गर्मियों से ही शुरू करें पौध संरक्षण

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ग्रीष्मकाल से ही यदि कृषक समझ जाये और पौध व्याधियों के कारकों को नष्ट करने का प्रयास सतत शुरू करें तो भविष्य की खेती में कीट/रोगों के आक्रमण के जोखिम को काफी हद तक क्षति सीमा के भीतर ही रखा जा सकता है। अनेकों कवक एवं कीटों की शंखियां भूमि के भीतर में समय व्यतीत करते हैं और जब उनका भोजन उपलब्ध होता है तब भण्डारण तक पीछा नहीं छोड़ते हैं। रबी की मुख्य फसल गेहूं की जाति लोक-1 आज भी लोकप्रिय है परन्तु उसमें कंडुआ बार-बार आकर अपना विस्तार कर रहा है। कृषक चाहे तो इस जाति को बदल कर नई जाति का चयन करके कंडुआ से छुटकारा पायें। यदि लोक-1 लगाना इतना ही जरूरी है तो जेठ-वैशाख की कड़ी धूप में केवल बुआई के लिए रखे गेहूं को सुबह चार घंटे ठण्डे पानी में भिगोकर निकालकर सीमेंट अथवा टीन की सीट पर अच्छी तरह से फैलाकर सुखा लें। ध्यान रहे 4 घंटे से अधिक नहीं फुलायें तथा कड़ी धूप में अच्छी तरह से सुखायें। इस क्रिया से बीज के भीतर छिपी कवक को समाप्त किया जा सकता है।

वर्ष में अधिकांश खेती का रकबा दो फसली फसल प्रणाली के तहत चलता है कुछ आंशिक क्षेत्र में जायद की फसलों को लगाकर अतिरिक्त आय के साधन की व्यवस्था की जाती है। फसल चाहे कोई भी हो खाद्यान्नों की हो अथवा उद्यानिकी सभी में कीट, रोगों का आक्रमण आम बात है और पौध संरक्षण में बचाव की भूमिका को यदि अधिक महत्व दिया जाये तो एक तीर से दो शिकार सम्भव हो सकेगा। एक तो पौध संरक्षण में कीट/रोगों के उपचार पर होने वाले व्यय की बचत हो सकेगी। दूसरा कीटनाशकों के उपयोग से होने वाली पर्यावरण की हानि पर भी रोक लग सकेगी।

सोयाबीन की गर्डल बीटल, लीफ माइरन, गेरुआ मेढ़ों पर पनपते खरपतवारों पर राज करते हैं। इन खरपतवारों को समूल नष्ट करना जरूरी कार्य आप का ही होगा। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके भूमिगत कीट, रोगों तथा खरपतवारों के पौधों को नष्ट किया जा सकता है। पूर्व में खेती केवल पेट भरने का जरिया था परन्तु उसे अब व्यवसाय मान लिया गया है और व्यवसाय में थोड़ी सी भी कोताही नुकसान दे सकती है। पहले एक फसली कार्यक्रम खरीफ, रबी क्षेत्र विशेष की जलवायु भूमि के आधार पर की जाती थी परन्तु आज दो सौ प्रतिशत फसल सघनता और आंशिक क्षेत्रों में 300 प्रतिशत तक की फसल सघनता हो रही है। अर्थात् वर्ष भर व्यस्त कार्यक्रम ग्रीष्मकाल में यदि पौध संरक्षण के उत्पादों का अमल कर लिया जाये तो भविष्य की चिन्ता समाप्त हो जाएगी।

दीमक जो ना केवल खेती का दुश्मन है बल्कि एक सामाजिक दुश्मन बन गई है। कीमती से कीमती सामान को बिना शोरगुल के हानि पहुंचाने में दीमक के पैर धनवानों की तिजोरियों तक आसानी से पहुंच जाते हैं इसकी रोकथाम के लिये ग्रीष्मकाल सबसे उपयुक्त समय है। खेतों में घूम-घूमकर दीमक के बमीठों की पहचान करें और उसमें छिपी दीमक की रानी जो एक दिन में 3 हजार तक अण्डे देकर अपने विस्तार में नहीं चूकती, उसे समाप्त करके कष्ट के कारक का ही खात्मा करने का यह अच्छा समय है। उल्लेखनीय है कि दीमक के प्रकोप से खेतों और घरों में करोड़ों की हानि संभव है। इस खाली वक्त में खेतों में उपयोग किये जाने वाली मशीनों की भी साफ - सफाई रखरखाव विशेषकर पौध संरक्षण यंत्रों का रखरखाव जरूरी है। ध्यान रहे उपचार से बचाव महत्वपूर्ण है तो आज ही इस पर विचार करके कार्यक्रम बनायें।

  • गणेश्वरी बंजारे
  • इं. गां. कृ. महाविद्यालय, रायपुर
  • gannubanjare6@gmail.com
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