लेकर हाल ही में इंदौर के समीप सनावदिया में  बीज बैंक की स्थापना की गई है। जिसमें पुराने बीजों को संग्रहित कर उनका विपणन किया जाता है। सदस्य किसानों को बीज बैंक से बीज लेने के बाद उत्पादन होने पर निर्धारित मात्रा में बीज को लौटाना पड़ता है, ताकि विनिमय की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहे। इस बीज बैंक के संस्थापक श्री गौतम कासलीवाल हैं, जो अपने अन्य सहयोगियों श्री गोविन्द माहेश्वरी, विशाल पटेल,परीक्षित जोशी और दिनेश कार्थी के सहयोग से संचालित कर रहे है। हालांकि वर्तमान व्यावसायिक युग में विदेशी कंपनियों के बड़ते प्रभुत्व के चलते किसान इसमें कम रूचि ले रहे हैं। लेकिन देर से ही सही अपनी प्राचीन विरासत को सहेजने के इस प्रयास की प्रशंसा जरूर की जानी चाहिए।

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