एसआरआई पद्धति से धान की खेती

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एसआरआई पद्धति में खेती में पानी नहीं रहने पर मिट्टी में वायु का संचार होने से पौधों की जड़ों की बढ़ोत्तरी अधिक अच्छी होती है। इससे सम्पूर्ण पौधे स्वस्थ रहते हैं और उनका अच्छा विकास होता है जिसका धान के उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भारत देश कृषि प्रधान देश है। जहां की 70 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका कृषि पर आघारित है। यहां वर्षा में काफी असमानता है और ज्यादातर खेती वर्षा पर ही आधारित है। खरीफ मौसम में धान की खेती प्रमुख रूप से होती है जिस पर कृषकों की आजीविका एक बड़ी सीमा तक आधारित है। भारत में धान की खेती 450 लाख हेक्टेयर में होती है। इसमें सिंचित धान का मात्र 49.6 प्रतिशत है।

एसआरआई पद्धति से धान के एक पौधे में कम से कम 20 से 25 बालियां आसानी से आ जाती हैं जबकि कई पौधों में 50 व उससे भी अधिक बालियां निकलती हैं। इन मुख्य विशेषताओं के कारण इस पद्धति से धान की खेती करने से उपज बढ़ती है जिससे किसानों के लाभ में वृद्धि होती है।

उचित भूमि का चयन

इस विधि के लिए अच्छी जल निकास वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। अम्लीय व क्षारीय भूमि में इसकी खेती नहीं करें। इसके लिए उपयुक्त पीएच मान 5.5 से 7.5 तक है। भारी व काली मिट्टी वाले खेत में वीडर चलाने में थोड़ी समस्या होती है।

भूमि का समतलीकरण 

खेेत को पूर्ण रूप से समतल किया जाना जरूरी है ताकि पूरे खेेत में एक समान सिंचाई दी जा सके और कहीं भी अनावश्यक पानी न जमा हो। यदि खेेत में कहीं ज्यादा पानी जमा होगा तो रोपे गये पौधे छोटे होने के कारण उनके मरने की सम्भावना बढ़ जाएगी और जड़ों का विकास अच्छा नहीं होगा जिससे प्रति पौधा कल्लों की संख्या कम हो जायेगी।

भूमि की गुणवत्ता में वृद्धि

इस विधि में जैविक तरीके से खेेती करने पर जोर दिया जाता है। भूमि की उत्पादकता में वृद्धि करने के तीन उपाय उपयुक्त हैं।

कम्पोस्ट की खाद- अच्छी सड़ी हुई खाद 15 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से (8 ट्राली प्रति हेक्टेयर) डालना आवश्यक है। यदि गोबर की खाद के साथ वर्मी कम्पोस्ट, नाडेप कम्पोस्ट यदि उपलब्ध हो तो दोनों को मिलाकर उपयोग करें। इसके साथ पंचगव्य व अमृत जल का उपयोग किया जाता है। प्रथम, द्वितीय व तृतीय वीडिंग के पश्चात पंचगव्य व अमृत जल या मेपल ई. एम. 1 का प्रयोग क्रमवार करें जिससे भूमि में सूक्ष्म बैक्टीरिया की संख्या में वृद्धि होती है जिससे भूमि की उत्पादकता और उत्पादन में वृद्धि होती है।

हरी खाद - खेत में धान की रोपाई से दो माह पूर्व खेत की जुताई करके सनई, ढेंचा की बुआई करें। 35 से 45 दिन पश्चात, हरी फसल को खेत की जुताई करके मिट्टी में दबा दें जिससे भूमि में जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है। इससे भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु वायु मण्डल से नाइट्रोजन लेकर जड़ों में संग्रहित कर सकते हैं।

