खरीफ बुआई उन्नत कृषि यंत्रों का उपयोग एवं रखरखाव

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बीज उर्वरक बुआई यंत्र 

पशु चालित बीज यंत्र उर्वरक बुवाई यंत्र (ड्रिल) - इस यंत्र द्वारा 3-4 कतारों में एक साथ बुआई की जा सकती है। कतारों के मध्य की दूरी को आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है। इस यंत्र द्वारा खाद एवं बीज दोनों ही निर्धारित मात्रा में आवश्यकतानुसार गिराये जा सकते हैं।

ट्रैक्टर चालित सीड कम फर्टिलाईजर ड्रिल यंत्र - इस यंत्र द्वारा 7-13 कतारों में बुआई की जा सकती है। इस यंत्र के प्रयोग से बीज एवं खाद भूमि में उचित गहराई पर बोये जा सकते हैं। यह ट्रैक्टर की 3 प्वांइट लिंक के साथ जुड़ा होता है जिससे लाने ले जाने तथा खेत में चलाने के लिए बहुत सुविधाजनक होता है।

प्लांटर - इस यंत्र का प्रयोग बीजों को प्राय: एक निश्चित बीज से बीज की दूरी पर पंक्तियों में बुवाई हेतु किया जाता है। 

रिजफरो सीड कम फर्टिलाईजर ड्रिल - रिजफरो सीड कम फर्टिलाईजर ड्रिल सामान्य रूप से वही सीड- फर्टिलाईजर ड्रिल होती है, जिसका किसान आमतौर पर उपयोग करते हंै। इसी ड्रिल में कतिपय परिवर्तन करके उसे रिजफरो पद्धति हेतु बदल दिया जाता है। रिजफरो पद्धति से बोवनी करने पर अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। विशेष तौर पर प्राकृतिक अनिश्चिताओं के कारण फसल पर पडऩे वाले प्रतिकूल प्रभावों का असर रिजफरो पद्धति से बोवनी करने पर घट जाता है। सीड कम फर्टिलाईजर ड्रिल में सिर्फ सामने की टाईन्स (कुर्सियां) ही बीज बोने के लिए प्रयुक्त करके उनमें फरो ओपनर (पंजे) लगा देने पर सामान्य सीड कम फर्टिलाईजर ड्रिल को रिजफरो पद्धति हेतु तैयार किया जाता है। इस प्रकार लगाए गए पंजे बोवनी की कतारों के मध्य लगभग 9 इंच चौड़ी नालियां निर्मित करते हैं जो फरो कहलाती है। इस प्रकार बनी नालियों के दोनों किनारों पर स्वयमेव निर्मित मेड़ (रिज) पर बीज बोया जाता है। बोवनी के तत्काल बाद वर्षा होने पर पानी नालियों में भरता-बहता है और बीज बाने की मेड़ों की परत सख्त नहीं होती है। फलस्वरूप  अच्छा  अंकुरण प्रतिशत प्राप्त होता है। बोये गए बीज से लगभग 2 सेंटीमीटर नीचे उर्वरक गिरता है और अंकुरण के पश्चात पौधे को पूरा का पूरा प्राप्त होता है। अंकुरण के पश्चात यदि अल्प वर्षा होती है तो नालियों में सिंचित पानी सोयाबीन को पर्याप्त नमी प्रदान कर उनका पोषण करता है। परन्तु यदि अंकुरण के पश्चात अधिक  वर्षा होती है तो कतारों के मध्य नालियां वर्षा जल को यथाशीघ्र खेत से बाहर प्रवाहित करने में भी सहायता करती है और जल प्लावन की स्थिति निर्मित नहीं होने देती है। इस प्रकार प्राकृतिक अनिश्चिताओं की आशंका से फसल पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों को नियंत्रित किया जा सकता है। रिजफरो पद्धति में किसान अपनी इच्छानुसार कतारों से कतारों की दूरी 14 इंच से 18 इंच के मध्य तय कर सकते हैं। इनके मध्य निर्मित नालियों पर आवश्यकतानुसार सोयाबीन की खड़ी फसल में पशुचलित कुल्पा अथवा डोरा चलाकर बेहतर निंदाई-गुड़ाई की जा सकती है। सामान्य तौर पर अंकुरण के 10 दिन पश्चात् फिर 16 दिन पश्चात और आवश्यकता होने पर अंतिम रूप से तीन सप्ताह पश्चात निंदाई-गुड़ाई की जा सकती है। 

रेज्ड बैड पद्धति के लाभ :