हरी खाद बनाने की दाभोलकर विधि- वर्तमान में यह विधि काफी लोकप्रिय है। साधारणत: हरी खाद प्राप्त करने के लिए लेग्युमिनस (बेल वाली) फसलों को ही बोया जाता है। लेकिन दाभोलकर विधि में 5 तरह (अनाज, दलहन, तिलहन, लेग्युमिनस एवं मसाले) के बीजों का मिश्रण करके बोया जाता है। बाद में इनको जुताई करके मिट्टी में दबा दिया जाता है।  इस विधि में दलहन, तिलहन, अनाज और हरी खाद के प्रत्येक फसल के बीज के 6 कि. ग्रा. और मसाले के बीज का 500 ग्राम मिलाया जाता है। बोने के 40 से 45 दिन के बाद जुताई करके इनको मिट्टी में दबा दिया जाता है। इससे मिट्टी की ऊपरी परत में लाभदायक जीवाणु से ह्यूमस बनता है। 

बीज का चयन

अच्छे बीज के चयन हेतु बीज को चौड़े मुंह वाले बर्तन में पानी में डाला जाता है। जो बीज ऊपर तैरते हैं, उन्हें निकाल देते हैं। इसके बाद पानी में 12-24 घंटे तक बीज को भिगोकर अंकुरण के लिए 24 से 48 घंटे तक जूट के बोरे में बांध कर रखा जाता है। बोरी पर दिन में तीन बार पानी का छिड़काव करें। यदि मौसम ठण्डा है तो हल्का गर्म पानी का उपयोग करते हैं। जब बीज के ऊपरी सिरे पर हल्के सफेद रंग के अंकुर दिखायी देने लगते हैं तब बीज क्यारी में बोने के लिए उपयुक्त होता है।

नर्सरी की तैयारी

नर्सरी बनाने में बहुत सावधानी बरतें। इस विधि में 8-12 दिन के पौधों का रोपण किया जाता है। एक हेक्टेयर धान के क्षेत्रफल के लिए 100 वर्गमीटर नर्सरी क्षेत्र व 5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। नर्सरी के क्यारी बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि क्यारी खेत के मध्य या कोने में बनाई जाय जहां पौधा रोपण करना है। क्यारी की लम्बाई 125 से.मी. से ज्यादा नहीं होनी चाहिये। लम्बाई स्थिति के अनुसार व बैड की ऊँचाई आधार तल से 6 इंच हो।

प्रथम परत -1 इंच गोबर की अच्छी खाद
द्वितीय परत -1-1.5 इंच बारीक मिट्टी
तृतीय परत -1 इंच सड़ी गोबर की खाद
चौथी परत-2.5 इंच बारीक मिट्टी
मल्चिंग -3-4 दिन तक

सभी परतों को अच्छी तरह मिला दें। इस पद्धति से पौधों की जड़ों को निकलने में आसानी होती है।      

बीज बुुआई

नर्सरी के क्यारी में अंकुरित बीज का छिड़काव करने से पहले चार भागों में बांट लिया जाता है। प्रथम भाग के बीज का छिड़काव दूर-दूर किया जाता है। बीज से बीज की दूरी इतनी होती है कि उसमें एक बीज का स्थान छूट जाय। दूसरे भाग के बीज बोते समय जिस जगह कम बीज पड़ता है, वहाँ पर देख कर बुआई करें। तीसरा भाग चारों किनारों पर ठीक ढंग से बोयें। चौथा भाग,जहाँ पर बीज नहीं है, वहाँ पर बोयें। बीज चार भागों में इसलिए बांटते हैं कि इस विधि में कम बीज की आवश्यकता होती है। पौधा रोपण के समय एक-एक पौधे को बीज सहित नर्सरी में अलग करके मिट्टी सहित रोपा जाता है इसलिए नर्सरी में बीज बोते समय बीज से बीज की उचित दूरी रखनी आवश्यक है।

बीज बुआई के पश्चात अच्छा सड़ा हुआ खाद या धान का पराल क्यारी के ऊपर पतली परत में बिछा दें। बीज को सीधी धूप, चिडिय़ों और चींटियों से सुरक्षा करें। जब दो या तीन दिन में बीज अंकुरण हो जाय तो पराल को हटा दें व सुबह-शाम प्रतिदिन सिंचाई करें। सिंचाई करते समय यह सावधानी बरतें कि बीज मिट्टी के बाहर न निकल जाये।

खेेत की तैयारी

इस विधि में परम्परागत विधि के समान ही खेत की तैयारी की जाती है, लेकिन खेत को समतल करना आवश्यक है। पौध रोपण के 12 से 24 घंटे पूर्व खेत की तैयारी करके एक से तीन सेमी. से ज्यादा पानी खेत में न रखें। इससे निशान लगाने में कोई असुविधा नहीं होती है।

पौधा रोपण

इस विधि में 8-12 दिन के पौधे का रोपण किया जाता है, जब पौधे में दो पत्ती निकल आये। नर्सरी से पौधों को निकालते समय इस बात की सावधानी रखें कि पौधों के तने व जड़ के साथ लगा बीज न टूटे व एक-एक पौधा आसानी से अलग करें। पौधा रोपण के समय हाथ के अँगूठे एवं वर्तनी अंगुली (पदकमग पिदहमत) का प्रयोग करें।

पौधा रोपण हेतु सावधानियां 

  • जड़ों व बीज को नुकसान पहुँचायें बिना पौधा रोपें।
  • लगाने के पहले एक-एक पौधा अलग कर लें।
  • नर्सरी से निकाले पौधे की मिट्टी धोये बिना लगायें।
  • धान के बीज सहित पौधे को ज्यादा गहराई पर रोपण न करें।

खरपतवार नियंत्रण

एसआरआई में प्रभावशाली खरपतवार नियंत्रण के लिए हाथ से चलाये जाने वाले वीडरों के विभिन्न मॉडल विकसित किये गए हैं। वीडर चलाने से खेत की मिट्टी पोली हो जाती है और उसमें हवा का आवागमन ज्यादा होता है। इसके अतिरिक्त खेतों में पानी न भरने देने की स्थिति में खरपतवार उगने को उपयुक्त वातावरण मिलता है। इस खरपतवार को जमीन के अन्दर दबा दिया जाये तो ये खाद का काम भी करती है जिससे भूमि में जैविक खाद की बढ़ोतरी होती है। पौध रोपण के पश्चात् 10वें दिन में वीडर चलायें, दूसरी बार 20वें दिन पर और तीसरी बार 30वें दिन वीडर चलायें। पौधे के आसपास के खरपतवार जो वीडर से लाइन में छूट जाते हैं, उन्हें हाथ से निकाल लिया जाता है। पौधे के पंक्तियों के बीच में वीडर चलाने से खरपतवार मिट्टी में मिल जाता है। यदि इसके बाद आवश्यक हुआ तो एक निराई वीडर से और करें। वीडर के ज्यादा बार उपयोग करने पर अधिक पैदावार होती है।

वीडर मशीन चलाने के लाभ 

  • खरपतवार की रोकथाम।
  • मिट्टी में खरपतवार मिलाने से हरी खाद की उपलब्धता।
  • पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा व पौधों को प्रकाश मिलता है।
  • मिट्टी में जीवाणुाओं की क्रिया में वृद्धि।
  • पौधों को अधिक मात्रा में पोषण मिलता है।

सिंचाई एवं जल प्रबंधन

एसआरआई में खेत में पौध रोपण के बाद पर्याप्त नमी बनी रहे, इतनी सिंचाई करें कि खेत में पानी भर कर रखने की आवश्यकता नहीं होती है। 

कल्लों का निकलना

18 से 45 दिन के बीच धान के पौधे से सबसे ज्यादा कल्ले निकलते हैं क्योंकि इस समय पौधों को धूप, हवा व पानी पर्याप्त मात्रा में मिलता है। अनुभवों के आधार पर जहां केवल एक बार ही वीडर का उपयोग किया गया है, वहां एक पौधे से कल्लों की संख्या 15-25 तक प्राप्त हुई है। तीन बार वीडर का उपयोग करने पर एक पौधे से अधिकतम 80 तक भी कल्ले निकले हैं।

कटाई

जब पौधों की कटाई की जाती है तो पौधे का तना हरा रहता है जबकि बालियाँ पक जाती हैं। बालियों की लम्बाई व दानों का वनज परम्परागत विधि की अपेक्षा ज्यादा होता है। बालियों में खाली दानों की संख्या कम होती है तथा दाने जल्दी नहीं झड़ते है।

  • सौरभ दास 
  • इं. गां. कृ. वि. वि., रायपुर
  • sourabhdas15038@gmail.com, mob. 7587133590
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