  • सिंचाई के पानी का व्यवस्थापन अच्छी तरह से होता है। समतल क्यारी विधि की अपेक्षा 30 प्रतिशत पानी की बचत होती है। 
  • समतल क्यारी विधि की अपेक्षा 30 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है। 
  • वर्षा जल के अच्छे निकास के कारण भूमि में भी अच्छा उत्पादन मिलता है। 
  • उर्वरक के सही व्यवस्थापन के कारण उर्वरक उपयोग क्षमता भी बढ़ती है। 
  • बीज दर कम लगती है जिसमें पौधों की संख्या नियंत्रित की जा सकती है। 
  • मेढ़ के बीच के खरपतवार यंत्रों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है। 
  • मेढ़ से मेढ़ की दूरी पर्याप्त होने से पौधों की कैनोपी को सूर्य की किरणें अधिक से अधिक मिलती हैं जिससे पौधे की शक्ति बढ़ती है तथा आस-पास की मिट्टी भी सूखी रहती है जिससे पौधों के झुकने की समस्या नहीं रहती है। 
  • समतल बुवाई विधि की अपेक्षा इसमें अंकुरण क्षमता अधिक होती है। क्योंकि समतल विधि में बीज को जमीन के अंदर डाला जाता है। जिससे पौधे को जमीन से बाहर निकलने में अधिक ऊर्जा की जरुरत होती है। 
  • वर्षा की कमी की स्थिति में समतल विधि की अपेक्षा इस विधि में 4.5 प्रतिशत अधिक नमी रहती है। 

रेज्ड बैड पद्धति - सोयाबीन की बुआई के लिए रेज्ड बैड प्लान्टर का उपयोग किया गया। इसमें मेढ़ की ऊंचाई लगभग 15-20 से.मी. तथा मेढ़ से मेढ़ की दूरी 50-60 से.मी. रखी गई। एक मेढ़ के ऊपर फसल की दो कतारें 20-25 से.मी. की दूरी पर रखी गई। इस ऊची मेढ़ पर फसल की कतारें लगाने से पौधे की जड़ों में हवा का आवागमन अच्छी तरह से होता है जिसमें सोयाबीन तथा चना की जड़ों में बनने वाली गठानें अधिक से अधिक एवं बड़े आकार की बनती हैं। इस विधि में ऊँची मेढ़ के साथ-साथ एक गहरी नाली भी बनती है। वर्षा के दिनों में अधिक वर्षा की स्थिति में वर्षा जल इन नालियों के माध्यम से खेत के बाहर चला जाता है जिसमें सोयाबीन की फसल मेढ़ पर होने के कारण पानी के सम्पर्क में नहीं आती है और खराब होने से बच जाती है तथा कम वर्षा की स्थिति में दोनों तरफ से नालियों को बन्द कर दिया जाता है। जिससे वर्षा का जल इन नालियों में रुक जाता है और पौधों के जड़ों में नमी बनाये रखता है।  

सावधानियां: 

  • खेत की अच्छे से जुताई तथा समतलीकरण की आवश्यकता होती है। 
  • मशीन की प्रक्षेत्र क्षमता लगभग 0.20 - 0.25 हे./घन्टा है। जिससे खरीफ में ज्यादा से ज्यादा मशीनों की आवश्यकता रहती है।
  • चना की बुवाई के समय यह सुनिश्चित करें कि बीज नमी में ही डल रहा है तथा पर्याप्त गहराई पर डल रहा है। 
  • बीज को बोने से पहले अंकुरण क्षमता की जांच अवश्य कर लें तथा उपचार करके ही बीज बोये। 
  • चना में अगर बुआई के बाद अंकुरण कम लगे तो नालियों के माध्यम से 20 दिन पर एक हल्की सिंचाई कर लें। 

प्रमुख बिंदु

  • रबी फसल कटने के बाद गर्मी में गहरी जुताई 2 से 3 साल में एक बार अवश्य करें। 
  • खेत को दो-तीन बार बखर चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह से भुरभुरा कर लें। 
  • अगर गहरी जुताई नहीं कर सके तो कल्टीवेटर से जुताई करें। 
  • हर तीन साल में खेत को समतल करें। 
  • गहरी काली मिट्टी में रेज्ड बैड बनाने के लिए 45 पी.टी.ओ. हार्स पावर का ट्रैक्टर का उपयोग करें। 
  • एक ही मशीन से खरीफ एवं रबी फसलों की बुवाई की जा सकती है। 
  • मेढ़ एवं नाली की चौड़ाई भी इस मशीन में कम ज्यादा करने की व्यवस्था रहती है। 
  • इस मशीन में एक बार में तीन नाली तथा दो मेढ़ पर चार कतारें निकलती हैं। 
  • जिस मिट्टी की क्षमता कम होती है। नाली के माध्यम से वर्षा का बहता हुआ पानी खेत से बाहर निकल जाता है।
  • कम वर्षा की स्थिति में दोनों तरफ से इन नालियों को बन्द कर देते हंै जिससे नमी बनी रहती है। 
  • नालियों में वर्षा जल मेढ़ की तरफ ढ्ढठ्ठद्घद्बद्यह्लह्म्ड्डह्लद्बशठ्ठ जाता है तथा मेढ़ के अन्दर कैपलरी छिद्र के माध्यम से ऊपर की तरफ आकर पौधों की जड़ों को मिलता है।   
  • इस पद्धति के माध्यम से गेहूं, धान, सोयाबीन, चना, मक्का इत्यादि फसलों की सिंचाई की जाती है। 
  • सिंचाई एवं उर्वरक के लिए टपक सिंचाई पद्धति का भी उपयोग कर सकते हैं।
  • इस मशीन में मेढ़ को आकार देने के लिए एक बैड शेवर लगाया गया है। 

यंत्रों का रखरखाव :

यंत्र का निरीक्षण - किसी भी यंत्र को उपयोग में लाने से पूर्व उनका ध्यान निरीक्षण करके यह देखें कि उसके कल-पुर्जो के सभी जोड़ ठीक से कसे हों। यदि कोई पेंच-काबला ढीला दिखें तो उसे कस दें। इसके लिए इसके लिए सिर्फ आंख से देखना ही काफी नहीं होता बल्कि पेचकस, प्लास और स्पेलर प्रयोग करके ही जांच करें। इस कार्य के  लिए निर्माता कुछ औजारों को यंत्र के साथ ही देते हैं। यदि कोई पेच या काबला गिर गया हो, तो नया लगाकर कस दें। बिना पेच, काबले, ढीबरी को पूरा किये यंत्र का प्रयोग करना उचित नहीं है।

स्नेहन- आपस में रगड़कर चलने वाले सभी पुर्जों को स्नेहक की आवश्यकता होती है। इसलिए इन्हें निर्धारित मात्रा में तेल या ग्रीस दिया जाना चाहिए। जोड़ में नया ग्रीस पूरा हो जाने के बाद पुरानी ग्रीस बाहर निकाल दें। प्रत्येक बार स्नेहक देने के बाद अतिरिक्त तेल या ग्रीस को जोड़ पर से साफ कर दें नहीं तो उसमें धूल जमा हो जायेगी । यदि कोई निपिल या सुराख बंद हो तो उसे साफ करके स्नेहक आवश्यक नहीं होता। स्नेहक देने की अवधि का पता कर लें और निर्धारित अवधि पर ही जोड़ को स्नेहक दें।

समायोजन - यंत्रों में लगने वाले पट्टे, बैल्ट, कमानी, खटके इत्यादि को निश्चित कसाव की आवश्यकता होती है। इस कसाव की भी हर रोज जांच कर लेना जरूरी है और यदि आवश्यक हो तो समायोजन कर लें। इसी प्रकार अन्य पुर्जे जो एक-दूसरे से मिल कर चलते हैं। उन्हें भी सही समायोजन की जरूरत होती है। यदि यह समायोजन करने की सीमा समाप्त हो गई हो तो संभवत: पुर्जा बदलना पड़ेगा ।

नियमित सफाई - गीले खेतों में प्रयोग किये जाने वाले कृष यंत्रों पर कीचड़ जम जाना आम बात है। परन्तु सूखे खेतों में कार्य करने के बाद भी सभाी कृषि यंत्रों की नित्य सफाई करना आवश्यक है। इसके लिए यंत्रों को पानी के दबाव से धोना सर्वोत्तम रहेगा । धुलाई करने से पहले इस बात का ध्यान रखें कि गर्म इंजन के अंगों पर पानी न पड़े अन्यथा पुर्जों के अचानक ठंडा होने से उनमें दरार पड़ सकती है। यंत्रों की धुलाई से पहले उन्हें सूखे कपड़े से झाड़ अच्छा रहेगा। इस बात का ध्यान रखें कि धूल, बीज, खाद दवा या पानी का कोई भी अंश धुलाई के बाद यंत्र में शेष न रहे अन्यथा यंत्र के पुर्जे उनसे गल सकते है।

 

  • डॉ. सुधीर सिंह धाकड़ 

    कृषि विज्ञान केन्द्र, शाजापुर
    राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.)

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